किसान क्यूं है बदहाल ?

सवा दो लाख करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि केन्द्र सरकार हर साल किसानों की मदद के लिए खर्च करती है। ये राशि फर्टिलाइजर सब्सिडी, बिजली, फसल बीमा, बीज, किसान कर्ज, सिंचाई जैसी मदों में खर्च की जाती है बावजूद इसके देश का किसान बदहाल है। उसकी हालत इतनी खराब है कि वो अपनी दैनिक जरूरतों का भी पूरा नहीं कर पा रहा है। उसकी और उसके जैसे दूसरे 75 फीसदी आबादी की मदद के लिए सरकार सस्ती दर पर अनाज के साथ परिवार के एक सदस्य को मनरेगा के तहत 100 दिनों का रोजगार मुहैया कराती है लेकिन किसानो की स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही है।

किसानों को मदद देने के लिए उनकी कर्जमाफी की लिस्ट में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ नए नाम हैं। यहां की नई सरकारों ने किसानों की कर्जमाफी का एलान किया है जिससे इन तीन राज्यों की सरकारों को अपने बजट में 25 हजार करोड़ का अतिरिक्त भार झेलना पड़ेगा। इस फैसले का असर ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी देखा गया है क्योंकि वहां की सरकारें भी अब किसानों की कर्जमाफी की जोड़ घटा में जुटी हैं। बीजेपी शासित झारखंड ने भी किसानों के लिए राहत योजना की घोषणा कर दी है वहीं हरियाणा जल्द ही इस दिशा में बड़ा एलान कर सकता है।

इस साल लोकसभा चुनाव में किसान और उसकी कर्ज माफी बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में लोकसभा की 220 सीटें हैं। किसान कर्ज का 49 फीसदी हिस्सा यहीं है। हालांकि इन पांचों राज्यों में राजनीतिक दलों का स्वरूप और रुख कुछ ऐसा है कि यह कहना मुश्किल है कि आगामी लोकसभा चुनाव में उंट किस करवट बैठेगा। कुछ राज्यों में तो लड़ाई ऐसे दलों के बीच है जो किसान कर्ज माफी जैसे मुद्दे पर ही मैदान में उतरेंगे। किसान कर्ज माफी को लेकर जिस तरह हर दल में सुगबुगाहट बढ़ने लगी है उससे ये साफ है कि कर्जमाफी के लिहाज से किसानों के दिन अच्छे आने वाले हैं।

आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में तो खैर बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए कोई बड़ी जगह नहीं है और वह गठबंधन साथियों के साथ ही अपना पैर जमाएंगे, लेकिन उत्तर प्रदेश,महाराष्ट्र और कर्नाटक में पिछले चुनावों में बीजेपी ने बड़ा अंतर बनाया था। 2014 लोकसभा चुनाव में इन पांच राज्यों की 220 सीटों में से बीजेपी ने 114 पर कब्जा किया था।

2009 के लोकसभा चुनाव से पहले यूपीए ने 2008 में किसानों का कर्ज माफ किया था। उस मद में तब 60 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। कर्ज माफी के बाद इन पांचों राज्यों में कांग्रेस 85 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी जिसकी वजह से उसकी दोबारा सत्ता में राह आसान हुई थी।

यूपी और तमिलनाडु को छोड़ दें तो आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में किसानों की समस्या सबसे गंभीर मानी जा रही है। आंध्र प्रदेश में विधान सभा चुनाव लोकसभा के साथ ही होंगे। आंध्र प्रदेश के अलावा ओडिशा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के विधान सभा चुनाव भी लोकसभा के साथ होने हैं। ओडिशा में बीजेपी नेतृत्व की ओर से किसानों का कर्ज माफ करने की मांग की गई है। जाहिर है कि वहां विधानसभा में बीजेपी की ओर से इसका ऐलान भी किया जाएगा।

देश में किसानों की कर्ज माफी के मुद्दे को परवान चढ़ाने का श्रेय हरियाणा को जाता है। साल 1987 में जब देवीलाल दूसरी बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने किसानों के दस हजार रुपये तक के कर्ज माफ कर दिए। उस समय दस हजार रुपये एक बड़ी रकम थी। तब हरियाणा सरकार पर 240 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा था। आज किसान कर्ज माफी देश का ज्वलंत मुद्दा है। किसान एक बड़ा वोट बैंक हैं। कई बार की कर्ज माफी के बाद भी किसान हमेशा कर्जदार बना रहता है। सरकार किसान को बजाय मजबूत बनाने के क्यों उसे कर्ज के भंवर में फंसने पर मजबूर कर देती हैं। एक कृषि प्रधान देश होते हुए भी देश का किसान क्यों भूखा मर रहा है? इस मुद्दे पर हम सबको सोचने की जरूरत है।

गांव के गरीबों के लिए सरकार घर और गैस कनेक्शन मुहैया करवा रही है। बच्चों के लिए फ्री प्राइमरी शिक्षा है। जिला अस्पतालों और स्वास्थ्य केन्द्रों में फ्री सेवा है।  

आजादी के बाद के 65 सालों की बात करें तो इंडस्ट्री सेक्टर 6.1 फीसदी, सर्विस सेक्टर 6.2 फीसदी जबकि कृषि क्षेत्र महज 2.9 फीसदी की दर से बढ़ा है। देश की जीडीपी में 1950-51 में कृषि सेक्टर का हिस्सा जहां 53.1 फीसदी था अब से घटकर 15.2 फीसदी पर आ गया है। देश में कुल आबादी का 50 फीसदी किसान हैं यानि 50 फीसदी लोगों की आय का जरिया खेतीबाड़ी है। देश के कुल निर्यात में उनकी 12 फीसदी हिस्सेदारी है बावजूद इसके देश के आधे से ज्यादा किसानों पर कर्ज का बोझ है। इसकी मुख्य वजह खेती फायदे का सौदा ना होना और जमीनों का खत्म होना है। लगातार नए संसाधन और हाई ब्रिड बीज आने के बावजूद किसान के लिए खेती नुकसान का सौदा बनती जा रही है। जबकि हर साल किसानों को सस्ता फर्टिलाइजर यानी यूरिया मुहैया कराने के लिए केन्द्र सरकार सत्तर हजार करोड़ रूपये सब्सिडी के रूप में खर्च करती है।

हालांकि कई और देशों में जीडीपी में कृषि क्षेत्र की भागीदारी घटी है। दक्षिण कोरिया में ये दो,ताइवान में 1.6, फ्रांस में 1.5, जापान और अमेरिका में एक फीसदी और ब्रिटेन में महज आधा फीसदी कृषि क्षेत्र का योगदान जीडीपी में है। भारत का दुर्भाग्य ये है कि इन देशों ने जहां कृषि क्षेत्र में रोजगार के कम होते अवसर की जगह दूसरे क्षेत्रों में रोजगार के मौके पैदा किए हैं वहीं हमारे यहां ऐसा नहीं है। दक्षिण कोरिया और ताइवान में पांच, जापान में साढे तीन, फ्रांस में तीन, अमेरिका में दो और ब्रिटेन में एक फीसदी लोगों को कृषि क्षेत्र में रोजगार मिला है जबकि भारत में अभी भी 50 फीसदी लोग कृषि क्षेत्र के जरिये अपनी आजीविका कमाने की कोशिश कर रहे हैं।

लोकसभा में एक सवाल के जवाब में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा कि देश में 52प्रतिशत किसान परिवारों के कर्जदार होने का अनुमान है और प्रति कृषि परिवार पर बकाया औसत कर्ज 47,000 रुपये है। उनके मुताबिक देश में किसानों के बकाया कर्जों का लगभग 60 प्रतिशत संस्थागत स्रोतों से है, जिसमें सरकार से 2.1, सहकारी समिति से 14.8और बैंकों से लिया गया लोन 42.9 प्रतिशत था। उन्होंने 2014 से लेकर 2016 के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के हवाले से लोकसभा में बताया कि इन तीन वर्षों के दौरान ऋण, दिवालियापन और अन्य कारणों से करीब 36 हजार किसानों और कृषि मजदूरों ने खुदकुशी की।

किसानों की बदहाली का कारण यह भी है कि केन्द्र और राज्य सरकारों की उनको लेकर बनाई गई दीर्घकालीन नीति में जबरदस्त कमी है। महाराष्ट्र सरकार की बात करें तो राज्य में किसानों की खुदकुशी नई बात नहीं है। अपनी दशा से बौखलाये 40 हजार किसानों ने जब फरवरी 2018 में नासिक से लेकर मुंबई तक 180 किलोमीटर पैदल मार्च किया तो राज्य सरकार के हाथ पैर फूल गए और मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने हाथ जोड़कर आनन फानन में किसानों की सभी मांगे मानने का एलान कर दिया।

यूपी विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने किसानों से कर्जमाफी का वादा किया। सत्ता में आते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कर्जमाफी का एलान किया भले ही इससे राज्य सरकार के खजाने पर अतिरिक्त 37 हजार करोड़ रुपये का खर्च पड़ा।

किसानों की कर्ज माफी को लेकर चुनाव प्रचार में जोर-शोर से वादा किया जाता है लेकिन अभी तक कोई नीति नहीं बनी है। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने इस पर राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की है। प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में पटनायक ने कहा है कि किसानों की कर्ज माफी पर बाकायदा नीति बने जो कि ये तय करे कि अगर किसानों की कर्ज माफी की जाएगी तो उसमें राज्य सरकार और केन्द्र सरकार का कितना हिस्सा हो। अपने पत्र में पटनायक ने कर्ज माफी को राजनीतिक मुद्दा न बनाते हुए बाकायदा केन्द्र और राज्य की हिस्सेदारी वाली नीति बनाने पर जोर दिया। उनका कहना है कि केन्द्र और राज्य के बीच 60-40 की हिस्सेदारी होनी चाहिए ताकि सारा बोझ राज्यों पर ना पड़े। साथ ही छोटे और मझोले उद्योगों को कर्ज देने वाले क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट की तर्ज पर किसानों के लिए भी कुछ ऐसे ही ट्रस्ट बनाने की पहल की जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि देश में साल 1966-67 के अकाल के बाद से सरकार की कृषि नीति का मकसद था कि देश में खाद्यान्न का उत्पादन कम ना हो जाए और खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ ना जाएं। चिंता उत्पादन की थी, उत्पादक की नहीं, इसलिए सरकारी नीतियों के जरिये फसलों के दाम दबा कर रखे गए। गरीबों को सस्ता अनाज मिल सके इसका बोझ किसान के कंधों पर डाल दिया गया। फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था तो बनी,लेकिन इसे इतना दबा कर रखा गया कि किसान की लागत भी मुश्किल से निकल पाती है। मंहगाई और मौसम की मार झेल रहे किसानों की दशा लगातार खराब होती जा रही है।

किसानों की हालत सुधारने के लिए साल 2004 में राष्ट्रीय किसान आयोग बनाया गया। इस आयोग के अध्यक्ष स्वामीनाथ ने दो सालों में अपनी छह रिपोर्ट तैयार की जिनमें कई सुधार की बात कही गई। इन सिफारिशों के मुताबिक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की बात कही गई। ताकि छोटे किसान भी मुकाबले में आएं, यही इसका मकसद है। किसानों की फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य कुछ ही नकदी फसलों तक सीमित न रहें, इस लक्ष्य से ग्रामीण ज्ञान केंद्र और बाजार का दखल स्कीम भी लॉन्च करने की सिफारिश की गई।

स्वामीनाथ आयोग की रिपोर्ट में भूमि सुधारों को बढ़ाने पर जोर दिया गया है। अतिरिक्त और बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांटना, आदिवासी क्षेत्रों में पशु चराने का हक देना शामिल है। आयोग की सिफारिशों में किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, सेहत सुविधाएं बढ़ाने और वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है। इसमें बीमा योजना लागू करने की बात भी कही गई है लेकिन किसानों का आरोप है कि बीमा कंपनियां अलग अलग बहाने से बीमा रकम देने से कतराती हैं।

अब सवाल ये उठता है कि कर्ज माफी की जगह क्या रास्ता अख्तियार किया जाए जिससे किसान भूखा ना मरे? कृषि प्रधान देश होते हुए भी यहां का किसान परेशान हैं। जानकारों का मानना है कि सबसे जरूरी न्यूनतम समर्थन मूल्य का काम किसानों की को-ऑपरेटिव को तय करने दें। साथ ही बाजार भाव पर फसल बिके। इसकी देख-रेख की व्यवस्था सरकार करे। किसान को अपनी मर्जी की फसल उगाने की आजादी हो और बिचौलियों की बजाय उसकी सीधी पहुंच मंडियों तक हो। इससे राजनीति कम और किसानों की आमदनी में इजाफा होगा।

जानकार मानते हैं कि किसान कर्ज माफी समस्या का समाधान नहीं है। किसान कर्ज माफी को लेकर सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग भी खुश नहीं है। नीति आयोग के वाइस चेयरमैन राजीव कुमार का कहना है कि कर्ज माफी से महज कुछ ही किसानों को लाभ होगा और इससे कृषि संकट का कोई हल नहीं निकलेगा।

संभावना ये भी है कि कांग्रेस पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव में कृषि कर्ज माफी को बड़ा मुद्दा बना सकती है। नीति आयोग के सदस्य और कृषि मामलों के विशेषज्ञ रमेश चंद का कहना है कि कर्ज माफी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इससे मात्र कुछ ही किसानों को फायदा होता है।

चंद के मुताबिक गरीब राज्यों में मात्र 10 से 15 प्रतिशत किसानों को ही कृषि कर्ज माफी का फायदा हुआ क्योंकि इन राज्यों में कुछ ही किसान संस्थागत कर्ज हासिल कर पाते हैं। कई राज्यों में 25 प्रतिशत किसान भी संस्थागत कर्ज प्राप्त नहीं कर पाते। उनका कहना है कि जब अलग-अलग राज्यों में संस्थागत कर्ज लेने वाले किसानों के अनुपात में इतना अंतर है तो कृषि कर्ज माफी पर इतनी धनराशि खर्च करने की सार्थकता क्या है? चंद ने कहा कि कैग रिपोर्ट में भी कहा गया है कि कृषि कर्ज माफी से फायदा नहीं होता। इसलिए कर्ज माफी कृषि संकट को हल करने का समाधान नहीं है। कुमार और चंद के मताबिक नीति आयोग कृषि मंत्रालय को यह सुझाव देगा कि राज्यों को दी जाने वाली धनराशि को प्रदेशों द्वारा कृषि क्षेत्र में किए जाने वाले सुधारों से लिंक कर दिया जाए।

जानकार मानते हैं कि कर्ज माफी की बजाय किसानों की आय बढ़ाने के उपाय पर विचार करना चाहिए। किसान, किसान नेताओं और नीति विश्लेषकों का कहना है जब तक किसानों की उपज का मूल्य निर्धारित नहीं होगा,किसान की आमदनी नहीं बढ़ेगी। कर्ज माफी योजना के तहत कुछ किसान एक बार तो कर्ज मुक्त हो जाते हैं, लेकिन अगले सीजन की फसल के लिए उनके सामने वही समस्या मुंह खोले खड़ी मिलती है। मसलन महंगे बीज, खाद, उर्वरक और कीटनाशकों, सिंचाई के संसाधनों के बढ़ते खर्चे के चलते किसान फिर कर्ज के मकड़जाल में फंस जाता है। वहीं एक बार जिस किसान का कर्ज माफ हो गया है उन्हें अगली बार कर्ज देने में बैंक भी आनाकानी करते हैं।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई की तमिलनाडु के किसानों की कर्ज माफी योजना पर जारी एक समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि कर्ज माफी में शामिल किसानों को दोबारा कर्ज मिलने में आने वाली दिक्कत के पीछे सबसे बड़ी वजह यह बताई गई है कि बैंकों को यह डर रहता है कि किसान दोबारा भी कर्ज नहीं चुकाएंगे। इसलिए वह बेहतर रिकॉर्ड वाले किसानों को कर्ज देते हैं।

वहीं दूसरी ओर बैंकों के लिये भी किसानों की कर्ज माफी काफी जटिलताएँ लेकर आती है। बैंकों को कर्ज माफी योजना से कोई लाभ नहीं होता क्योंकि उन्हें एक ही पैमाने को आधार बनाकर कर्ज लौटा पाने या न लौटा पाने वाले ग्राहकों को लोन मुहैया कराने को मजबूर होना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक, 2010-11 में बैंकों के फंसे हुए लोन यानी एनपीए में 44 फीसदी हिस्सा कृषि क्षेत्र में दिए गए लोन का था। ऐसे में एक बार किसान का लोन माफ होने पर बैंक उसे दूसरी बार ऋण देने से साफ मना कर देता है। ऐसे में बैंकों से कर्ज ना मिलने की स्थिति में किसानों के सामने साहूकारों से ज्यादा ब्याज दर पर कर्ज लेने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचता।

इसके अतिरिक्त, फसलों का उचित दाम ना मिलना और खेती के सारे संसाधनों मसलन बीज, उर्वरक, कीटनाशक, कटाई, बुआई, सिंचाई के लिए मशीनों और बाजार पर निर्भरता वो वजहें हैं, जिससे बिना कर्ज के खेती करना करोड़ों किसानों के लिए संभव ही नहीं है। अब राजनीति से परे सभी दलों को सरकार के साथ मिल कर एक ऐसी राष्ट्रीय नीति पर काम करना होगा जिसका लाभ छोटे और मझोले किसानों तक पहुंच सके और किसान खुशहाल हालत में देश को और खुशहाल बना सके।

- नवीन पाल (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)

नवीन पाल