सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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यह महज संयोग ही है कि जिस समय म्यांमार की लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की चालीस साल बाद भारत के दौरे पर थीं, ठीक उसी समय हमारे पड़ोस चीन में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) की 18वीं कांग्रेस की बैठक का आयोजन किया जा रहा था। दुनियाभर में इस कांग्रेस पर सबकी निगाहें थीं। खासकर भारत के लिए तो एक पड़ोसी होने के नाते यह और भी अहम था। जहां बरसों की नजरबंदी के बाद रिहा हुई सू की लोकतंत्र की पड़ताल करने के लिए इन दिनों लोकतांत्रिक देशों का दौरा कर रही हैं, वहीं चीन में इन दिनों पिछले पचास साल से चले आ रहे माओवादी ढांचे को तोड़ने की छटपटाहट साफ नजर आ रही है।

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हम गरीब क्यों हैं? हमारा मुल्क विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां दुनिया के ज्यादातर गरीब भी बसते हैं। लिहाजा कोई भी व्यक्ति यही सोचेगा कि यह सवाल ही हर राजनीतिक बहस के केंद्र में होगा। वह यह भी सोच सकता है कि हम इस तरह के विषयों पर गहन व दिलचस्प बहस-परिचर्चाएं करते होंगे कि गरीबी के क्या कारण हैं ? अमीर बनने के लिए देश के तौर पर हम क्या कर सकते हैं ? तथा दुनिया के बाकी हिस्सों में इस दिशा में क्या कारगर कदम उठाए जा रहे हैं ? आखिरकार भारत के तकरीबन सवा अरब लोगों की सर्वाधिक उत्कट उम्मीदें व आकांक्षाएं किसी न किसी तरह से अपने अमीर होने से

विश्व पटल पर मार्क्सवाद, माओवाद व लेनिनवाद के एकमात्र विशुद्ध (अघोषित) झंडाबरदार चीन में विगत तीन दशकों में परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। एक तरफ जहां उदारवाद ने तेजी से पांव पसारे हैं वहीं माओ व माओवाद हाशिए पर पहुंच गया है। वर्तमान चीन व चीनी जनता ज्यादा से ज्यादा धन कमाना चाहती है और वह जान चुकी है कि आर्थिक उदारीकरण ही इसके लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय है। हालांकि इसकी नींव डैंग झायोपिंग और जियांग जिमेन के शासनकाल में ही पड़ गई थी और चीन के बुनियादी स्वरूप में बदलाव का आधार तय हो गया था। इसके साथ यह भी स्पष्ट हो गया था कि माओ जिस चीनी लोक गणराज्य को स्थापित किया था

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‘देर आए, दुरुस्त आए’। यह मुहावरा केंद्र सरकार की सब्सिडी के बदले सीधे बैंक में “कैश ट्रांसफर” योजना पर बिल्कुल सटीक बैठता है। सिर्फ जरूरतमंदों को सब्सिडी का लाभ प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई कैश ट्रांसफर योजना अपने प्रायौगिक चरण में ही सकारात्मक परिणाम देने लगी है। बात चाहे राजस्थान के अलवर जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सब्सिडाइज्ड रेट पर कैरोसिन तेल बांटने की जगह सब्सिडी के बराबर की धनराशि सीधे बैंक में जमा करने के कदम की हो या कर्नाटक के मैसूर जिले में गैस सिलेंडर पर दी जाने वाली सब्सिडी के बराबर कैश ट्रांसफर की। दोनों मामलों में जिस तरह के

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आमतौर पर सब्सिडी इसलिए दी जाती है कि समाज के कमजोर वर्र्गो की जरूरी सेवाओं तक पहुंच बन सके, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इसका उल्टा हो रहा है। कृषि के लिए डीजल पर दी जाने वाली सब्सिडी का फायदा लग्जरी गाडि़यों वाले उठा रहे हैं। इसी तरह यूरिया पर दी जाने वाली सब्सिडी का दुरुपयोग हो रहा है। पिछले दिनों आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने यूरिया की कीमतें ढाई रुपये प्रति बोरी बढ़ाने के साथ ही यूरिया को नियंत्रणमुक्त कर इसके तहत दी जाने वाली सब्सिडी को सीधे किसानों के खाते में डालने का फैसला किया। फिलहाल इसे प्रायोगिक तौर पर देश के 10 जिलों में लागू किया जाएगा।

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केंद्र सरकार द्वारा वंचित व कमजोर वर्ग को गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित कराने के लिए लागू किया गया शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून स्वयं ही सर्वशिक्षा अभियान की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होता प्रतीत हो रहा है। कानून में समाहित कुछ प्रावधान ऐसे हैं जिनसे देशभर के लाखों निजी (बजट) प्राइवेट स्कूल बंद होने की कगार पर पहूंच गए हैं। अकेले दिल्ली में ही 13 हजार से ज्यादा स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा मंडरा रहा है। इसके साथ ही इन स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों नौनिहालों का भविष्य भी अंधकारमय हो गया है। दुष्परिणामों से भरे आरटीई के इन्हीं प्रावधानों के खिलाफ आवाज उठाने के

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वित्तीय घाटे का विचित्र इलाज सार्वजनिक इकाइयों के शेयर बेचकर सरकार अपना वित्तीय घाटा पूरा करना चाहती है। सरकार की आमदनी कम हो और खर्च ज्यादा हो तो अंतर को वित्तीय घाटा कहा जाता है। वर्तमान में वित्तीय घाटा तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि खाद्य पदार्थो, डीजल एवं फर्टिलाइजर पर दी जा रही सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा है। चिदंबरम की सोच है कि सरकारी कंपनियों के शेयर बेचकर इस घाटे की भरपाई कर ली जाए। पेंच है कि पूंजी प्राप्ति का उपयोग चालू खर्च के पोषण के लिए किया जाना है। पूंजी प्राप्ति में जमीन, शेयर, मकान, मशीन आदि की बिक्री आती है। जैसे प्रिंटिंग प्रेस का मालिक या पूर्व में खरीदे गए

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सम्पूर्ण विश्व में शहरीकरण श्रम विभाजन की सहायता से समृद्धि बढ़ाता है। इसलिए भारत जैसे देशों में शहरीकरण को संपन्नता बढ़ाने के साधन के रूप में अपनाना सरकार के पिछले 50 वर्षों के प्रयासों (ग्रामीण विकास के नाम पर निर्रथक धन का व्यय) की अपेक्षा बेहतर विकल्प है। अभी हाल ही के आर्थर एंडरसन फार्च्यून के विश्वव्यापी सर्वे में भारत के शहरों को सबसे खस्ताहाल स्थिति में पाया गया। निश्चित ही संपन्न देश होने का यह तरीका नहीं है।

सामान्य कुप्रशासन के अलावा, सड़कों की बदतर

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