उपभोक्ताओं के हित में निवेश

जब भी दिल्ली में आम उपभोक्ता सब्जियों की महंगाई को लेकर हायतौबा मचाते हैं तो अक्सर सरकार राजधानी की सबसे बड़ी थोक मंडी आजादपुर में खरीदी जाने वाली सब्जियों के थोक भावों का विज्ञापन छपवाती है। पिछले कई सालों से इन विज्ञापनों को जिन्होंने भी देखा है, वे जानते हैं कि इनसे साफ पता चलता है कि आज तक किसान को कभी भी पालक के लिए 10 रुपये किलो का रेट नहीं मिला। बथुआ, गोभी कभी भी सीजन में 10 रुपये किलो से ऊपर यहां किसानों से नहीं खरीदी गई। मूली के भाव सुनकर तो लगता है, जैसे हम रामराज में जी रहे हों। डेढ़ रुपये, दो रुपये किलो अक्सर मूली बिकती है।

मगर क्या दिल्ली में रहने वाला कोई उपभोक्ता यह बता सकता है कि उसने एक रुपये की आधा किलो या दो रुपये की आधा किलो मूली कब खरीदी थी? क्या कोई उपभोक्ता यह दावे से कह सकता है कि उसे सीजन या गैर सीजन में कभी भी 10-12 रुपये किलो पालक मिली है? नहीं।

आप हैरान रह जाएंगे हमारी थोक मंडियों में किसानों से जो माल खरीदा जाता है और आम उपभोक्ता जिसे अपने इस्तेमाल के लिए खरीदता है, दोनों की दरों में तीन सौ से चार सौ फीसदी का फर्क होता है। आखिर यह फर्क इतना ज्यादा क्यों होता है? किसान उत्पादक हैं, लेकिन बदहाल हैं। उन्हें थोक विक्रेता वाजिब कीमत नहीं देते। आम उपभोक्ता महंगाई से त्रस्त है, क्योंकि आम दुकानदार उन्हें सस्ती चीजें नहीं देते। फिर पफायदे में कौन है? कहने की जरूरत नहीं है कि फायदे में सिर्फ और सिर्फ बिचौलिये और फुटकर दुकानदार हैं।

ऐसा नहीं है कि हमारी आर्थिक समस्याओं का हल या निराकरण विदेशी निवेश है, मगर आप इस सच से आंखें नहीं मूंद सकते कि उपभोक्ता नाम की जो एक बड़ी जमात है, उसे बिचौलिये आंख मूंदकर लूटते हैं। भाजपा एफडीआइ या प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का विरोध यह कहकर कर रही है कि विदेशी जनरल स्टोर खुल जाने के बाद बिचौलियों और दुकानदारों का नुकसान होगा। इनकी तादाद तीन से पांच करोड़ के बीच बताई जा रही है, लेकिन आंख मूंदकर इन छोटे दुकानदार और बिचौलियों के हितों की बात करने वाली भाजपा और वे तमाम राजनीतिक पार्टियां, जो इस धारा से सहमत हैं, उन्हें देश के 50 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ता क्यों नजर नहीं आ रहे? क्या उपभोक्ताओं के हितों का कोई मतलब नहीं है? क्या उपभोक्ताओं को लूटने का सिलसिला यों ही जारी रहना चाहिए? बेहद हास्यास्पद लगता है, जब 21वीं सदी में और बहुत तेजी से प्रगति करने वाली अर्थव्यवस्था के रूप में हम दकियानूसी ढंग से सोचते हैं।

हम बड़े अजीब लोग हैं। एक तरफ हम दुनियाभर के फायदे हासिल करना चाहते हैं। दूसरी तरफ अपनी परंपरा, अपनी संस्कृति के नाम पर अपने यहां किसी को आने नहीं देना चाहते। अपने बाजार में किसी को हिस्सेदारी नहीं करने देना चाहते और दुनियाभर के बाजारों में माल बेचना चाहते हैं। लगता है, जैसे हमें यह हक है कि हम दुनिया में हर जगह चालाकी करें और लोग हमारी चालाकी का शिकार हों। साथ ही वे कभी हमें पलटकर न कहें कि हम चालाकी कर रहे हैं। अगर आप चाहते हैं कि आप बाजार का फायदा उठाएं तो बाजार का भी हक है कि वह आपसे फायदा उठाए। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नाम पर जो यह अंधविश्वासी कट्टरता है, वह और कुछ नहीं, सिर्फ भोथरा भावुकतावाद है। राजनीतिक पार्टियां अपने आपको ज्यादा देशभक्त, ज्यादा राष्ट्रवादी दिखाने और बताने के लिए रिटेल के क्षेत्र में एफडीआइ का विरोध कर रही हैं। जबकि हकीकत यह है कि देश का बिचौलिया सिर्फ खून नहीं चूसता, बल्कि किसानों के शरीर से खून की आखिरी बूंद तक खींच लेना चाहता है।

क्या हम इसलिए इस शोषण और खून चूसने वाले इन दैत्यों को बर्दाश्त करें, क्योंकि वे हमारे अपने भाई बंधु हैं। यह गलत विचार है। दादागीरी चाहे चाचा की हो या मामा की, वह दादागीरी ही होती है और वह गलत होती है। हम अपने आम किसानों और आम उपभोक्ताओं को इसलिए पिसते रहने का आह्वान नहीं कर सकते कि हमें पीसने वाले अपने ही लोग हैं। अपने लोग अगर खंजर घोंपते हैं तो क्या खून की जगह पसीना निकलता है? जो लोग विदेशी निवेश का विरोध कर रहे हैं, उन्हें एक-एक चीज को, एक-एक नजर से नहीं देखना होगा। उन्हें समग्रता से देखना होगा कि हम आधुनिक दुनिया में प्रतिस्पर्धी होना चाहते हैं या सबसे कटकर किसी एकांत टापू में सत्रहवीं सदी का जीवन जीना चाहते हैं। याद रखें एक तरफ दुनिया में सुपर पॉवर बनने की ख्वाहिश रखना और दूसरी तरफ अपने अतीत के खूंटे से बंधे रहना, ये दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं।

- लोकमित्र (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
साभारः दैनिक जागरण