सरकारी अधिग्रहण के लिए वैश्विक ठेके

हाल ही में अमेरिका के ओहायो प्रांत के गवर्नर स्ट्रीकलैंड ने नौकरियों के सृजन के लिए उन कंपनियों के लिए आउटसोर्स पर प्रतिबंध लगा दिया जिन्हें सरकारी फंड्स के जरिए मदद नहीं पहुंचाई जाती है। ओहायो के गवर्नर के इस फैसले का भारत में काफी विरोध हुआ। हालांकि इस हो हल्ले का कोई फायदा नहीं मिला। गौर करने वाली बात ये भी है कि अमेरिका और अमेरिकी राज्यों में हमारी देसी आईटी कंपनियों का निर्यात सीमित मात्रा में ही होता है।

हाल ही में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि वे अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान इस फैसले पर अमेरिकी प्रशासन के साथ अपना एतराज दर्ज करवाएंगे। लेकिन ये एक कूटनीतिक खाना पूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं था।

अमेरिका में बेरोजगारी की दर 9.5 फीसदी के स्तर पर है, राष्ट्रपति बराक ओबामा की लोकप्रियता में 3.5 फीसदी की गिरावट आई है और हाल ही मे हुए कांग्रेसनल चुनाव में उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी को खासा नुकसान हुआ है। ओहायो के गवर्नर ने  भी  जनता को खुश करने के लिए इस तरह का कदम उठाया है।

बराक ओबामा भी ये ऐलान कर चुके हैं कि विदेशों में काम करने वाली अमेरिकी कंपनियों को वहां टैक्स में छूट नहीं दी जाएगी। दूसरे देशों से अमेरिका में काम करने के लिए आने वाले इंजीनियर्स के लिए वीजा की रकम भी बढ़ा दी गई है। ये सब इसलिए किया जा रहा है कि ज्यादा से ज्यादा अमेरिकियों को नौकरी मिल सके। इन फैसलों को अमेरिकियों का स्वदेशी अंदाज भी कहा जा सकता है। साल 2001 की मंदी के बाद भी अमेरिका में इसी तरह के कदम उठाए गए थे। उस समय अमेरिकी राजनीतिज्ञों ने “अमेरिकी नौकरियों ने देश के बाहर” जाने के खिलाफ आवाज उठाई थी।

यह फैसला घरेलू फायदे का हो सकता है लेकिन इस तरह के फैसले सैद्धांतिक तौर पर गलत होते हैं। दरअसल नौकरियां किसी देश की मील्कियत नहीं होती हैं। इन्हे प्रतिस्पर्धा के जरिए काबिलियत के दम पर हासिल किया जाता है। औद्योगिक क्रांति के पहले भारत और चीन के विनिर्माण क्षेत्र का पूरी दुनिया में दबदबा था। खास कर हस्तशिल्प और हथकरघा के मामले में तो यहां के लोगों को महारथ हासिल थी। लेकिन बाद के मशीनी युग में जब मशीनों के जरिए कपड़ा सस्ती दर पर बनाया जाने लगा तो भारत और चीन का विनिर्माण सेक्टर बर्बाद हो गया। क्या तब यूरोप के लोगों ने ये कहा कि इससे भारत के हिस्से की नौकरियां यूरोप के लोगों को मिल रही हैं? ऐसा नहीं हुआ था।

दरअसल नौकरी, संपत्ति के अधिकार की तरह नहीं है। उपभोक्ताओं की जरूरतों को पूरा करने के लिये नौकरी किसी देश या क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं की जा सकती । क्योंकि ये उपभोक्ताओं की जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा करने का मामला है। जिस तरह औद्योगिक क्रांति के दौरान भारत के टैक्सटाइल क्षेत्र की नौकरियां यूरोप के हाथों में चली गई थीं, उसी तरह आज सॉफ्टवेयर क्षेत्र की नौकरियां भारत के लोगों के हाथों में आ रही हैं। और दोनों ही मामलों में उपभोक्ताओं को कम कीमत का फायदा मिल रहा है।

आजादी की लड़ाई के दौरान भारत के नेताओं ने जोर शोर से ‘स्वदेशी’ का नारा लगाया था। यहां तक की कई बार ब्रिटेन में बने कपड़ों को जलाया भी गया था। लेकिन इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि आज के भारतीय नेता अमेरिका के स्वदेशी अभियान का विरोध कर रहे हैं। और इस तरह के पाखंड की झलक दोनों देशों के मीडिया में भी उजागर होती है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि सीमित वीजा की नीति अपनाने के बाद अमेरिकी इंजिनीयरों के लिए नौकरियों के ज्यादा मौके सामने आ जाएंगे। उल्टा इससे भारतीयों को ही फायदा होगा। मौजूदा समय में भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग का एक तिहाई काम अमेरिका में किया जाता है। और वहीं की इंडस्ट्रियों का दो तिहाई काम बीपीओ के जरिए या फिर अन्य माध्यमों से भारत में किया जाता है। अब अमेरिका में सीमित वीजा की नीति के अपनाए जाने के बाद अमेरिकी इंडस्ट्रियों का जो काम भारत में किया जाता है वे 80 फीसदी तक पहुंच जाएगा। संरक्षणवाद किन्हीं भी मायनों में आत्मघाती है। गौर से देखा जाए तो भारत में भी तेजी से तरक्की तभी हुई जब यहां के बाजारों को विदेशियों के लिए खोला गया।

अमेरिका के लिए स्वदेशी की नीति नई नहीं है। साल 2001 की मंदी के दौरान न्यू जर्सी जैसे कुछ राज्यों ने आउटसोर्सिंग पर बैन लगाया था। हालांकि इसका उन्हे कोई फायदा नहीं मिला। फिर 2008 में अमेरिका में मंदी आई तो दिवालिया हो रही कंपनियों को सरकार की तरफ से आर्थिक मदद दी गई। लेकिन इन कंपनियों को ये हिदायत भी दी गई कि वे इन पैसों का इस्तेमाल आउटसोर्सिंग के लिए नहीं करेंगे।

आदित्य मट्टू और इंगो बोरकर्ट द्वारा ‘द रेजिलिएंस ऑफ सर्विस ट्रेड’ नाम से किए गए एक रिसर्च में ये बात सामने आई है कि मंदी के दौरान सरकारी फंड के जरिए अमेरिका की एक स्टूडेंट लोन कंपनी ‘सैली-मे’ को डूबने से बचाया गया। जिसके बाद इस कंपनी ने भारत और फिलिपिन्स में ऑउटसोर्सिंग का काम बंद कर के 2000 अमेरिकियों को नौकरी दे दी। लेकिन इससे इस कंपनी का खर्च 35 मिलियन डॉलर बढ़ गया। इसी तरह सरकारी मदद से बचाई गई कई इंश्योरेंस और ऑटो कंपनियों ने भी अपने ऑउटसोर्सिंग के काम में कटौती की। लेकिन इन तमाम कदमों का भारतीय सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री पर बेहद मामूली असर पड़ा। और मंदी के दौरान भी ये कंपनियां अच्छा करोबार करती रहीं।

कुछ भारतीयों का कहना है कि ओहायो में लगाया गया बैन डब्ल्यूटीओ के नियमों का उल्लंघन है। पर वास्तव में ऐसा नहीं है। डब्ल्यूटीओ का सरकारी अधिग्रहण पर बहुपक्षीय समझौता है जो समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को बाध्य करता है कि वो सभी सरकारी ठेकों में समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले सभी मुल्कों को बोली लगाने का हक दें। अमेरिका ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किया है लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया है। अगर भारत भी इस समझौते पर हस्ताक्षर करता है तो उसे भी अमेरिकी या यूरोपीए देशों के सॉफ्टवेयर या अन्य सरकारी ठेकों को हासिल करने का पुख्ता तौर पर हक मिल जाएगा।

सवाल ये है कि आखिर भारत ने ‘बहुपक्षीय समझौते’ पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किया है। कुछ हद तक इसकी वजह स्वदेशी सोंच का प्रभाव भी है। लेकिन इसकी बड़ी वजह ये है कि केंद्र और राज्य दोनों ही स्तर के नेताओं को लगता है कि अगर सभी सरकारी ठेकों के लिए विदेशी कंपनियां बोली लगाएंगी तो इन नेताओं को मिलने वाला लाभ, हाथ से निकल सकता है। आखिर राजनीतिक पार्टियां भी तो पैसों से ही चलती है। ऐसे में वे इसका अपने लिए दोहन चाहते हैं।

विश्व बैंक के अनुबंधन के मुताबिक किसी भी ठेके के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बोली की बाध्यता है। लेकिन इसका दायरा बढ़ाकर अगर सभी सरकारी ठेकों तक कर दिया जाए तो इससे नेताओं को हजारों करोड़ का नुकसान हो सकता है। इसलिए राजनेताओं के लिए ये बेहद नुकसानदेह है। लेकिन भारतीय नागरिकों के लिए ये उतना ही जरूरी है।

इसलिए स्वदेशी के शब्दाडम्बर से भ्रमित मत है जिसके पीछे भ्रष्ट राजनीतिज्ञों ने खुद को छिपा रखा है। अगर भारत सरकार, सरकारी ठेकों से जुड़े डब्ल्यूटीओ के बहुपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर कर देती है तो इससे ना सिर्फ भ्रष्टाचार कम होगा बल्कि परियोजनाओं की लागत में भी कमी आएगी। और साथ ही भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी और यूरोपीए देशों के साथ ही इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले दूसरे देशों के सरकारी ठेकों को हासिल करने भी हक मिल जाएगा। और यही सही रास्ता भी है आगे बढ़ने का।

- स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर