सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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अमेरिका में वॉलमार्ट कंपनी की लॉबिंग की रिपोर्ट पर भारतीय संसद में गतिरोध खड़ा करने वाली पार्टियों का मुद्दा क्या है, इसे सहजता से नहीं समझा जा सकता। अगर वॉलमार्ट या उसकी तरफ से लॉबिंग के लिए नियुक्त कंपनी ‘पैटन बॉग्स’ ने भारत में किसी को रिश्वत दी तो यह आपराधिक मामला होगा। लेकिन प्रारंभिक रूप से इसके कोई संकेत नहीं हैं। वैसे भी एक वकील ने यह मसला सुप्रीम कोर्ट के सामने रख दिया है। सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में उपलब्ध तमाम तथ्यों की रोशनी में अपना फैसला देगा।

जहां तक लॉबिंग का प्रश्न है, तो जैसा कि अमेरिकी सरकार और वॉलमार्ट दोनों ने सफाई दी है

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उदाहरण के लिए चीनी व्स्तुओं पर प्रतिबंध उनकी घटिया गुणवत्ता व इसके अर्थव्यवस्था व स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को रोकने के लिए लगाया गया है। लेकिन भारतीय बाजार चीनी वस्तुओं से भरे पड़े हैं और खिलौनों आदि में प्रयुक्त रंग के संपर्क में आने के कारण बच्चों को कैंसर, दिल व फेफड़े की बीमारी हो रही है। क्या ही अच्छा होता कि चीनी वस्तुओं के लिए भारतीय बाजार खोल दिए जाए लेकिन इसके पूर्व उनके लिए कड़े मानक तय कर दिए जाएं और उनका अनुपालन भी सुनिश्चित किया जाए। इससे देश को कई फायदे होंगे। एक तो प्रतिबंध समाप्त होने के कारण चीनी सामान वैध तरीके से कस्टम व आयात शुल्क अदा कर देश

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दिल्ली में एकबार फिर से पॉलीथिन के प्रयोग व इसकी खरीद-बिक्री को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 15 के तहत प्रतिबंध की अनदेखी करने वालों पर 10 हजार से एक लाख रूपए तक का आर्थिक दंड अथवा सात वर्ष तक की सजा अथवा दोनों का प्रावधान किया गया है। इसके पूर्व वर्ष 2009 में भी दिल्ली में प्लास्टिक के प्रयोग पर रोक लगाया गया था। लेकिन उस समय 40 माइक्रोन से मोटे प्लास्टिक व उससे निर्मित वस्तुओं, कैरीबैग आदि को प्रतिबंध से मुक्त रखा गया था। हाल ही में राजधानी में गुटखे पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि गुटखा, प्लास्टिक आदि के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर

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जब भी दिल्ली में आम उपभोक्ता सब्जियों की महंगाई को लेकर हायतौबा मचाते हैं तो अक्सर सरकार राजधानी की सबसे बड़ी थोक मंडी आजादपुर में खरीदी जाने वाली सब्जियों के थोक भावों का विज्ञापन छपवाती है। पिछले कई सालों से इन विज्ञापनों को जिन्होंने भी देखा है, वे जानते हैं कि इनसे साफ पता चलता है कि आज तक किसान को कभी भी पालक के लिए 10 रुपये किलो का रेट नहीं मिला। बथुआ, गोभी कभी भी सीजन में 10 रुपये किलो से ऊपर यहां किसानों से नहीं खरीदी गई। मूली के भाव सुनकर तो लगता है, जैसे हम रामराज में जी रहे हों। डेढ़ रुपये, दो रुपये किलो अक्सर मूली बिकती है।

मगर क्या

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नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल अलायंस के बैनर तले अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त थिंकटैंक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) द्वारा आयोजित एक दिवसीय “निसा स्कूल लीडर्स सम्मिट” यूं तो बुधवार की देर रात संपन्न हो गया, लेकिन सम्मिट में उपस्थित स्कूल संचालकों व शिक्षाविदो ने स्कूली शिक्षा की बेहतरी के लिए शुरू किए गए अभियान रूपी इस मशाल को हमेशा जलाए रखने का संकल्प लिया। स्कूली शिक्षा की बेहतरी, छात्रों व अभिभावकों को बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने, शिक्षण प्रशिक्षण के श्रेष्ठ तौर तरीकों और सरकारी नीतियों के कारण बंदी के कगार पर पहुंच चुके निजी बजट स्कूलों की सहायता के लिए आयोजित इस

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खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर बहस अंततः समाप्त हो गई। उम्मीद है कि अब इसने उन अन्य गरमागरम बहसों की आत्माओं के बीच अपनी शांतिपूर्ण जगह बना ली होगी, जिनसे हमारा लोकतांत्रिक देश यदा कदा गुजरता रहता है। हर समय लगता है मानो यह हमारे जीवन मरण का मुद्दा हो और हम विनाश के कगार पर खड़ें हों। अगर आप उनमें से हैं, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विरोधियों द्वारा की गई बर्बादी की भविष्यवाणियों से डरते हैं तो यहां प्रस्तुत है इसी तरह की पहले हुई कुछ बहसों का छोटा सा इतिहास। यह बताने के लिए कि लाखों भारतीय नौकरी से निकालकर फेंक नहीं दिए जाएंगे। और भारत वॉलमार्ट या टेस्को का

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गरीब और कमजोर तबकों तक सरकारी मदद नकदी की शक्ल में पहुंचाने की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। अभी ऐसी सारी योजनाएं- चाहे वे वृद्ध और विधवा पेंशन की हो या कमजोर वर्ग के स्कूली बच्चों के स्कॉलरशिप की, या फिर गर्भवती स्त्रियों को अच्छा खाना देने की- ज्यादातर अफसरों और बिचौलियों का बैक बैलेंस बढ़ाने और बड़ी मात्रा में कालाधन पैदा करने के ही काम आ रही है। यह पैसा सीधे जरूरतमंदों तक पहुंचाने को यूपीए-2 की योजना भले ही राजनैतिक मकसद को ध्यान में रखकर थोड़ी जल्दबाजी में लाई जा रही हो, लेकिन इसका फायदा ऐसे लोगों के अलावा हमारी अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा।

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राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मंदी की चर्चा एक बार फिर जोर पकड़ रही है। आर्थिक विकास के दर का अध्ययन करने वाली तमाम संस्थाएं दुनियाभर में मंदी को आसन्न मान रहीं हैं। प्रतिक्रिया स्वरूप सबसे पहले अमेरिका जैसे देश ने अपनी अर्थव्यवस्था को मंदी से अप्रभावित रखने और व्यवसायियों को फौरी राहत देने के तौर पर संरक्षणवाद का लबादा ओढ़ना शुरू कर दिया है। पहले से ही कर्ज के संकट में घिरे यूरोप और उसके बाद जापान, चीन और भारत में आर्थिक विकास की धीमी पड़ती रफ्तार, मंदी के अंदेशे को हवा देने के लिए काफी है।

यद्यपि आर्थिक विकास की दर अलग अलग देशों में अलग अलग

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