जानें बचेंगी तेज विकास से, फूड सिक्युरिटी बिल से नहीं

 

अमर्त्य सेन यह हिसाब लगाना चाहते हैं कि फूड सिक्युरिटी बिल पास करने में हो रही देरी से कितनी मौतें हुई हैं। उन्हें लगता है कि यह आंकड़ा लोकसभा में हंगामा कर रहे विपक्षी नेताओं को शर्मसार कर देगा। उनका कहना है कि लोगों का ध्यान खींचने के लिए आपके पास एक गिनती होनी चाहिए। ठीक है, लेकिन उम्मीद करें कि सेन के पास उन मौतों का हिसाब भी होगा, जो भारत की वृद्धि दर धीमी रखने वाली गलत नीतियों के चलते हुई हैं, क्योंकि इस किस्म की नीतियां आज भी अपना काम बखूबी कर रही हैं। उन्हें अपनी इस बात पर जोर देना खासा पसंद है कि किसी भी जीडीपी वृद्धि में बेहतर सामाजिक निवेश हमेशा बेहतर नतीजे ही देता है। लेकिन वे इतना ही जोर इस पक्ष पर भी क्यों नहीं देते कि सामाजिक निवेश के किसी भी स्तर पर अर्थव्यवस्था की तीव्रतर वृद्धि के परिणाम बेहतर ही आते हैं और इससे मौतों की संख्या घटती है।

'गायब औरतें'

सेन को प्रसिद्धि उनके इस आकलन से मिली थी कि लिंगभेद के चलते बच्चियों की मृत्युदर बढ़ जाने के कारण 10 करोड़ औरतें 'गायब हो चुकी हैं'। अपनी इस गणना के लिए उन्होंने चीन, दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के स्त्री-पुरुष अनुपात का अध्ययन किया था और यह सवाल पूछा था कि इन क्षेत्रों का लिंग अनुपात अगर पश्चिमी देशों जैसा होता, जहां स्त्री-पुरुष दोनों का बराबर ध्यान रखा जाता है, तो यहां स्त्रियों की संख्या अभी कितनी होती। उनकी गणना के मुताबिक उस दशा में यहां 10 करोड़ ज्यादा स्त्रियां मौजूद होतीं। इस गणना में काफी हल्कापन था और लिंगभेद के अलावा स्त्री मृत्यु दर को प्रभावित करने वाले कई अन्य कारकों की इसमें अनदेखी कर दी गई थी। यही वजह है कि सेन ने अपना लेख न्यूयॉर्क रिव्यू ऑफ बुक्स में छपाया, किसी चोटी के आर्थिक पत्र में नहीं, जहां आर्थिक सटीकता के अभाव के चलते इसे खारिज कर दिया जाता।

सटीक नहीं, फिर भी सही

उनके आलोचकों में अर्थशास्त्री एमिली ओस्टर भी शामिल थीं, जिनका सुझाव था कि एशियाई औरतों की मृत्यु दर ज्यादा होने की लिंगभेद के अलावा कई दूसरी वजहें भी हो सकती हैं। मसलन, उनमें हीपेटाइटिस बी के मामले ज्यादा होना भी उनकी ऊंची मृत्यु दर की एक वजह हो सकता है। एक अन्य सजग समीक्षा में जनसांख्यिकीविद आंस्ली कोल ने सुझाया कि 'गायब औरतों' की संख्या कहीं कम, कुल 6 करोड़ ही हो सकती है। लेकिन इन आलोचनाओं से सेन की प्रतिष्ठा में कोई कमी नहीं आई। उनकी गणना उतनी सटीक न होने के बावजूद 10 करोड़ की विशाल संख्या के कारण लोगों का ध्यान खींचने में सफल रही, क्योंकि इसने सरल भाषा में यह बताया कि लिंगभेद कितनी बड़ी सामाजिक आपदा को जन्म दे सकता है।

ऐसा ही आकलन हमें उन सामाजिक आपदाओं का भी करना चाहिए, जो आर्थिक वृद्धि में कमी के चलते पैदा होती हैं। 2009 में मैंने केटो इंस्टीट्यूट के लिए एक पेपर लिखा था- 'सोशलिज्म किल्स : द ह्यूमन कॉस्ट ऑफ डीलेड इकनॉमिक रिफॉर्म इन इंडिया'। इसमें सेन जैसी ही खोजी भावना के साथ मैंने आर्थिक सुधार में हुई देरी और इसके फलस्वरूप भारत की धीमी वृद्धि दर के कारण 'गायब हुए बच्चों', 'गायब साक्षरों' और 'गायब गैर-गरीबों' की संख्या का हिसाब लगाया था। इस पेपर में बताया गया था कि स्वतंत्रता के तीन दशकों में भारत 3.5 प्रतिशत की हिंदू ग्रोथ रेट का शिकार बना रहा। 1980 के दशक में इसने थोड़ी रफ्तार पकड़ी और 1991 के बाद व्यापक सुधारों का दौर शुरू हुआ। पेपर में इस संभावना पर विचार किया गया था कि यही प्रक्रिया अगर एक दशक पहले 1971 में शुरू हो गई होती तो इसके सामाजिक नतीजे क्या होते।

पेपर में लोच का आकलन किया गया था- यानी बाल मृत्युदर, निरक्षरता और भुखमरी में आर्थिक वृद्धि के साथ किस तरह के बदलाव आए हैं। इसके आधार पर इसमें तेज वृद्धि दर दस साल पहले शुरू हो जाने के संभावित परिणामों का हिसाब लगाया गया था। नतीजे आश्चर्यजनक थे। 1971 से 2008 के बीच 1 करोड़ 45 लाख शिशुओं की जान बचाई जा सकती थी। पूर्ण साक्षरता की स्थिति में भारत 2007 तक ही पहुंच चुका होता, यानी शिक्षितों की संख्या अपने यहां 26 करोड़ 10 लाख ज्यादा होती। और गरीबी? देर से हुए सुधार और धीमी वृद्धि दर ने 10 करोड़ 90 लाख अतिरिक्त लोगों को गरीबी रेखा के नीचे दबा दिया। यह गणना पुरानी लकड़ावाला गरीबी रेखा को आधार बनाकर की गई थी। हाल की तेंडुलकर रेखा अपनाने पर संख्या कहीं ज्यादा बड़ी निकलती।

सोशलिज्म के मारे लोग

आलोचक इन गणनाओं को सतही बता सकते हैं- सामाजिक संसूचक सिर्फ वृद्धि दर से नहीं, कई अन्य कारकों से भी प्रभावित होते हैं। लेकिन ठीक यही आलोचना क्या 'गायब औरतों' के मामले में सेन की भी नहीं की जा सकती? मैं सेन व अन्य लोगों को अपनी गणना में मौजूद त्रुटियां दूर करने के लिए आमंत्रित करता हूं। शायद कुछ आलोचकों का आकलन यह हो कि नेहरू-इंदिरा समाजवाद ने 1 करोड़ 45 लाख नहीं, सिर्फ 1 करोड़ बच्चों को ही मारा था। लेकिन इससे इस तथ्य पर कोई असर नहीं पड़ेगा कि यह एक विराट सामाजिक त्रासदी थी। जिन लोगों का ऐसा कहना है कि वे हर महीने कुछ न कुछ दिन भूखे रहते हैं, उनका अनुपात 1983 में 15 प्रतिशत से गिरता हुआ 2004 में 2 प्रतिशत पर आ गया। 2011-12 का सर्वेक्षण संभवत: इस अनुपात को 1 प्रतिशत ही दिखाए। यह उपलब्धि तेज वृद्धि दर के बल पर हासिल की गई है, और यह वैसी किसी भी चीज को ढक देने के लिए काफी साबित होगी, जिसे फूड सिक्युरिटी बिल के जरिये हासिल किया जाना है।

 

स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर

सभारः नवभारत टाइम्स