सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर बहस अंततः समाप्त हो गई। उम्मीद है कि अब इसने उन अन्य गरमागरम बहसों की आत्माओं के बीच अपनी शांतिपूर्ण जगह बना ली होगी, जिनसे हमारा लोकतांत्रिक देश यदा कदा गुजरता रहता है। हर समय लगता है मानो यह हमारे जीवन मरण का मुद्दा हो और हम विनाश के कगार पर खड़ें हों। अगर आप उनमें से हैं, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विरोधियों द्वारा की गई बर्बादी की भविष्यवाणियों से डरते हैं तो यहां प्रस्तुत है इसी तरह की पहले हुई कुछ बहसों का छोटा सा इतिहास। यह बताने के लिए कि लाखों भारतीय नौकरी से निकालकर फेंक नहीं दिए जाएंगे। और भारत वॉलमार्ट या टेस्को का

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गरीब और कमजोर तबकों तक सरकारी मदद नकदी की शक्ल में पहुंचाने की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। अभी ऐसी सारी योजनाएं- चाहे वे वृद्ध और विधवा पेंशन की हो या कमजोर वर्ग के स्कूली बच्चों के स्कॉलरशिप की, या फिर गर्भवती स्त्रियों को अच्छा खाना देने की- ज्यादातर अफसरों और बिचौलियों का बैक बैलेंस बढ़ाने और बड़ी मात्रा में कालाधन पैदा करने के ही काम आ रही है। यह पैसा सीधे जरूरतमंदों तक पहुंचाने को यूपीए-2 की योजना भले ही राजनैतिक मकसद को ध्यान में रखकर थोड़ी जल्दबाजी में लाई जा रही हो, लेकिन इसका फायदा ऐसे लोगों के अलावा हमारी अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा।

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राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मंदी की चर्चा एक बार फिर जोर पकड़ रही है। आर्थिक विकास के दर का अध्ययन करने वाली तमाम संस्थाएं दुनियाभर में मंदी को आसन्न मान रहीं हैं। प्रतिक्रिया स्वरूप सबसे पहले अमेरिका जैसे देश ने अपनी अर्थव्यवस्था को मंदी से अप्रभावित रखने और व्यवसायियों को फौरी राहत देने के तौर पर संरक्षणवाद का लबादा ओढ़ना शुरू कर दिया है। पहले से ही कर्ज के संकट में घिरे यूरोप और उसके बाद जापान, चीन और भारत में आर्थिक विकास की धीमी पड़ती रफ्तार, मंदी के अंदेशे को हवा देने के लिए काफी है।

यद्यपि आर्थिक विकास की दर अलग अलग देशों में अलग अलग

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यह महज संयोग ही है कि जिस समय म्यांमार की लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की चालीस साल बाद भारत के दौरे पर थीं, ठीक उसी समय हमारे पड़ोस चीन में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) की 18वीं कांग्रेस की बैठक का आयोजन किया जा रहा था। दुनियाभर में इस कांग्रेस पर सबकी निगाहें थीं। खासकर भारत के लिए तो एक पड़ोसी होने के नाते यह और भी अहम था। जहां बरसों की नजरबंदी के बाद रिहा हुई सू की लोकतंत्र की पड़ताल करने के लिए इन दिनों लोकतांत्रिक देशों का दौरा कर रही हैं, वहीं चीन में इन दिनों पिछले पचास साल से चले आ रहे माओवादी ढांचे को तोड़ने की छटपटाहट साफ नजर आ रही है।

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हम गरीब क्यों हैं? हमारा मुल्क विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां दुनिया के ज्यादातर गरीब भी बसते हैं। लिहाजा कोई भी व्यक्ति यही सोचेगा कि यह सवाल ही हर राजनीतिक बहस के केंद्र में होगा। वह यह भी सोच सकता है कि हम इस तरह के विषयों पर गहन व दिलचस्प बहस-परिचर्चाएं करते होंगे कि गरीबी के क्या कारण हैं ? अमीर बनने के लिए देश के तौर पर हम क्या कर सकते हैं ? तथा दुनिया के बाकी हिस्सों में इस दिशा में क्या कारगर कदम उठाए जा रहे हैं ? आखिरकार भारत के तकरीबन सवा अरब लोगों की सर्वाधिक उत्कट उम्मीदें व आकांक्षाएं किसी न किसी तरह से अपने अमीर होने से

विश्व पटल पर मार्क्सवाद, माओवाद व लेनिनवाद के एकमात्र विशुद्ध (अघोषित) झंडाबरदार चीन में विगत तीन दशकों में परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। एक तरफ जहां उदारवाद ने तेजी से पांव पसारे हैं वहीं माओ व माओवाद हाशिए पर पहुंच गया है। वर्तमान चीन व चीनी जनता ज्यादा से ज्यादा धन कमाना चाहती है और वह जान चुकी है कि आर्थिक उदारीकरण ही इसके लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय है। हालांकि इसकी नींव डैंग झायोपिंग और जियांग जिमेन के शासनकाल में ही पड़ गई थी और चीन के बुनियादी स्वरूप में बदलाव का आधार तय हो गया था। इसके साथ यह भी स्पष्ट हो गया था कि माओ जिस चीनी लोक गणराज्य को स्थापित किया था

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‘देर आए, दुरुस्त आए’। यह मुहावरा केंद्र सरकार की सब्सिडी के बदले सीधे बैंक में “कैश ट्रांसफर” योजना पर बिल्कुल सटीक बैठता है। सिर्फ जरूरतमंदों को सब्सिडी का लाभ प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई कैश ट्रांसफर योजना अपने प्रायौगिक चरण में ही सकारात्मक परिणाम देने लगी है। बात चाहे राजस्थान के अलवर जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सब्सिडाइज्ड रेट पर कैरोसिन तेल बांटने की जगह सब्सिडी के बराबर की धनराशि सीधे बैंक में जमा करने के कदम की हो या कर्नाटक के मैसूर जिले में गैस सिलेंडर पर दी जाने वाली सब्सिडी के बराबर कैश ट्रांसफर की। दोनों मामलों में जिस तरह के

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आमतौर पर सब्सिडी इसलिए दी जाती है कि समाज के कमजोर वर्र्गो की जरूरी सेवाओं तक पहुंच बन सके, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इसका उल्टा हो रहा है। कृषि के लिए डीजल पर दी जाने वाली सब्सिडी का फायदा लग्जरी गाडि़यों वाले उठा रहे हैं। इसी तरह यूरिया पर दी जाने वाली सब्सिडी का दुरुपयोग हो रहा है। पिछले दिनों आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने यूरिया की कीमतें ढाई रुपये प्रति बोरी बढ़ाने के साथ ही यूरिया को नियंत्रणमुक्त कर इसके तहत दी जाने वाली सब्सिडी को सीधे किसानों के खाते में डालने का फैसला किया। फिलहाल इसे प्रायोगिक तौर पर देश के 10 जिलों में लागू किया जाएगा।

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