सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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‘किलर लाइन’ के नाम से कुख्यात ब्लू लाइन बसों का दिल्ली की सड़कों से हटाया जाना एक संवेदनशील मुद्दा है जिस पर अलग अलग किस्म की राय व्यक्त की जा रही हैं. जहां कई यह मानते हैं कि सैंकड़ों जानें ले चुकी इन बसों का दिल्ली की सड़कों से चले जाना ही अच्छा है, एक ऐसा वर्ग ये भी समझता है कि तेज़ रफ़्तार और समय से चलने वाली ब्लू लाइन बसें दिल्ली की लाइफ लाइन थीं और उन का चला जाना एक नुकसान है.

पर यहाँ हमें सार्वजनिक नीति के दोषों के बारे में भी सोचना चाहिए जिन की वजह से शहर में पब्लिक यातायात इतना त्रुटिपूर्ण है.

दुनिया जबकि साम्यवाद के पतन की 20वीं वर्षगांठ मना रही है, कई विश्लेषकों को याद होगा कि कैसे सोवियत नीतियों की नाकामी ने सरकार को उत्पादन पर ज्यादा अधिकार दे दिया था और साम्राज्यवादी जाल की संज्ञा देकर कैसे विदेश व्यापार और निवेश को हतोत्साहित किया जाता था। भारत जैसे विकासशील देशों ने भी ऐसी ही नीतियों को अपनाया था, जो साम्यवादी नहीं समाजवादी थे। 1930 के दशक में सोवियत संघ

यूरोप और अमेरिका में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या कम होती जा रही है, भारत में यह बढ़ रही है

किसी भी बात को जटिल बनाना सरकारों का पसंदीदा शगल होता है। लेकिन लीक से हटकर सोचा जाए तो मुश्किल समस्या भी आसान हो सकती है। भारत में बड़ी संख्या में होने वाली दुर्घटनाओं को ही ले लीजिए। ये आए दिन होती हैं, क्योंकि एक तो भारतीय सड़कों पर ऐसे वाहन दौड़ते रहते हैं जिनका स्टेयरिंग ऐसे अकुशल ड्राइवरों के हाथ में होता है, जिनको यूरोप और अमेरिका में कभी भी लाइसेंस मिल ही नहीं सकता। सुरक्षा को लेकर वहां के जागरूक समाज

‘‘सोवियत संघ के पतन और शीत युद्ध के अंत के बाद बर्लिन की दीवार एकमात्र बाधा नहीं थी जो दूर हुई बल्कि इसके साथ ही धन, व्यापार, लोगों और विचारों के प्रवाह को बाधित करने वालो अवरोधों का भी पतन हो गया।’’

- फरीद ज़करिया, अंतरराष्ट्रीय

भारत को ऐसे थिंक टैंकों की जरूरत है, जो असरकारी, कम खर्चीले और टिकाऊ नीतिगत समाधानों की खोज कर सके. -पार्थ जे शाह

जन कल्याण परियोजनाओं के मस्टर रोल के साथ काफी छेड़-छाड़ होता रहा है। कई बार अधिकतर ऐसे लोग जिनका मस्टर रोल में नाम होता है, वे वास्तव में काम पर मौजूद नहीं होते हैं और वास्तव में काम करने वाले कई लोगों का नाम मस्टर रोल में नहीं होता है। राजस्थान में अरुणा राय और उनके संगठन एमकेएसएस (मजदूर किसान शक्ति संगठन) ने इस मुद्दे पर काम करना शुरू किया। उनके कार्यकर्ता विभिन्न कार्यों के सरकारी मस्टर रोल की कॉपी लेते

निजी संपत्ति अधिकार एक व्यक्ति का वो अधिकार है जिससे वह जैसे भी चाहे अपनी संपत्ति का इस्तेमाल कर सकता है, बशर्ते वह दूसरे व्यक्ति के खिलाफ धोखाधड़ी या बल का प्रयोग न करे। संपत्ति अधिकार के महत्व पर जोर देने वाले पहले अर्थशास्त्री आस्ट्रिया के कार्ल मैगर थे। 1971 में एक लेख में मैगर ने यह कहा कि अधिकतर सामान की उपलब्ध मात्रा प्रत्येक व्यक्ति की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है। संभावित रूप से एक उपभोक्ता की रुचि दूसरे प्रत्येक उपभोक्ता से अपर्याप्त सामानों को प्राप्त करने के लिए किए जाने वाले संघर्ष में भिन्न होती है:

मुक्त बाजार लोक प्रशासन का उदाहरण: कूडा करकट की सफाई का काम।

समाजवादी इस काम को बडे ब्यूरो के माध्यम से करते हैं। वे हजारों झाडू लगाने वालों को बहाल करते हैं, सैकडों ट्रक और झाडू खरीदते हैं। यदि हम उनके ब्यूरो प्रमुख के कार्यों का परीक्षण करें तो देखते हैं कि ब्यूरो का अधिकतर समय इस कार्य की प्रक्रिया को पूरा करने में खर्च होता है, जैसे: ट्रक और झाडू की खरीदारी, भर्ती, अनुशासन, छुट्टियां, यूनियन एवं अन्य इसी तरह के कार्य। ब्यूरो की इस पूरी प्रक्रिया का परिणाम क्या निकला, यह देखने का उनके पास समय नहीं

ओलिवर वेंडेल होम्स ने लिखा है कि कराधान वह मूल्य है जिसे हम अपनी सभ्यता के लिए चुकाते हैं। लेकिन इसे यदि इस तरह से व्यक्त किया जाए कि कराधान हम वास्तव में सभ्यता के अभाव के लिए चुकाते हैं तो ज्यादा उचित होगा। यदि लोग अपनी, अपने परिवार और अपने आस-पास रह रहे जरूरतमंद लोगों की बेहतर देखभाल स्वयं करने लगें तो सरकार खुद-ब-खुद पीछे हट

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