अनुबंध आधारित खेती को कानूनी ढांचा प्रदान करेगा कृषि बिल

संतोष गानर महाराष्ट्र के तटीय इलाके में स्थित रायगढ़ में दो एकड़ जमीन के मालिक हैं। यह जगह अल्फांज़ो आम के लिए विख्यात है। इसके बावजूद उन्होंने अत्यधिक मुनाफा दिलाने वाले आम की बजाय सस्ता चावल उगाने का विकल्प चुना है। जब मैंने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें भी आम उगाना पसंद है। चावल की खेती से उन्हें प्रति एकड़ 30 हजार रूपये ही प्राप्त होते हैं जबकि आम उगाने से उन्हें इससे दस गुना अधिक आय हो सकती है। लेकिन वह इस काम के लिए आवश्यक आरंभिक निवेश को वहन नहीं कर सकते थे, न ही वे पेड़ से फल प्राप्त करने के लिए पांच साल तक की अवधि का इंतजार कर सकते हैं।

उन्होंने दूसरों की गलती पर इतराने वाले भाव के साथ मुझे अपने उस मित्र के बारे में भी बताया जिसके पास आम का बागीचा है और वह शिकायत करता रहता है कि उसके लगभग आधे आम बर्बाद हो जाते हैं क्योंकि वे समय पर मंडी तक नहीं पहुंच पाते हैं। कोविड के दुष्प्रभावों के कारण यह वर्ष सबसे अधिक खराब रहा क्योंकि उसके अधिकांश आम नहीं बिक सके। गानर ने मुझे बताया कि किस प्रकार उन्होंने आधे खाये आमों से घिरे और बागीचे में खर्राटे लेते मोटी तोंद वाले बंदरों को देखा था। उनके दोस्त को उस दौरान गुलेल से बंदरों को भगाने का काम बिल्कुल जरूरी नहीं लगा। 

भारत में गरीबों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या काम में नुकसान के जोखिम को कम से कम रखना होता है। चूंकि उनके पास बचत के नाम पर ज्यादा कुछ नहीं होता है इसलिए वे उस व्यापार को करने के प्रति भी अत्यंत उदासीन होते हैं जहां जोखिम की थोड़ी भी संभावना होती है और जिसे आप या मैं कर सकते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वे निर्धनता के जाल में फंसे रहते हैं और मूल्यवान आम की बजाय सस्ता चावल उगाते रहते हैं। दुनिया भर के नीति निर्धारकों ने विभिन्न प्रकार के पूंजी निवेश और जोखिम को कम से कम करने वाले तौर तरीकों की खोज की है जैसे कि माइक्रो क्रेडिट ऋण। यह उन गरीब लोगों के लिए है जो पैसा कमाना चाहते हैं और साथ ही साथ अपने आप को जोखिम से भी बचा कर रखना चाहते हैं। भारतीय किसान देश की कुल आबादी में 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं और गरीबों की कुल संख्या में इनकी हिस्सेदारी तो उससे भी अधिक है। इन किसानों के साथ त्रासदी यह है कि भारतीय कृषि कानून जोखिम को न्यूनतम करने वाले उक्त उपकरणों को किसानों तक पहुंचने में बाधा पैदा करते हैं।  

भारत में गत वर्ष सितंबर माह के तीसरे सप्ताह तक जो कानून लागू थे उनके अनुसार किसान अपनी उपज को केवल स्थानीय मंडी और कृषि विप्पणन समितियों को ही बेच सकते थे। अनुबंध आधारित खेती जो कि जोखिम को न्यूनतम करने का अवसर उपलब्ध कराता है, वह गैर कानूनी था। गानर जैसे किसानों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए लागू किये गए पुराने कृषि कानून यह सुनिश्चित करते हैं कि किसानों को गरीबी से बाहर निकलने लायक धन कमाने न दिया जाए। 

यह दुख सिर्फ गानर का ही नहीं है बल्कि यही दुख उपभोक्ताओं का भी है। ऐसा इसलिये क्योंकि पुराने कानून उपभोक्ताओं के लिए कम कीमत पर फलों की उपलब्धता जैसा परिणाम लाने में असफल रहे हैं। यह एक दम उल्टा है।

भारत में फल अन्य कॉर्बोहाइड्रेट्स की तुलना में न केवल महंगे हैं (उदाहरण के लिए 100 किलो कैलोरी प्रदान करने वाले फल इतनी ही कैलोरी प्रदान करने वाले चावल से पांच गुना अधिक महंगे हैं) बल्कि पश्चिमी देशों में फलों की तुलना में भी 20 प्रतिशत अधिक महंगे हैं। परिणाम स्वरूप आम भारतीय नागरिक अन्य देशों के नागरिकों की तुलना में कम  फलों का सेवन करते हैं। वर्ष 2019 में जारी एनआईएन-आईसीएमआर की रिपोर्ट के आधार पर मेरा अनुमान है कि भारतीय लोग प्रतिदिन सिर्फ 32 ग्राम फल का सेवन करते हैं जबकि प्रतिदिन 100 ग्राम फल खाने की सलाह दी जाती है। फलों के सेवन में अत्यधिक कमी वाला यह अंतर गरीबों के बीच अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है।   

इसे एक त्रासदी ही कहेंगे क्योंकि सभी खाद्य वर्गों में फल शरीर को सबसे अधिक लाभ प्रदान करता है क्योंकि इनसे प्राप्त होने वाले विटामिन्स और माइक्रो न्यूट्रिशंस रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं शरीर को बीमारियों से बचाते हैं। भारतीय लोगों में विटामिन ए, जिंक, विटामिन सी और आयरन की सबसे अधिक कमी पायी जाती है। विटामिन सी और आयरन की कमी एनिमिया (शरीर में खून की कमी) का कारण बनता है जो कि वर्तमान में देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है। हमारे समक्ष स्थिति यह है कि किसानों के लिए बागवानी अस्थिरता और उपभोक्ताओं के लिए वहन क्षमता से बाहर की चीज बन गई है। 

मैंने गानर से पूछा कि यदि कोई उसकी जमीन पर आम का बागीचा लगाने के लिए निवेश करने, अलगे पांच वर्षों तक यानी जबतक पेड़ो पर आम नहीं लगते तब तक चावल न उगाने से होने वाले नुकसान की भरपाई करने और पेड़ो पर फले सभी आमों को खरीदने की पेशकश करे तो वह उसे कितनी छूट देंगे? बिना पलक झपकाए गानर ने तपाक से कहा कि वह खुशी खुशी 40 प्रतिशत की छूट दे देगा और इसके बावजूद उसे 3 लाख रूपये की आमदनी होगी। इतनी राशि उनकी वर्तमान आमदनी का दस गुने से भी अधिक होगा। उनका निवेशक जो कि आम के उत्पादन का विशेषज्ञ होगा और जिसकी बाजार में बेहतर पहुंच होगी (और उसके पास बंदरों को भगाने का भी निस्संदेह बेहतर तरीका होगा) वह प्रति एकड़ कम से कम पांच लाख रूपये कमाएगा। गानर को पैसे चुकाने और निवेश के ऐवज में मिलने वाले रिटर्न के बावजूद निवेशक लाभ का अधिशेष प्राप्त करेगा। और प्रतिस्पर्धी बाजार से उपभोक्ता को सस्ता आम भी मिल सकेगा।

यह अनुबंध आधारित कृषि का एक उदाहरण है जिससे किसान, निवेशक और उपभोक्ता सभी को लाभ प्राप्त होगा। एक एकड़ जमीन 30 हजार की पैदावार की जगह 5 लाख की पैदावार देना शुरु कर देगा। लेकिन इतने वर्षों तक गानर या निवेशक एक ऐसा अनुबंध करने के लिए क्यों राजी होता जिसकी कानूनी वैधता नहीं होगी? गानर निवेशक के साथ धोखा कर सकता है और पांच वर्ष बाद आमों को पूरी कीमत पर बेचने का फैसला कर सकता है। निवेशक भी गानर के साथ धोखा कर सकता है और उन आमों को खरीदने से मना कर सकता है जिनका उत्पादन हुआ है। और एक ऐसे वर्ष जब आम की भारी पैदावार हुई हो और गानर के सभी आम को खरीदने को बाध्य हुआ निवेशक अगले वर्ष के लिए उसका भंडारण कैसे करेगा यदि अचानक आम को एसेंसियल कमोडिटी एक्ट (ईसीए) के तहत सूचीबद्ध कर दिया जाएगा।

तीनों कृषि कानून, अनुबंध आधारित कृषि को कानूनी ढांचा प्रदान करते हुए इन सभी में परिवर्तन करते हैं। ये ही सुधार के मूल तत्व हैं, न कि ईसीए या मंडियों वाले छलावे। और पुराने व गलत नीतियों के कारण मोटे हुए उन सभी बंदरों को छोड़कर किसानों, उद्योगों और उपभोक्ताओं सभी का फायदा होगा।

- सुधीर सीतापति (इंडियन एक्सप्रेस)

यह लेख पहली बार प्रिंट संस्करण में 19 अक्टूबर 2020 को ‘सुधार का फल’ नामक शीर्षक के तहत प्रकाशित हुआ था। लेखक हिंदुस्तान यूनिलिवर के कार्यकारी निदेशक और सीआईआई फूड प्रोसेसिंग कमिटी के को-चेयर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।