जब दोषियों को सजा हो तभी फायदा है भंड़ाफोड़ का

क्या राबर्ट वढेरा के बारे में भंडाफोड़ भ्रष्टाचार को खत्म कर देगा ? या यह एक और सनसनी है जो मध्यम वर्ग को कुछ सप्ताह तक झनझनाती रहेगी और फिर उसे भुला दिया जाएगा। क्या राजनीति भारत का अबतक का सबसे बड़ा धंधा है?

मैं बहुत आशावादी नहीं हूं। हर पार्टी के राजनीतिज्ञ अपने प्रतिद्वंदियों पर कीचड उछालना पसंद करते हैं। एक अच्छे व्यापारी के तौर पर उनको उम्मीद होती है कि कि इससे उनका मार्केट शेयर बढ़ जाएगा। लेकिन क्या वे व्यापार को पूरी तरह बंद करेंगे और कम लाभदायक धंधे में चले जाएंगे। मुझे संदेह है।

पिछले वर्ष के अन्ना हजारे आंदोलन को याद कीजिए। वे नागरिकों को लुभाने में कामयाब रहे थे और और उससे पैदा हुए दबाव ने राजनीतिक दलों को लोकपाल बिल का समर्थन करने को मजबूर किया था जिसका मकसद था एक ऐसी नई व्यवस्था तैयार करना था जो भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के खिलाफ तेजी से मुकदमा चलाए। सभी दलों ने अन्ना हजारे को आश्वस्त किया था कि संसद के शीतकालीन सत्र में बिल पास हो जाएगा। लेकिन उसके बाद उन्होंने इस रोकने के लिए नाटकीय तरीके अपनाए। उन्होंने वादा किया था कि संसद का अगला सत्र शुरू होने पर वे कार्रवाई करेंगे।

लेकिन तबतक अस्थिर मनोवृत्तिवाले मध्यम वर्ग की दिलचस्पी खत्म हो चुकी थी और हजारे बड़ी तादाद में भीड़ को आकर्षित नहीं कर सके। बिल को संसदीय समिति को भेज दिया गया। जहां उस पर लंबे समय तक विचार होता रहेगा और बाद में लेप्स हो जाएगा। राजनीतिक दलों के बीच एक अलिखित समझदारी यह है कि कोई भी भ्रष्टाचार विरोधी कानून असरदार नहीं हो। कई राज्यों में लागू लोकायुक्त कानूनों का यही हश्र हुआ है। कोई लोकायुक्त राज्य स्तरपर भ्रष्टाचार में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं ला सका।

राबर्ट वढ़ेरा का भंड़ाफोड करने के लिए अरविंद केजरीवाल की तारीफ की जानी चाहिए। एक समय का कबाड़ का व्यापारी और प्रियंका गांधी का पति अमीर बन गया। पब्लिक बैंकों से आसान कर्जों, हरियाणा सरकार की मदद, और डीएलएफ से मिले एडवांस से उसकी अज्ञात कंपनी के कुछ लाख के शेयर सैंकड़ों करोड़ के हो गए। इसका औचित्य साबित करते हुए कांग्रेस के प्रवक्ता हास्यास्पद लग रहे थे। सभी जानते हैं कि यह आइसबर्ग की नोंक जितना ही है। जो सौदे हुए है नंबर वन के पैसे में हुए हैं जबकि जबकि राजनीतिक व्यापार नंबर–दो में होता है।

यदि केजरीवाल अब कुछ विपक्षा नेताओं के संदिग्ध सौदों का भंड़ाफोड़ करते हैं तो क्या होगा? क्या सारी राजनीति बदल जाएगी? नहीं, सभी राजनीतिक दलों के राजनीतिज्ञ उसके खिलाफ इकट्ठा होकर उसकी विश्वसनीयता को कम करने की कोशिश करेंगे। घोटालों का भंड़ाफोड़ करने के लिए उसका अभिनंदन करने के बजाय ऐसी स्थिति पैदा कर देंगे जिसमें उसके काल्पनिक मामलों की जांच की जाएगी और वह अपने को तकनीकी गलतियों के मामलों में फंसा पाएंगे। यह पिछले साल टीम अन्ना के सदस्यों के साथ हुआ था और फिर होगा।

इससे भी बुरा यह होगा कि वह बड़े पैमाने पर सभी दलों के नेताओं का भंड़ाफोड करेगा तो मध्यम वर्ग की दिलचस्पी कम हो जाएगी। जनता निराशावादी और चंचल मन की होती है और उसका मन एक ही मुद्दे पर कम समय तक टिकता है। वह बड़ी हस्तियों के बारे में भंड़ाफोडों को पसंद करती है। खासकर ऐसे भंड़ाफोड़ों को पसंद करती है जिन्हें कई किश्तों में उजागर किया जाता है। हर दिन होनेवाला नया भंड़ाफोड़ लोगों का मनोरंजन करता है। जो बोफोर्स, 2जी, और कोल आबंटन के बारे में सही है वही वढ़ेरागेट के बारे में भी सही है।

लेकिन यदि एक दर्जन राजनेताओं पर अलग-अलग तरह के आरोप लगाए जाते हैं तो एंकरों और मध्य वर्ग पर आंकड़ों का बोझ बढ़ जाएगा और उनकी आंखें चुंधिया जाएंगी। ऐसा पहले भी हुआ है जब टीम अन्ना ने प्रधानमंत्री सहित 15 मंत्रियों के खिलाफ आरोप लगाकर उनकी तुरंत जांच करने और कुछ सांसदों के खिलाफ 150 आपराधिक मामलों में चल रहे मुकदमों की रफ्तार तेज करने की मांग की थी। जनता इन सूचनाओं को हजम नहीं कर पाई और उसमें उसकी कोई दिलचस्पी पैदा नहीं हो पाई। केजरीवाल ने इससे कुछ सीखा और अब दूसरों के खिलाफ आरोप कुछ अंतराल से लगाएं  जाएंगे।

लेकिन यदि वह हर पार्टी के भ्रष्टों का भंड़ाफोड़ करे तो क्या भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा? नहीं क्योंकि वह केवल पुलिस, न्यायपालिका और अभियोजनकर्ताओं में प्रमुख सुधार करके ही संभव है। अभी मामलों का फैसला होने में इतना समय लगता है कि तमाम अपीलों के बाद सजा मिलने में से पहले आरोपी बूढ़े होकर भगवान को प्यारे हो जाते हैं। ललित नारायण की हत्या का मामला 37 वर्षो से चल रहा है 30 जज बदल गए। ज्यादातर गवाह मर गए। इसके बावजूद हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस देरी के लिए व्यवस्था को जिम्मेदार नहीं ठहराया नहीं जा सकता।

लालू यादव के खिलाफ चारा घोटाले में और मायावती के खिलाफ ताज कोरिडोर वाले मामले में न्यायिक प्रक्रिया  लंबे समय से चल ही रहे हैं। 2006 में ओमप्रकाश चौटाला के खिलाफ 1400 करोड के घोटालों के मामले उजागर हुए थे उनकी रकम वढ़ेरा से कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद चौटाला के मामले धीमी गति से चल ही रहे हैं। लोगों की दिलचस्पी खतम् हो गई है। इसलिए चौटाला अगले मुख्यमंत्री होंगे न कि जेल के कैदी।

यह चौंकानेवाली बात है न? लेकिन जब  न्यायिक व्यवस्था भ्रष्ट लोगों को सजा नहीं दे सकती तब राजनीति और अन्य क्षेत्रों में भ्रष्ट लोग फलेंगे फूलेंगे ही। व्यवस्थागत परिवर्तन केवल तभी संभव है जब तेजी से जांच और दंड देने के लिए पुलिस और न्यायपालिका में क्रांतिकारी सुधार किए जाएं। लेकिन इससे टीवी चैनलों की लोकप्रियता नहीं बढ़ती इसलिए न ही केजरीवाल  और न ही टीवी एंकर इस पर अपना ध्यान केंद्रीत करेंगे। इसके बजाय वे नवीनतम सनसनी पर ध्यान लगाएंगें।

- स्वामीनाथन  एस अंकलेसरिया अय्य़र

स्वामीनाथन अय्यर