एक अचंभा देखा रे भाई ---(2)

चमत्कार को सभी नमस्कार करते हैं । फिल्म उद्योग के इस चमत्कार की भी चर्चा भी हर जगह होती रहती है। लेकिन यह चमत्कार हुआ कैसे। कहना न होगा कि चमत्कार अचानक नहीं हुआ है इसकी कहानी लंबी है। कभी फिलमउद्योग में ऐसे निर्माताओं की भरमार थी व्यक्तिगत तौर पर फिल्में बनाते थे। इसके लिए उन्हें कहीं न कहीं से फायनेंस का जुगाड करना पड़ता था।कोई बैंक फिल्मों को फायनेंस नहीं करती थी।  कारण यह था कि कई वर्षो तक फिल्म उद्योग `कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त उद्योग ‘ नहीं था। 1951 के इंडस्ट्रीज एक्ट आफ इंडिया में सरकार द्वारा मान्यता  प्राप्त सभी उद्योगों की सूची थी और केवल वही उद्योग औपचारिक फायनेंस संस्थाओं से पैसा ले सकते हैं। दुर्भाग्यवश बालीवुड इस सूची में नहीं था। फिल्म निर्माताओं को सरकारी नीति के कारण फिल्म न बनाने का फैसला करना पड़ता था या फिर खतरनाक अंडरवर्ल्ड निर्माताओं की शरण में जाने का। यही कारण था कि बीच के कुछ वर्षों में तो फिल्म उद्योग माफिया के चंगुल में फंसा रहा।  वही तय करते थे कि कौनसे हीरो, कौनसी हीरोइन को लिया जाए। लंबे संघर्ष के बाद  बालीवुड को 2001 में अधिकृत तौरपर उद्योग का दर्जा दिया गया। यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला था जिसने फिल्म उद्योग भाग्य बदल दिया। अब फिल्म उद्योग मान्यताप्राप्त है और औपचारिक संस्थाओं से पैसा लेने की उसे कानूनी अनुमति है। नतीजतन पिछले कुछ वर्षों में बालीवुड पर से  अंडरवर्ल्ड[ का शिकंजा ढीला पड़ता गया।

लेकिन बम्बइया फिल्म उद्योग की समस्या केवल इतनी ही नहीं थी वरन वहां गजब की अराजकता और अनुसासनहीनता का बोलबाला था। फायनेंस का कोई पुख्ता स्रोत नहीं था । एक फिल्म शूट होने में ही कई-कई साल लग जाते थे। स्टार इतने व्यस्त होते थे कि उनके पास डेटस नहीं होती थी वो सेट पर देर से आते थे।जो एक्टर सेट पर आ जाते उसके हिसाब से सेट पर पटकथा लिखी जाती ।अनुबंध जुबानी होते थे इसलिए उन्हे कभी भी तोड़ा जा सकता था। फिर फिल्म तैयार होने पर भी उनके वितरण की कोई गारंटी नहीं होती थी। कई बार तो फिल्में बरसों तक डिब्बे में पड़ी रहती थी या कभी थियेटर का मुंह ही नहीं देख पाती थीं। इन सारे कारणों से बंबइया फिल्म उद्योग बहुत जोखिमभरा हो गया था।

पिछले कुछ अर्से में तेजी से हुए कार्पोरेटाइजेशन ने बालीवुड का हुलिया ही बदल दिया है।जब बालीवुड में व्यक्तिगत फिल्म निर्माताओं का बोलबाला था तब यह उद्योग बहुत असंगठित और अव्यवस्थित था,फायनेंस को लेकर बहुत मारामारी होती थीइसलिए माफिया हावी था।चूंकि  कंपनिया केवल वैध पैसे से ही फिल्में बनाती है इसलिए उनके आने के बाद  माफिया का तो फिल्म उद्योग से सफाया हो गया। दरअसल –चोरी-चोरी चुपके चुपके – के बाद माफिया के पैसे  से किसी फिल्म की बनने की कोई खबर नहीं आई। इसके अलावा फिल्म उद्योग ने आय के नए-ऩए साधन ईजाद किए। इससे फिल्मों के अर्थशास्त्र में दूसरा महत्वपूर्ण  बदलाव यह आया कि बाक्सआफिस का महत्व कम हो रहा है। तेजी से आ रहे तकनीकी बदलावों को कारण आर्थिक सफलता के लिए फिल्मों की निर्भरता बाक्स आफिस या थियेटर जानेवाले दर्शकों  पर कम होती जा रही है। दूसरी तरफ टीवी और वीडियो के आने के कारण दर्शकों को उनके घरों पर ही फिल्म दिखाई जा सकती है और उसके अधिकार बेचकर भी भारी आय होने लगी है। कभी फिल्मों की 90 प्रतिशत आय केवल बाक्स आफिस से होती थी  लेकिन अब लगभग आधी या उससे भी कम रह गई है। अब फिल्म की लागत का 30प्रतिशत हिस्सा टीवी ,वीडियों के अधिकारों की बिक्री से मिल जाता है। और बचा हुआ संगीत, इंटरनेट और विदेशों में प्रसारण के अधिकारों की बिक्री से। इस तरह फिल्मों ने आय के ऩए ऩए रास्तें खोज निकाले हैं।

एकबात लोग शायद भूल गए है कि फिल्मों के कार्पोरेटाइजेशन की शुरूआत करने का श्रेय सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को जाता है । उन्होंने 1995 में एबीसीएल (अमिताभ बच्चन कार्पोरेशन लिमिटेड) बनाई थी यह फिल्म शुरूआती सफलता के बाद दीवालिया हो गई और उसके कर्ज चुकाने के लिए अमिताभ को फिर अभिनय की दुनिया में लौटना पड़ा जबकि वह खुदागवाह के बाद फिल्मों से संन्यास लेने की घोषणा कर  चुके थे। कारपोरेटाइजेशन का सबसे बड़ा लाभ तो यह हुआ है कि बालीवुड में फ्रोफेशनलिज्म की बयार बहती हुई नजर आ रही है।जिसने फिल्म उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है। एक जमाने में एक फिल्म बनने में बरसों लग जाते थे। अब आमतौर पर छह माह में फिल्म बनकर तैयार हो जाती है। पहले स्क्रीप्ट तैयार नहीं होती थी , कई बार तो होती ही नहीं। अब  जबतक स्र्कीप्ट  तैयार नहीं होती तबतक कोई प्रोजेक्ट शुरू नहीं हो पाता। अभिनेता तभी फिल्म साइन करते हैं जब उन्हें स्र्कीप्ट मिल जाती है ।आमिर खान के भतीजे इमरान खान ने अभीतक बमुश्किल तीन चार फिल्में ही की होंगी वह भी फिल्म साइन करते समय स्र्कीप्ट के हर पेज पर साइन करता है जिसके कारण यदि निर्देशक उसमें कोई बदलाव करना चाहे तो उसे पहले इमरान खान से मशविरा करना पड़ता है।

कंपनियों के प्रवेश के साथ सारा बिजनेस माडल ही बदल गया है। स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं ने अपने ग्रुप और कंपनियां बना ली हैं।जिन कंपनियों को फिल्में बनाने का अनुभव नहीं होता वे स्वतंत्र निर्माताओं के साथ फिल्में बनाती हैं।निर्माता प्रभावी ढंग से शूटिंग कराने के पक्ष पर ध्यान देते हैं । हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि स्वतंत्र निर्माता कम रह गए हैं उन्होंने या तो कंपनियां बना ली हैं या कार्पोरेट कंपनियों के साथ काम करने लगे हैं। कई बडे प्रोडक्शन हाउसेस जैसे यूटीवी साफ्टवेयर कम्युनिकेशन ,ईरोज इंटरनेशनल माडिया,रिलायंस इंटरटेनमेंट ,वायकाम 18 मोशन पिक्चर्स और बालाजी टेली फिल्म्स ने यह माडल अपनाया लिया। तो दूसरी तरफ फाक्स,डिसने ,वारनर  ब्रदर्स और सोनी जैसी अमेरिकी महाकंपनियों ने भी भारत में अपनी दुकान जमा ली है।

इस कार्पोरेट सिस्टम से किस तरह जमीन आसमान का फर्क आया है यह आप अमिताभ के ही शब्दों में सुन लीजिए। वे कहते हैं- यह सारी बातें एकानोमिक्स के साथ जुड़ी हुई हैं।पहले संस्थायीकृत फायनेंस नहीं था ।न ही कार्पोरेट कंपनियां थी जो आपको पैसे की गारंटी दें।लेकिन अब आप जानते हैं कि कहां से पैसा आनेवाला है और आपको जब जरूरत है तब पैसा मिलेगा।आप बजट तैयार करेंगे। उसे सेंक्शन कराएंगे और उसके मुताबिक अपना शिड्यूल तैयार करेंगे।----मैं इस तरह काम करूंगा-इस दिन मैं शुरू करूंगा,इस दिन खत्म और इस दिन फिल्म रिलीज हो जाएगा। ---इन दिनों लोग इसी तरह से काम करते हैं।वे न केवल मुझे कहानी बताते हैं वरन यह भी बताते हैं कि किस तरह पब्लिसिटी करेंगे। वे इस किस तरह फिल्म को रिलीज करना चाहते हैं और रिलीज की तारीख क्या होगी।फिर वे अपना काम शुरू करते है. यह सब कमाल का है।

आमिताभ कहते हैं-पहले फायनेंस के बारे में कुछ पता नहीं होता था।इसलिए व्यक्तिगत निर्माता पहले स्टार को साइन करता था और साइनिंग राशि देता था ,छह सात दिन की शूटिंग करता था।एक गाना और एक्शन सीन आदि फिल्माता था और उस फायनेंसर को दिखाता था जिससे उसे थोड़ा पैसा मिला होता था । इसके पीछे सोच यह होती थी कि फायनेंसर खुश होकर कुछ और पैसा दे। या वह कुछ और फायनेंसरों और वितरकों को फिल्म दिखाता और वे इस फिल्म के लिए कुछ और पैसा दें।--- कभी कभी तो पैसे की इस प्रतीक्षा में साल दो साल निकल जाते थे। लेकिन बिना काम के दो साल तक कैसे रह सकता है।इसलिए हम कई फिलमों में काम करते थे।और जब कभी फिल्म का शिड्यूल होता था तब हमें पैसा मिलता था। इस तरह से सारा तंत्र काम करता था। अब कार्पोरेटस आ गए हैं।अब सुनियोजित ढंग से फायनेंस मिलता है –कांट्रैक्ट साइन होते हैं शिड्यूल पूरा होने आपकों एक निश्चित राशि मिलती है।यह कमाल की व्यवस्था है।

इस तंत्र का ही कमाल है कि हमने बुड्ढा मिल गया डेढ महीने में पूरी कर ली थी।जो पूरी तरह से आश्चर्य़जनक है। हमने तय किया था कि हम दस करोड़ के बजट पर कायम रहेंगे।हम कायम रहे।आरक्षण में प्रकाश झा ने कहा वह जनवरी में शूटिंग शुरू करेंगे और मार्च मध्य तक पूरी कर लेंगे। हमने शिड्यूल से तीन दिन पहले ही शूटिंग पूरी कर ली थी। जब चीजें पहले तय होती हैं हर चीज उसके मुताबिक चलने लगती हैं।

अमिताभ की बातें उनके अनुभव के बोल हैं । अब न केवल प्रोडक्शन के काम में फ्रोफेशनलिज्म आया है वरन मार्केटिंग और वितरण में भी जवरदस्त बदलाव आए हैं।पहले 400 प्रिंट रिलीज होना बहुत बड़ी बात हुआ करती थी लेकिन हजार से ज्यादा प्रिंट रिलीज होना आम बात हो गई है। रा-वन के 4000 प्रिंट रिलीज हुए हैं। आजकल जो मल्टिप्लेक्सेज का जो दौर चला है उसमें फिल्म एक दो हफ्ते ठीक –ठीक चले तो काफी कमाई हो जाती है। फिल्मी कारोबार के विश्लेषक इंदु मिरानी कहते हैं –आज फिल्मों का धंधा  इतना सुरक्षित हो गया है कि किसी फिल्म निर्माता की फिल्म फ्लाप होने की श्थिति में उसके दीवालिया होने की नौबत नहीं आती। उनकी बात में दम है भी ।हकीकत तो यह है कि वितरण,टीवी,वीढियों और संगीत के अधिकार बेचकर तो रिलीज होने से पहले ही लागत का पैसा निकल आता है।

जोखिम कम होने के कारण अब फिल्म उद्योग में हर जगह पूंजी खींची आ रही है। फिल्म कंपनिया दस- दस फिल्में तक बना रही हैं जिसमें छोटी –बड़ी और मंझोली हर तरह की फिल्में हैं। नतीजतन हर वर्ष 1000 के आसपास फिलमें बन रही हैं। बेहतर फिल्में बनने के कारण विदेशों में भी उनका बाजार बढ़ता जा रहा  है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है- माय नेम इज खान –एक साथ 70 देशों में प्रदर्शित हुई थी और उसने कमाल का बिजनेस किया। लेकिन फिल्म उद्योग को यह आर्थिक और व्यपारिक सद्बबुद्धि पाने में सौ साल लग गए । फिर भी यह कहना पड़ेगा कि देर आए दुरुस्त आए। वैसे इस फिल्मी कहानी का निचोड यह है कि कि सही नीतियां  और उद्योजकता का मेल हो जाए तो आर्थिक चमत्कार पैदा होते देर नहीं लगती।

- सतीश पेडणेकर