कृषि सुधार कानूनों को लेकर किसानों का डर वाज़िब!

- संसद में विस्तृत चर्चा की बजाए लाए गए अध्यादेश ने डाला डर का बीज
- पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा किसानों को दिखाए गए सब्ज़बाग की विफलता से डिगा है भरोसा
- भूमि सुधार और निजी सुरक्षा प्रदान करने के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ करने का है स्कोप

किसान संगठनों के नेतृत्व में भारी तादाद में किसानों ने पिछले कई दिनों से दिल्ली को घेर रखा है। ये किसान मोदी सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में सुधार के प्रयास के तहत अध्यादेश के रूप में लाए गए कानून और संशोधनों का विरोध कर रहे हैं। सरकार के साथ उनकी चार चरणों की वार्ता हो चुकी है लेकिन उन्हें अपनी मांगों को स्वीकार किये जाने से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। इस बीच मीडिया में आ रही सड़क पर डटे बूढ़े, आसक्त और लंगर खिलाते प्रदर्शनकारी किसानों की तस्वीरें और वीडियो फुटेज आमजन के मनस में सहानुभूति और कौतूहल दोनों पैदा कर रहे हैं। उनके मन में असमंजस की स्थिति है कि आखिर सच क्या है? क्या हालिया सरकारी प्रस्ताव वास्तव में किसानों का भला करेगा? या फिर किसानों का डर जायज है?

उपरोक्त प्रश्न का सही जवाब ढूंढने के लिए हमें हाल में लाए गए तीन कानूनों के इतर मौजूद कानूनों और सरकार के तौर तरीकों का भी विश्लेषण करना होगा। दरअसल, सरकार द्वारा कृषि सुधार के लिए उठाए जाने वाले इतने बड़े कदम से पूर्व इस विषय पर संबंधित पक्ष को विश्वास में लेना आवश्यक था। ऐसा किसानों और किसान नेताओं के साथ समुचित चर्चा करके की जा सकती थी। हालांकि अधिकांश किसान संगठनों के नेतृत्व का वामपंथी विचारधारा से प्रभावित होने के कारण इसका कुछ हल निकलता इसकी संभावना कम ही थी लेकिन आम किसानों के साथ स्थानीय नेतृत्व का प्रत्यक्ष संवाद कारगर साबित हो सकता था। सरकार द्वारा संसद में कृषि सुधार से संबंधित कानूनों का पूर्व प्रस्ताव लाकर और इसपर व्यापक चर्चा कराकर लागू करने की बजाए अध्यादेश के माध्यम को अपनाने के कार्य ने किसानों के मन में अंजाना डर पैदा कर दिया। यह डर वाजिब ही है क्योंकि पूर्व में जितने भी अध्यादेश लाए गए हैं उनमें से अधिकांश किसी न किसी रूप में लोगों के अधिकारों में कटौती करने का सबब ही बने हैं। यह बात और है कि बाद में सरकार ने नियम सम्मत इसे संसद से पारित करा लिया था।

किसानों का दूसरा सबसे बड़ा डर कृषि मंडियों के समाप्त हो जाने और उन्हें उनकी उपज का सरकार समर्थित मूल्य न मिलने का है। यह बात और है कि देश के महज 6% किसानों को ही एमएसपी का फायदा मिलता है। लेकिन किसानों के मन में कहीं न कहीं उस अच्छे दिन की उम्मीद है जब भगवान का कोई अवतार सरकार के रूप में आकर मौजूदा मंडी वाली व्यवस्था की सभी खामियों को दूर कर देगा और सौ फीसद किसान कृषि मंडी वाली व्यवस्था के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य की सुविधा हासिल कर पाएंगे। उन्हें डर है कि यदि सबकुछ बाजार और कॉरपोरेट के हवाले छोड़ दिया गया तो उनका और अधिक शोषण होगा। दरअसल दशकों से समाजवादी और वामपंथी विचारधारा वाले राजनीतिज्ञों और कथित प्रबुद्ध वर्गों के द्वारा आमजन के मन में बाजार और कॉरपोरेट का जो डर बैठा दिया गया है वह एक झटके में चला जाएगा यह उम्मीद करना बेमानी है। साथ ही पूर्व में एकाधिकार वाले स्थानीय लालाओं की छवि और उनकी कहानियां सुनकर बड़ा हुआ किसान अबतक प्रतिस्पर्धा के कारण होने वाले फायदों से अछूता रहा है। इस प्रकार वह इस बात पर आसानी से विश्वास कर लेगा यह मानना भी ज्यादती है।

इसके अलावा किसानों के मन में एक और बड़ा डर यह है कि कॉंट्रैक्ट फार्मिंग अर्थात अनुबंध आधारित खेती की व्यवस्था को कानूनी शक्ल देने से वे अपनी ही जमीन पर बंधुआ मजदूर बनकर रह जाएंगे। इसके अलावा कंपनियां उनके जमीन पर कब्जा कर लेंगी। इस डर के पीछे भी पूर्व की वे व्यवस्थाएं और कानूनी खामियां जिम्मेदार हैं जिसके तहत किसी की जमीन पर यदि कोई दूसरा चार वर्ष या उससे अधिक खेती-जुताई करता है तो वह उसके लिए उस जमीन पर अपना दावा ठोंकना आसान बन जाता था। ‘जिसकी जोत, उसकी खेत’ जैसे नारे इसी की परिणति थे। भोले भाले किसानों को अचानक से यह विश्वास करना मुश्किल हो रहा है कि उनकी जमीन पर यदि दूसरा कोई खेती करता है, विशेषकर पूंजीपति कंपनियां तो वह उसपर कब्जा नहीं कर लेगा।
इस प्रकार देखा जाए तो किसानों की उक्त आपत्तियां और आशंकाएं निर्मूल नहीं है। बाकी की कमी मोदी और बाजार विरोधी और मानसिकता रखने वाली राजनैतिक पार्टियां और किसान नेताओं ने पूरी कर दी। इसलिए सरकार को चाहिए था कि शुरु में ही किसानों से संवाद किया जाता और उनका विश्वास जीतने की कोशिश की जाती।

- अविनाश चंद्र