सार्वजनिक नीति - गवर्नेंस लेख

सरकारी शासन में अपशिष्ट, कपट और दुरूपयोग को कम करना

भारत में बहुत से समुदायों की आधारभूत सेवाओं जैसे पानी, बिजली और परिवहन तक पहुंच नहीं होती है। सरकार नागरिकों के प्रति अपने कार्य निष्पादन के लिए न तो पारदर्शी होती है और न ही जवाबदेह।

नागरिक समाज केन्द्र सरकारी कार्यक्रमों की कुशलता और प्रभावोत्पादकता में सुधार ला रहा है और सुविज्ञ नागरिक वर्ग का निर्माण कर रहा है। सार्वजनिक नीति बैठकों, विचार विमर्शों और प्रकाशनों के माधयम से केन्द्र नई सार्वजनिक प्रबन्धान पध्दतियों और विकेन्द्रीकृत शासन ढांचों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रहा है। पहले से उपलब्ध कराई गई इसकी नागरिक पुस्तिका में सरकारी बजटों, विभिन्न राज्यों में प्रबन्ध व्यवस्था और कार्यक्रमों को अमली रूप देने के बारे में गैर-दस्तावेजी सूचना दी गई है।

केन्द्र का ''प्रकाशित करने का कर्तव्य'' अभियान यह मांग करता है कि सरकार अग्रलक्षी रूप से नागरिकों के साथ सूचना का आदान-प्रदान करे। महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा हुआ है कि कर-दाता के धन का उपयोग कैसे किया जाये।

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भारत सरकार द्वारा हाल ही में घोषणा की गई है कि भारत अब अपना एक बैड बैंक स्थापित करेगा। इस फैसले का एक तरफ जहां बड़े उत्साह के साथ स्वागत किया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ कई लोगों ने बैड बैंक स्थापित करने के विचार पर भले ही असंतोष नहीं जताया हो लेकिन इसे लेकर अपनी चिंताएं अवश्य जाहीर की हैं।

बैड बैंक की परिकल्पना का इतिहास 1988 में तब शुरु हुआ जब मेलन बैंक के द्वारा अपनी सहायक इकाई के 1.4 बिलियन डॉलर के बेकार ऋणों को अलग करने के लिए बैड बैंक स्थापित करने की रणनीति बनाई गई। यह परिकल्पना प्रत्येक वित्तीय संकट वाले दौर में वापसी करती है। यूएसए में वर्ष

सुधार की राह कभी भी आसान नहीं रही है। कड़े और संरचनात्मक सुधार के कारण चुनाव के दौरान चुनौतियों का सामना करना पड़ता है किंतु आपदा सदैव अपने साथ परिवर्तन के अवसर लेकर आती है और महामारी ने भी केंद्र सरकार को सुधार का ऐसा ही अवसर प्रदान किया है।

उदाहरण के लिए, 1991 का उदारीकरण भी उस समय देय राशि के संबंध में उत्पन्न हुए भुगतान संकट की पृष्ठभूमि में पारित किया गया था। यह भारत के आधुनिकीकरण की ओर एक महत्वपूर्ण कदम था लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव बड़ा समर्थन खो बैठे।

ऐसा कहा जा रहा है कि सरकार वाहनों को नष्ट करने के बाबत एक नीति लाने को लेकर काफी उत्सुक है, जिसके तहत पुराने वाहनों को नष्ट करना अनिवार्य किया जाएगा या फिर उन्हें स्वयं नष्ट करने वालों को कुछ सब्सिडी प्रदान की जाएगी। ऐसा करने का एक उद्देश्य नई कारों की मांग में वृद्धि कर ऑटो इंडस्ट्री को बढ़ावा देना है। वर्ष 2008 में आई मंदी के बाद यूएस और यूरोप में वाहनों को नष्ट करने के प्रति प्रोत्साहित करने के पीछे वास्तव में यही उद्देश्य था। दूसरा उद्देश्य प्रदूषण को कम करना है, चूंकि पुराने वाहन आमतौर पर नए वाहनों की तुलना में अधिक प्रदूषण युक्त वायु

दिल्ली के बॉर्डर पर पिछले 100 दिनों से जारी किसान आंदोलन के बीच राजनैतिक दलों और राज्य सरकारों के बीच भी सियासी प्रतिस्पर्धा जारी है। यह प्रतिस्पर्धा स्वयं को किसानों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की है। किसानों (वोट) को अपने साथ लाने के लिए पहले पंजाब सरकार और उसके बाद राजस्थान सरकार द्वारा संशोधित कृषि कानून लाए गए। इन कानूनों का उद्देश्य केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों के कारण किसानों के होने वाले ‘नुकसान’ को कम करना है। आज बात करते हैं राजस्थान सरकार द्वारा पारित तीन कृषि संशोधन विधेयकों की।

संकट काल से गुजर रही भारतीय कृषि से जुड़ी आम राय के संदर्भ में कृषि कानूनों पर स्पष्ट मत विभाजन का विश्लेषण और बयानबाजी से आगे बढ़ने के संभावित तरीके।

देश का सबसे बड़ा निजी क्षेत्र होने के बावजूद भारतीय कृषि आज की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक विनियमित, प्रतिबंधित और निषिद्ध क्षेत्र है। इन अड़चनों के बावजूद भारतीय किसानों ने देश को खाद्यान्नों के अभाव से अधिशेष की स्थिति में पहुंचा कर एक चमत्कार ही किया है। लेकिन इसे हासिल करने के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है, क्योंकि आज इस क्षेत्र

क्या हम कृषि के क्षेत्र में विकास करना चाहते हैं जो कि आर्थिक रूप से टिकाऊ भी हो, या फिर एमएसपी और एसएपी के वर्चस्व के कारण पैदा हुआ चावल, गेंहू और चीनी वाला झमेला?

नए कृषि कानून पारित किये जाने के मुद्दे पर भारत का लोकतंत्र अपने पूरे रौ में था। एक तरफ जहां सरकार इसे एक ऐतिहासिक फैसला बता रही थी, और मैं उससे सहमत होता प्रतीत हो रहा था, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों ने इसे ‘किसानों के लिए काला दिन’ और ‘कारपोरेट शार्क के हाथों बेच दिये जाने’ आदि के तौर पर प्रचारित

कोविड 19 संक्रमण के प्रसार को रोकने के उद्देश्य से वर्ष 2020 के शुरुआती महीनों में देश राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लागू किया गया। लॉकडाउन के दौरान अपरिहार्य कार्यों और सेवाओं को छोड़ सभी प्रकार की गतिविधियों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया। लगभग दो महीने तक जारी रहे टोटल लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से धीरे समाप्त किया जाने लगा और छह माह के भीतर कुछ सावधानियों और सुरक्षा उपायों के साथ देश चरणबद्ध तरीके से अनलॉक हो गया। हालांकि कोविड 19 संक्रमण के प्रसार के कारण लागू किया गया लॉकडाउन स्कूलों पर जारी रहा। हाल ही में कुछ राज्यों द्वारा 10वीं और

लोकप्रिय हिंदी फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ की कहानी और हाल में कानून का रुप लेने वाले कृषि विधेयकों के बीच एक अप्रत्याशित और मजेदार समानता है। यह समानता चुनने की आजादी से जुड़ी हुई है। फिल्म में नायिका अपने पसंद के इंसान के साथ जिंदगी बिताने की आजादी चाहती है और उसका कड़क मिजाज वाला पिता अपने हिसाब से उसके भले की सोचते हुए, उसे इस तरह की आजादी नहीं देना चाहता। हालांकि हमें पिता के इरादे नेक लग सकते हैं, उसकी सोच नायिका के लिए तकलीफें पैदा करती है। इसी तरह से बहुत सारे किसान अपने कृषि उपज के लिए खरीदार चुनने की आजादी चाहते हैं लेकिन

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