PK और विरोध प्रदर्शन

पिछले कुछ दिनों से 'पीके' फिल्म दो कारणों से चर्चा में है। पहला, कमाई के मामले में नित्य नए रिकॉर्ड बनाने के कारण और दूसरा, धर्म के नाम पर होने वाले आडम्बरों पर कटाक्ष करने और अपने खिलाफ होने वाले हिंसक प्रदर्शनों की मार झेलने के कारण। हालांकि विरोध प्रदर्शन के केंद्र बिंदू में अभिनेता 'आमिर खान' ही हैं। संभव है कि ऐसा उनके दूसरे धर्म यानि कि मुसलमान होने के कारण हो रहा हो, क्योंकि धर्म आधारित पाखंडों पर फिल्में पहले भी बनती रहीं हैं और हल्के फुल्के विरोध भी होते रहे हैं। श्रेष्ठ उदाहरण के लिए ज्यादा पीछे जाने की जरुरत नहीं है। वर्ष 2012 में आयी फिल्म 'ओह माय गॉड' (ओएमजी) ने न केवल पाखंडों और आडम्बरों पर प्रहार किए थे बल्कि समीक्षकों व दर्शकों से सराहना भी प्राप्त की थी। हालांकि विरोध तब भी हुए थे और बैन लगाने की मांग तब भी हुई थी।
 
विरोध कर रहे तमाम संगठनों की उभयनिष्ठ शिकायत यही है कि क्या आमिर खान इस्लाम से जुड़ी बुराईयों पर प्रहार करती हुई ऐसी किसी फिल्म में काम करने की हिम्मत जुटा सकते हैं? कहीं कहीं तस्लीमा नसरीन के उस बयान का हवाला भी दिया जा रहा है, कि यदि पाकिस्तान अथवा बांग्लादेश में किसी अभिनेता ने ऐसी फिल्म की होती तो उसे जान से मार दिया गया होता। लेकिन इन सबके बीच हम ये भूल जाते हैं कि भारत और पाकिस्तान और बांग्लादेश में मूलभूत फर्क यही है। और इसी खासियत के कारण दुनियाभर में हमारी विशिष्ट पहचान भी है। दुनिया भर में हम अपनी उदारता के लिए जाने जाते हैं और शायद यही कारण हैं कि हिंदू धर्म तमाम प्रहारों को झेलता हुआ हजारों सालों से अडिग खड़ा है। 
 
इसके अलावा एक तकनीकि बात हम भूल जाते हैं या जानबूझ कर अनदेखा कर देते हैं कि एक फिल्म के निर्माण में दर्जनों लोगों की एक पूरी टीम शामिल होती है ना कि सिर्फ एक व्यक्ति। इस हिसाब से यदि देखें तो 'पीके' फिल्म के निर्माण में भी एक टीम का योगदान है जिसमें निर्माता, निर्देशक और कथाकार सहित 90 प्रतिशत से ज्यादा लोग हिंदू हैं। फिर फिल्म के विरोध के केंद्र में आमिर को रखने की कोई खास वजह तो नहीं? क्या अभिनेता जिस भूमिका को अदा करता है वह वही हो जाता है? यदि किसी अभिनेता ने फिल्म विशेष में अपराधी अथवा हत्यारे की भूमिका अदा की तो क्या वास्तव में वह अपराधी या हत्यारा बन जाता है? यदि हां तो फिल्म 'लगान' में भुवन बनकर अथवा 'सरफरोश' में एसीपी अजय राठौर बनकर या फिर 'मंगल पांडे-द राइसिंग' में मंगल पांडेय का किरदार जीवंत करने के बाद भी आमिर सच्चा देशभक्त क्यों नहीं? फिल्म ओएमजी में भगवान के नाम पर भक्तों की श्रद्धा से खिलवाड़ करते धर्म गुरुओं की सत्यता उजागर करके व वास्तविकता से लोगों को अवगत कराकर बीजेपी सांसद परेश रावल व अभिनेता अक्षय कुमार ने खूब वाहवाही लूटी थी। हालांकि उस समय भी फिल्म को बैन करने की मांग उठी थी लेकिन उस समय किसी व्यक्ति विशेष को निशाना नहीं बनाया गया था। 
 
यदि फिर भी किसी की भावना आहत होती है या किसी को ठेस पहुंचती है तो उसे कानून की शरण में जाना चाहिए ना कि कानून को हाथ में लेकर स्वयं ही फैसले के लिए सड़क पर उतर आना चाहिए। आखिर क्यों हम संविधान द्वारा प्रदत वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलना चाहते हैं? हमें समझना चाहिए कि यदि किसी दबाव में आकर सरकार इस स्वतंत्रता पर सेंसर लगाती है तो इसका नुकसान हम सभी का होगा। हमें याद रखना चाहिए कि यह धरती कबीर, रहीम और रसखान की धरती भी है जिन्होंने न केवल धार्मिक आडंबरों पर प्रहार किया बल्कि सभी धर्मावलंबियों से प्यार और सम्मान भी हासिल किया। 
 
मैंने पीके फिल्म देखकर सिनेमाघरों से बाहर निकलने वाले दर्शकों का इंटरव्यू किया और उनसे फिल्म के बाबत तमाम प्रश्न पूछें। लेकिन आश्चर्यजनक रुप से 90 फीसद से ज्यादा दर्शकों ने फिल्म के बारे में सकारात्मक फीडबैक दिए। फिर वे कौन लोग हैं जो फिल्म का विरोध कर रहे हैं? क्या वास्तव में वे किसी धर्म के ठेकेदार हैं? क्या वास्तव में उन्होंने फिल्म देखी है? क्या वास्तव में वे उस संदेश को समझने में सफल रहे, जिसे कि फिल्म के जरिए देने की कोशिश की गई है? क्या हमने अपने आस पड़ोस में ऐसी दीवार पर भगवान की तस्वीर या फोटो लगी नहीं देखी जहां लोग पहले थूकते अथवा गंदगी करते थे लेकिन अब नहीं करते? फिर यदि फिल्म में आमिर ने थप्पड़ से बचने के लिए अपने गाल पर भगवान की तस्वीर लगा ली तो क्या जुर्म कर डाला?
 
- अविनाश चंद्र