सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

इस पेज पर विभिन्न लेखकों के गवर्नेंस पर लिखे गये लेख दिये गये हैं। पुरा लेख पढ़ने के लिये उसके शीर्षक पर क्लिक करें। आप लेख पर अपनी टिप्पणीयां भी भेज सकते हैं।

कुछ दिन पहले विश्व बैंक ने भारत और दुनिया में व्यवसाय करने की सुगमता से संबंधित अपनी वार्षिक सूची को जारी किया था। भारत ने रैंकिंग में 23 स्थान की छलांग लगाकर 2017 में 100 के मुकाबले इस वर्ष 77वां स्थान हासिल किया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह हमारे आर्थिक स्वास्थ्य या हमारे कारोबारी माहौल की स्थिति के अंतिम शब्द से बहुत दूर है। इसके विपरीत सोचना गलत होगा। भारतीय सरकारी व्यवस्था एक जटिल जानवर के समान है। सरकारी मशीनरी, प्रक्रिया और नियमों के स्तर पर राज्यों में बहुत अधिक भिन्नताएं हैं। देश को यदि व्यापक

मोदी सरकारी द्वारा नई शिक्षा नीति के मसौदे को तैयार करने के लिए गठित के. कस्तूरीरंगन कमेटी को हाल ही में चौथा विस्तार प्रदान किया गया है। अब इस कमेटी के पास नई शिक्षा नीति से संबंधित फाइनल ड्राफ्ट तैयार करने के लिए 15 दिसंबर तक का समय होगा। इसके पूर्व कमेटी को तीसरा कार्य विस्तार 30 अक्टूबर तक के लिए प्रदान किया गया था। मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी ने सरकार को ‘जीरो ड्रॉफ्ट’ सौंप दिया गया था, लेकिन सरकार की मंशा शायद इसे आम चुनावों तक टालने की ही प्रतीत होती है। खैर..

एक कहावत है कि देर आए, दुरूस्त आए ! शिक्षा नीति तैयार करने में सरकार

● स्कूल स्थापित करने और चलाने के लिए आवश्यक मौजूदा कठोर नियमोँ को जितनी जल्दी हो सके आसान किया जाना चाहिए
● शिक्षा के क्षेत्र में नव प्रवेशियों के लिए सरकार को ‘स्कूल खोलने और चलाने की सुगमता’ रैंकिंग अभियान की शुरूआत करनी चाहिए और स्कूलों को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त करने के नियमों और प्रक्रियाओं में बदलाव करना चाहिए

नरेंद्र मोदी सरकार ने देश में व्यवसाय शुरू करने हेतु सहूलियत देने के महत्व को समझा है और इस दिशा में उपाय भी किए हैं। विश्व बैंक की

● प्राइवेट स्कूल लर्निंग आउटकम के मामले में सरकारी स्कूलोँ से ज्यादा आगे नहीं हैं
● तो सरकारी स्कूलोँ में होने वाले दाखिलों में गिरावट क्यों देखने को मिल रही है?

वर्ष 2010-11 में, 4,435 सरकारी स्कूलोँ के शिक्षकोँ के वेतन पर 486 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। इन सभी स्कूलोँ में 14,000 शिक्षक अधिक थे। और इन सभी 4,435 स्कूलोँ में पढ़ने वाले बच्चोँ की कुल संख्या करीब शून्य थी।

वर्ष 2015-16 में, यह खर्च घटकर 152 करोड़ रुपये हो गया। शिक्षकोँ की संख्या घटकर 6,961 हो गई, यानि की इनकी संख्या में 50% तक

नए साल में नया संकल्प लेने का वक्त आ गया है। ऐसे में मैं एक नियम में सुधार की बात करूंगी, जो मेरे हिसाब से इस साल के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय है और वह है शिक्षा क्षेत्र को स्वतंत्रत किया जाए और स्कूलोँ को लाभ कमाने का अवसर दिया जाए।

250 मिलियन से भी अधिक छात्रोँ के साथ, भारत में स्कूल जाने वाले छात्रोँ की संख्या किसी भी देश के मुकाबले सबसे अधिक है। और सभी छात्रोँ की शैक्षिक जरूरतेँ पूरी करने

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्ष 2015 में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरूआत की गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य पक्षपाती लिंग चुयन की प्रक्रिया का उन्मूलन, बालिकाओं के अस्तित्व व सुरक्षा को सुनिश्चित करना और उनके लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था करना था। इसके लिए 100 करोड़ रूपए के आरंभिक कोष का प्रावधान भी किया गया। शुरू में इस अभियान के फायदे भी देखने को मिले। सोशल मीडिया पर काफी ट्रेंड हुए ‘सेल्फी विथ डॉटर’ और इसे मिले व्यापक जनसमर्थन ने पिछड़े व ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को भी विश्वास से ओत प्रोत किया। महिलाएं घरों से बाहर निकलने

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानी भारत की चुनाव प्रणाली आज बहस के केंद्र में है। सत्ताधारी दल भाजपा के साथ-साथ अनेक दलों, संस्थाओं और बुद्धिजीवियों का मानना है कि देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हों, इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। हालांकि एकसाथ चुनाव कराने के विचार से असहमति रखने वाले दलों की भी कोई कमी नहीं है। कांग्रेस सहित अनेक दल- जैसे तृणमूल कांग्रेस, बसपा, टीडीपी और कम्युनिस्ट पार्टी, ने एक साथ चुनाव कराने से असहमति व्यक्त की है। इस बहस में सहमति और असहमति के पाटों पर खड़े दो खेमों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन यह बहस आज के

देश में विभिन्न जातियों के द्वारा स्वयं को पिछड़ा और वंचित साबित करने की एक होड़ सी मची हुई है। जैसे-जैसे आम चुनावों का समय नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे विभिन्न जातियों/समूहों के द्वारा स्वयं को आरक्षित (पिछड़ा) वर्ग में शामिल करने की मांग लगातार तेज होती जा रही है। हरियाणा में जाट आंदोलन, राजस्थान में गुर्जर आंदोलन, गुजरात में पाटीदार आंदोलन और महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन इसका मजमून हैं। उधर, अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के मुद्दे पर वर्ष 2006 में एम. नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कारण पहले से उलझे

Pages