ट्रेनों में महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती सराहनीय पहल

भारतीय रेलों में महिलाओं के साथ बढ़ती वारदातों के मद्देनजर रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी द्वारा ट्रेनों में महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की घोषणा एक सराहनीय पहल के तौर पर देखी जा रही है। उम्मीद की जा रही है महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती से महिला यात्रियों विशेषकर लंबी दूरी की ट्रेनों के महिला डिब्बों में सवारी करने वाली महिलाओं को इसका ज्यादा फायदा मिल सकेगा। इसके अतिरिक्त लोकल ट्रेनों में देर रात सफर करने वाली महिलाएं भी इस घोषणा से राहत की सांस ले सकती है। हालांकि अभी रेल मंत्रालय द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती लोकल ट्रेनों में होगी अथवा नहीं। लेकिन यदि ऐसा होता है तो वास्तव में महिलाओं को सुरक्षित यात्रा प्रदान कराने और घर से बाहर निकल देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने के प्रति प्रोत्साहित करने के क्षेत्र में यह काफी मददगार साबित हो सकता है।

कोझीकोड में रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी द्वारा ट्रेनों में महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की घोषणा ऐसे समय में आयी है जबकि इसकी शिद्दत से जरूरत महसूस की जा रही थी। हाल ही में त्रिशूर में एक महिला यात्री के साथ सामूहिक बलात्कार करने के बाद उसे चलती ट्रेन से फेंक देने की दुस्साहस पूर्ण घटना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा की विषय बनी थी। अदालत ने भी इस घटना पर कड़ा संज्ञान लेते हुए आरोपितों को मौत की सजा सुनाने में जरा भी झिझक नहीं दिखाई। ऐसे त्वरित फैसलों व सुरक्षा के व्यापक इंतजामों से ही महिलाओं में सुरक्षा की भावना पैदा की जा सकती है। हालांकि इस घटना को सकारात्मक उदाहरण के तौर पर तो इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ट्रेनों में यात्रा के दौरान महिलाओं को आए दिन दुर्व्यवहार व छेड़़छाड़ की घटनाओं से दो चार होना पड़ता है। अक्सर देखने में आता है कि पढ़ाई अथवा नौकरी के लिए कालेज व कार्यस्थल पर जाने वाली दैनिक महिला यात्रियों में से अधिकांश इसलिए घर पर बैठने को मजबूर हो जाती है क्योंकि ट्रेनों में वे अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं। इसके अलावा  लंबी दूरी की ट्रेनों में महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बों में पुरूष यात्रियों को निडर होकर यात्रा करना भी आम बात हो गई है।

लेकिन मात्र महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती मात्र ही समस्या से छुटकारा दिला देगी इस बात में संदेह भी है। इसका कारण यह है कि दिल्ली में देश भर के अन्य शहरों की तुलना में कहीं ज्यादा महिला पुलिसकर्मी हैं, फिर भी दिल्ली रेप कैपिटल के तौर पर कुख्यात होती जा रही है। यहां तक कि डीयू सहित अन्य इलाकों में महिला एसएचओ की नियुक्ति और महिला थाने स्थापित किए जाने के बाद भी यहां महिलाओं से छेड़छाड़ की घटना में कमी होती नहीं दिख रही है। कुछ घटनाओं में तो स्वयं महिला पुलिसकर्मियों को स्वयं अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए जद्दोजहद करते देखा गया है। इससे यह तो तय है कि मात्र महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती ही परेशानी का हल नहीं है। उम्मीद है कि रेलमंत्री अपनी घोषणा को अमली जामा पहनाने से पहले इस ओर जरूर ध्यान देंगे। वैसे कुछ भी हो कम से कम यह तो है कि ट्रेनों में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर किसी ने सार्थक पहल तो की।

- अविनाश चंद्र