सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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नंदन नीलेकणी की अगुआई में सशर्त नकद हस्तांतरण (कंडीशनल कैश ट्रांसफर या सीसीटी ) के लिए एक मंत्रीस्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया गया है, जो मुख्य तौर पर केरोसिन, एलपीजी (रसोई गैस) और खाद में सीसीटी आजमाने पर विचार करेगा। अगले चार महीनों में हमारे सामने एक योजना होगी। इस वित्त वर्ष के अंत तक प्रायोगिक स्तर पर आरंभिक परीक्षण शुरू हो जाएगा और फिर 2012-13 के बजट में इसे पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। कुछ इसी हिसाब से काम के आगे बढ़ने की उमीद की जानी चाहिए।

यहां टास्क फोर्स जैसे शब्द का इस्तेमाल एक मायने में रोचक है। टास्क फोर्स मूल रूप से सैन्य

पिछले साल ‘सबल भारत’ के आंदोलन ‘मेरी जाति हिंदुस्तानी’ ने देश में कुछ ऐसी जागृति फैलाई कि सरकार को जनगणना से जाति को बाहर करना पड़ा। इस आंदोलन के पास न जन-शक्ति थी, न धन-शक्ति और न ही मीडिया-शक्ति। सिर्फ विचार-शक्ति ने हमारे राजनीतिक नेताओं को जरा हिलाया, जगाया और दोबारा सोचने पर बाध्य किया। हड़बड़ी में किए गए इस निर्णय को उन्होंने वापस लिया और केंद्र सरकार ने उन सहयोगी दलों के आगे घुटने नहीं टेके, जो अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए इस देश को जातिवादी खाई में गिराने का संकल्प ले चुके थे। सरकार की इस दृढ़ता और चतुराई की जितनी सराहना की जाए, कम है

जिन लोगों ने अन्ना हजारे के आंदोलन पर कीचड़ उछालने की कोशिश की वे भूल गए कि भारत में हमेशा से मजबूत समाज और कमजोर सरकार रही है। 8 अप्रैल, 2011 को अन्ना हजारे के भूख हड़ताल खत्म करने से एक दिन पहले मैं काहिरा में लोकतांत्रिक आंदोलन के उदारवादी सदस्यों के सामने मिस्र के भविष्य का भारतीय मॉडल पेश कर रहा था। सम्मेलन के बाद हममें से कुछ तहरीर चौक पर घूमने गए थे, जहां सरकार के खिलाफ प्रचंड आंदोलन हुआ था। अचानक मैंने खुद को मंच पर पाया और अल हिंद के करीब 37,000 प्रदर्शनकारियों को अपनी शुभकामनाएं दीं। अगले तीन मिनट तक मैं भारतीय लोकतंत्र के सबक के बारे में बताने की कोशिश करता

कोलकाता की अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय के भीतर का नजारा देखकर अंदाजा हो जाता है कि आखिर क्यों यह पार्टी ममता बनर्जी के ‘परिबोर्तन’ यानी बदलाव के नारे के आगे असहाय हो गयी। कुछ समय पहले कोलकाता में एक यात्रा के दौरान मेरे अनुभव बहुत रोचक हैं. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के इंतजार में बैठने से पहले हमें कुछ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। बड़े से कमरे में हलकी रोशनी है, जिसमें रखी कुरसी पर बैठकर आप अपने स्कूल के परीक्षा वाले दिनों में खो जाते हैं। आसपास का दृश्य अतियथार्थवाद की बुनावट-सा लगता है। दीवार पर करीने से गुजरे

आजादी के बाद अनशन तो कई हुए, लेकिन अन्ना हजारे का अनशन अपूर्व था| इतने कम समय में इतनी जबर्दस्त प्रतिक्रिया पहले कभी नहीं हुई| श्रीरामुलू के अनशन ने आंध्रप्रदेश बनाया और तारासिंह और फतेह सिंह के अनशन ने पंजाब बनाया| अन्ना के अनशन ने अभी तक कुछ नहीं बनाया| लोकपाल भी नहीं| लेकिन इस अनशन ने सब सीमाएं तोड़ दीं| प्रांत, भाषा, जाति, मज़हब – कोई भी दीवार टिक न सकी| मानो पूरे देश में तूफान आ गया| चार-पांच दिन में ही सरकार की अकड़ ढीली पड़ गई| उसने घुटने टेक दिए|

आखिरकार यह अहिंसक चमत्कार हुआ कैसे? क्या रहस्य है, इसका! अन्ना हजारे

इस साल हम भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की 20वीं वर्षगांठ मना रहे है। आर्थिक सुधारों से हमने क्या हासिल किया है? आज हम किस स्थिति में है? क्रिकेट विश्व कप में भारत की जीत आत्मविश्वास का परिणाम है। यह वही आत्मविश्वास है, जो हमारे उद्यमियों को आगे बढ़ा रहा है और जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना दिया है। आत्मविश्वास की यह राष्ट्रीय भावना 1991 से उभरनी शुरू हुई थी।

1991 का साल भारत के इतिहास में मील का पत्थर है। इस साल हमें अपनी आर्थिक स्वतंत्रता मिली थी। 1947 में हमने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता

विकास और सामाजिक खर्च को लेकर पिछले एक-दो महीने से इंटरनेट पर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा शुरू किए गए इस बहस में नोबल पुरस्कार विजेता और जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि सामाजिक खर्च में वृद्धि नहीं कर सिर्फ दोहरे अंकों की विकास दर हासिल करने पर ध्यान देना नासमझी होगी। समाचार पत्र ने इसके जवाब में नोबेल पुरस्कार के एक दूसरे दावेदार जगदीश भगवती को भी उद्धृत किया, जिन्होंने कहा कि सामाजिक खर्च बढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे बेहतर तरीके से लक्षित किया जाए और उसके लिए अधिक-से-अधिक धन की व्यवस्था करने

(आर्थिक खुलेपन, जिसकी शुरुआत 1991 में हुई, के ज़रिये भले ही भारत में समृद्धि आई, लेकिन इसके लिए राजनीतिक जमीन तैयार नहीं हो पाई)

केंद्र सरकार ने हाल ही मे देश का सलाना आर्थिक बजट पेश किया। इसके साथ ही नई आर्थिक नीति को अपनाए हुए लगभग 20 साल पूरे हो गए, जब भारत ने अपनी उन अधिकतर पुरानी आर्थिक नीतियों का त्याग कर दिया था, जिसने 1991 के शुरुआती महीनों में भारत को कंगाली की कगार पर ला खड़ा किया था।

उस वर्ष नाटकीय रूप से उदारीकरण की नीतियों को अपनाने और 1990 के दशक के आखिरी सालों में किए गए कुछ नीतिगत बदलावों को कुछ

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