सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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लोकप्रिय हिंदी फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ की कहानी और हाल में कानून का रुप लेने वाले कृषि विधेयकों के बीच एक अप्रत्याशित और मजेदार समानता है। यह समानता चुनने की आजादी से जुड़ी हुई है। फिल्म में नायिका अपने पसंद के इंसान के साथ जिंदगी बिताने की आजादी चाहती है और उसका कड़क मिजाज वाला पिता अपने हिसाब से उसके भले की सोचते हुए, उसे इस तरह की आजादी नहीं देना चाहता। हालांकि हमें पिता के इरादे नेक लग सकते हैं, उसकी सोच नायिका के लिए तकलीफें पैदा करती है। इसी तरह से बहुत सारे किसान अपने कृषि उपज के लिए खरीदार चुनने की आजादी चाहते हैं लेकिन

कृषि की दशा और किसानों की आर्थिक अवस्था में सुधार के उद्देश्य से देश में तीन नए कानून बनाए गए हैं। ये कानून हैं कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। सरकार के मुताबिक पहले विधेयक का उद्देश्य एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण करना है जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी से बाहर फसल बेचने और खरीदने की आज़ादी होगी। दूसरे विधेयक का उद्देश्य कृषि करारों के संबंध में एक राष्ट्रीय तंत्र की स्थापना करना है जहां कृषि

भारतीय सात जनवरी की सुबह उठे तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के समर्थक यूएस कैपिटल में घुस गए थे। मौजूदा राष्ट्रपति द्वारा लोकतंत्र पर हमला करना, निष्पक्ष चुनाव को पलटने का प्रयास करना अमेरिकी इतिहास में मनहूस पल था। भारत में प्रतिक्रिया बंटी हुई थी। कुछ को चिंता थी कि कमजोर अमेरिका आक्रामक चीन पर नियंत्रण कर भारत की मदद नहीं कर पाएगा।

वहीं कुछ दुनियाभर को दशकों से लोकतंत्र पर ज्ञान देने वाले अमेरिका को खुद से ही उलझता देख खुश थे। वॉट्सऐप पर मैसेज फॉर्वर्ड

क्या केंद्र और पंजाब सरकार किसानों की आय का एक स्थायी समाधान तलाशने और पानी, मिट्टी और हवा को बर्बाद होने से बचाने के लिए हाथ मिला सकते हैं? केवल ऐसा करके ही वे पंजाब को फिर से महान बना सकते हैं।

कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब के किसान कंपकपाती सर्द रातों से जूझते हुए दिल्ली की सीमा पर आंदोलनरत हैं। उन्हें डर है कि नए कानून उनकी आय पर विपरीत प्रभाव डालेंगे। इसमें कोई गलत बात नहीं है क्योंकि प्रत्येक नागरिक अपनी मौजूदा आय को न केवल सुरक्षित रखना चाहता है बल्कि उसमें

संतोष गानर महाराष्ट्र के तटीय इलाके में स्थित रायगढ़ में दो एकड़ जमीन के मालिक हैं। यह जगह अल्फांज़ो आम के लिए विख्यात है। इसके बावजूद उन्होंने अत्यधिक मुनाफा दिलाने वाले आम की बजाय सस्ता चावल उगाने का विकल्प चुना है। जब मैंने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें भी आम उगाना पसंद है। चावल की खेती से उन्हें प्रति एकड़ 30 हजार रूपये ही प्राप्त होते हैं जबकि आम उगाने से उन्हें इससे दस गुना अधिक आय हो सकती है। लेकिन वह इस काम के लिए आवश्यक आरंभिक निवेश को वहन नहीं कर सकते थे, न ही वे पेड़ से फल प्राप्त करने के लिए पांच साल तक की

एक पुरानी कहावत है - अमेरिकी लोगों की बुद्धिमता को कम आंक कर किसी का आर्थिक नुकसान नहीं हुआ अर्थात अमेरिकियों को आसानी से फुसलाकर पैसे कमाए जा सकते हैं। यदि आप इस पर आगे विचार करें तो उन्हें अधिक बुद्धिमान आंकना संभवतः ज्यादा कारगर होगा। यदि आप इस विषय पर और अधिक विचार करें तो पाएंगे कि ऐसी स्थिति सभी लोकतंत्रों के साथ है। और यदि आप में थोड़ा अधिक धैर्य है और आप और अधिक विचार करते हैं तो आप पाएंगे कि कहावत में ‘अमेरिकी लोगों’ के स्थान पर ‘भारतीय लोग’ ज्यादा सटीक बैठता है। विशेषकर वर्तमान में जारी उन बहसों के परिपेक्ष्य में जो बहु प्रतीक्षित

- लॉकडाउन 1 के दौरान से स्कूलों के खुलने पर लगी रोक के दुष्परिणाम दूरगामी होंगे
- मॉल्स, थिएटर्स, पार्क खोलने की मिल चुकी है अनुमति, शादी समारोहों पर भी नहीं है रोक
- सरकारी और बजट स्कू लों के छात्रों का शैक्षणिक भविष्य खतरे में, स्कूल ड्रॉपआउट्स की संख्या में वृद्धि का आशंका बलवती

कोरोना महामारी के विस्तार को रोकने के लिए मार्च 2019 से लागू किया गया देशव्यापी लॉकडाउन कुछ प्रतिबंधों और दिशा निर्देशों के साथ लगभग लगभग समाप्त हो गया है। देश के अनलॉक

किसानों का एक तबका आंदोलन कर रहा है, जो झूठे प्रचारों के द्वारा गुमराह हैं। जबकि दूसरी तरफ खेती किसानी करने वाले बहुसंख्यक किसान जो कि दलित और गरीब हैं, अपनी अनुपस्थित के साथ सुस्पष्ट हैं।

वर्ष 2019 की अप्रैल की शुरुआत में भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) ने ‘किसानों की आजादी के लिए घोषणा पत्र’ (फारमर्स मेनिफेस्टो फॉर फ्रीडम) जारी किया। यह एक प्रगतिशील दस्तावेज था जिसमें कहा गया था कि ‘ब्रिटिश औपनिवेशक कानूनों से स्वतंत्रता प्राप्त होने के सात दशकों के बीत जाने के बाद भी किसान, जो

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