सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्धि गरीबी का सबसे कारगर इलाज

सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्धि गरीबी का सबसे कारगर इलाज है। यही मुखर  संदेश है वर्ष  2009-10 के गरीबी के बारे में आंकड़ों का।2004-05 और 2009 -2010 के बीच 8.5 प्रतिशत  प्रतिवर्ष की रेकार्ड विकास दर ने 1.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की  रेकार्ड दर से गरीबी घटाई है। यह आंकड़ा  इससे पहले के 11वर्षों में गरीबी घटने की 0.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर के आंकड़े से दोगुना है।

वामपंथियों द्वारा अक्सर भ्रामक धारणा फैलाई जाती है कि तेजी से बढ़नेवाली विकास दर का लाभ केवल अमीरों को ही मिलता है गरीबों को उसका कोई लाभ नहीं मिल पाता। उपरोक्त आंकड़े उसका पुरजोर खंडन करते हैं।

दुर्भाग्य की बात यह है कि यह अच्छी खबर राजनेताओं और मीडिया के एक वर्र्ग की अर्धशिक्षित चीख चिल्लाहट में डूब गई कि आंकड़ों में हेराफेरी की गई है।लेकिन  ये आरोप झूठे हैं । आंकड़े गढ़े नहीं गए हैं उन पर तो हमें जश्न मनाना चाहिए।

सरकार ने तेंदुलकर समिति की गरीबी रेखा को स्वीकार किया है जो विश्व बैंक की 1.25 डालर क्रय शक्ति समता अवधि के नजदीक है। आलोचकों का कहना है कि भारत  की गरीबी रेखा यथार्थवादी नहीं है। लेकिन विश्व बैंक की गरीबी रेखा कई दशकों से वैश्विक तुलनात्मक अध्ययन के लिए स्वीकार की गई है।

वर्ष 1978 के सुधारों के बाद चीन की सरकारी गरीबी रेखा विश्वबैंक की तुलना में दो तिहाई पर थी। लेकिन किसी ने नहीं कहा कि यह  आंकड़ों की हेराफेरी है  या इतनी कम आमदनी में  जीना असंभव है। चीन के आंकड़ों के मुताबिक उसकी गरीब आबादी की संख्या जो 1978 में 25करोड थी वह 2001 में घटकर 2.9 करोड रह गई। इस तरह 21 वर्ष में  गरीबों की संख्या में 22.10 करोड की कमी आई। इसकी दुनियां भर में खूब तारीफ हुई। वामपंथियों ने शिकायत की कि इसकी तुलना में भारत की गरीबी में गिरवट बहुत कम है।

लेकिन अब वैसी हालत नहीं है। तेंदुलकर की रेखा के आधार पर भारत में गरीबी के आंकड़े में पांच वर्ष में पांच करोड़ बीस लाख की कमी आती है। इस रफ्तार से भारत 21 वर्षों में गरीबों की संख्या 21 करोड़ 80लाख घटा लेगा जो चीन के 22करोड 10लाख के आंकड़े के लगभग बराबर है।

पहले विकास दर कम होने के कारण भारत में गरीबों की संख्या में लगातार लेकिन कम तादाद में कमी आती रही है।लेकिन जैसे ही विकास दर बढ़कर आठ प्रतिशत हो गई जो 1978 से 2001 के बीच की विकास दर के समतुल्य थी ,तो भारत में भी चीन की तरह तेजी से गरीबी घटी। हालांकि चीन और भारत की गरीबी रेखाएं एक जैसी नहीं हैं। इसलिए तुलना एक जैसी नहीं हो सकती । तब भी यह हकीकत है दोनों देशों  ही में तेजी से विकास के कारण गरीबी घटी है।

हम निश्चित ही ( जैसा कि हाल ही में अमर्त्य सेन और ज्यां ड्रेज ने किया ) न केवल  चीन वरन अपने  बांग्लादेश जैसे  दक्षिण एशियाई पडोसी की तुलना में सामाजिक सूचकांकों के पैमाने पर कम हासिल करने के लिए  भारत की आलोचना कर सकते हैं। गलत तरीके से सब्सिडी देने ,भ्रष्टाचारियों पर अंकुश न लगा पाने , और कर्मचारियों की अनुपस्थति के कारण भारत सरकार सामाजिक क्षेत्र में वह हासिल नहीं  कर पाई जो चीन तो छोडिए बांग्लादेश ने हासिल कर दिखाया।

सकल घरेलू उत्पाद में रेकार्ड वृद्धि ने सरकार को सामाजिक क्षेत्र को सुधारने के लिए रेकार्ड राजस्व दिया । लेकिन उसने सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए जरूरी बुनियादी सुधार नहीं किए इसलिए बढा हुआ आवंटन उतने अच्छे नतीजे नहीं दे पाया।

वास्तव में अर्थशास्त्री लांट प्रिटचेट ने भारत को घिसटते हुए चलनेवाला राज्य कहा है। पुलिस, कर संग्रह, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी सप्लाई –जैसी सभी सेवाओं में गैर हाजिरी, उदासीनता, अयोग्यता, और भ्रष्टाचार का साम्राज्य है। भारत के कई क्षेत्रों में राज्य के जमीनी स्तर पर काम करनेवाले कर्मचारियों – इंजीनियर, शिक्षक, स्वास्थ्य कर्मचारियों का कामकाज केंद्र और राज्य प्रसासन के नियंत्रण के बाहर होता जा रहा है।

इसके बावजूद हमारा ध्यान इस बड़ी तस्वीर से नहीं हटना चाहिए कि सकल घरेलू उत्पाद में रेकार्ड वृद्धि ने गरीबी में रेकार्ड कमी की है जैसी कि चीन में हुई थी। आंकडों में हेराफेरी को लेकर चल रही बहससे  दो कारणों से यह संदेश पूरी तरह से गायब हो गया।

पहला पिछले वर्ष योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को लगभग 32 रूपये प्रतिदिन का आंकड़ा दिया। लेकिन पिछले हफ्ते जारी गरीबी रेखा  का आंकड़ा 28.62 प्रतिदिन का है। कई राजनीतिज्ञ और पत्रकार जिनमें प्रतिष्ठित विदेशी अखबार भी शामिल थे इस गलत नतीजे पर पहुंचे कि सरकार ने गरीबी की रेखा को नीचे खिसका दिया है ।

लेकिन योजना आयोग ने यह स्पष्ट कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट को दिया गया 32 रूपये प्रतिदिन का आंकड़ा 2011 का था जबकि 29.62 प्रतिदिन का 2009-10 का।यह अंतर पूरी तरह से मुद्रास्फीति के कारण है।गरीबी रेखा को नीचे नहीं खिसकाया गया है।

हालांकि सरकार ने सचमुच अलग से गरीबी गणना अनुपात में इसे नीचे खिसकाया है।पिछले वर्ष योजना आयोग के अभिजित सेन और मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने कहा था कि 2009 -10 के एनएसएस सर्वे में दिखाया गया है 32 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। इससे यह धारणा बनी कि  विकास दर बढ़ने के बावजूद गरीबी उतनी तेजी से नहीं घटी। अब एक साल से भी कम समय बाद योजना आयोग कह रहा है गरीबी का आंकड़ा 29.8 प्रतिशत का है इसका मतलब पिछले वर्ष लगाए गए अस्थायी अनुमान के मुकाबले गरीबी तेजी से घटी है। एक संशोधन ने एक सामान्य सफलता को महत्वपूर्ण सफलता बना दिया। यदि योजना आयोग आखिरी आंकड़ों के आने तक इंतजार करता और और जनता को पिछले वर्ष के अस्तायी अनुमान से गुमराह न करता तो तो आखिरी आंकड़ा ज्यादा विश्वसनीय होता।और संदेह करनेवाले लोग भी इस सफलता को महत्वपूर्ण सफलता मानते।

यह मूड भी खत्म हो जाएगा। अब हम 2011-12 के आंकडे का इंतजार करें  ।वह निश्छित ही गरीबी में महत्वपूर्ण कमी आने को दर्शाएगा।तब हम शान के साथ जश्न मना सकेंगे और आंकडों में हेराफेरी  के आरोप भी नहीं होंगे। 

- स्वामीनाथन  अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर