इनटाइटलमेंट और अधिकारों में फर्क है

राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता् लगातार नए अधिकारों की बात करते हैं- काम का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और अब भोजन का अधिकार। "अधिकार" शब्द को तोड़-मरोड़कर इनटाइटलमेंट के पर्याय में इस्तेमाल किया जाने लगा है, लेकिन दोनों में काफी फर्क है।

अधिकार राज्य और समाज के किसी भी प्रकार के दमन (जाति, धर्म और लिंग के आधार पर) से मुक्त होते हैं। अधिकारों के लिए राज्य से किसी तरह के अनुमोदन की जरूरत नहीं होती, जबकि इनटाइटलमेंट वो कल्याणकारी योजनाएं (कदम) हैं, जिनके लिए सरकार की सहमति जरूरी होती है। अधिकारों को बजट से सीमित नहीं किया जा सकता, जबकि इनटाइटलमेंट बजट के अनुरूप ही तय होता है। इस तरह से राइट सार्वभौमिक होते हैं, जबकि इनटाइलमेंट नहीं।

इतिहास के पन्नों को पलटें तो भारत में जनकल्याण पर अधिक खर्च नहीं किया जा सका है। भारत में समृद्धि बढ़ने के साथ ही जनकल्याण पर खर्च बढ़ाने की गुंजाइश बढ़ सकती है। हालांकि पश्चिम के देशों में आए आर्थिक संकट हमें ये चेतावनी भी देते हैं कि ये इनटाइलटमेंट बढ़ते-बढ़ते इतना अधिक बढ़ सकते हैं कि आर्थिक रूप से शक्तिशाली सरकारों को भी कंगाली की दर तक पहुंचा सकते हैं। इसलिए बजट की बाध्यताओं के अनुरूप इनटाइटलमेंट को सीमित ही रखा जाना चाहिए। लेकिन अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता। इसलिए राइट, यानी, अधिकार और इनटाइटलमेंट के बीच अंतर को समझने में भ्रमित नहीं होना चाहिए।

अमेरिकी अर्थशास्त्रियों  के अनुमान के मुताबिक तीन कल्याणकारी योजनाओं-बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा, बुजुर्गों के लिए चिकित्सा सुविधा और गरीबों के लिए चिकित्सा सहायता-का कुल खर्च अगले दशक तक वहां की जीडीपी के 7 फीसदी से बढ़कर 20 फीसदी तक पहुंच जाएगा। अमेरिका का सारा कर संग्रह इन तीन योजनाओं पर ही कुर्बान हो जाएगा। ‘केटो इंस्टीच्यूट’ के जगदीश गोखले ने हिसाब लगाया है कि सामाजिक सुरक्षा समेत तमाम योजनाओं की वजह से अमेरिका का राष्ट्रीय घाटा जीडीपी के 500 फीसदी और यूरोप का राष्ट्रीय घाटा जीडीपी के 434 फीसदी तक जा पहुंचेगा। बोस्टन यूनिवर्सिटी के विद्वान लॉरेंस कॉटलिकॉफ का कहना है कि कल्याणकारी योजनाएं एक तरह का आर्थिक बोझ बन जाती हैं, जिसे जारी रखने के लिए लगातार इसके बोझ को अगली पीढ़ी के सिर डाल दिया जाता है।

समाजवादी इनटाइटलमेंट्स को लेकर खुद पर गर्व करने वाले ग्रीक के लिए भी अपने सरकारी बकाये की भरपाई करना मुश्किल हो रहा है, ये तब है जबकि उसे इस संकट से उबारने के लिए यूरोपीय संघ ने भारी मदद दी है। स्पेन, ब्रिटेन, पुर्तगाल और आयरलैंड भावी कर्ज संकट से बचने के लिए इनटाइटलमेंट्स में कटौती पर विचार कर रहे हैं। इनटाइटलमेंट को सीमित और सुलक्षित किया जाना बेहद जरूरी है।

एक दौर में लोक कल्याणकारी योजनाओं को महान मार्क्सवादी दर्शन की देन बताया जाता था, लेकिन स्वाभाविक तौर पर ये सभी लोकतांत्रिक और पूंजीवादी व्यवस्था में समाहित रहा है। ब्रिटेन में 16वीं सदी में बने कानून में गरीबों के लिए मजदूरी तय करने की बात की गई थी। इसे राइट टू वर्क या दान की संज्ञा नहीं दी गई। इसे इसाई धर्म की उदारता के तौर पर देखा गया, जिसका मकसद गरीबों को अपराध के रास्ते पर जाने से रोकना था।

1689 में बने ब्रिटिश बिल ऑफ राइट्स ने एक संवैधानिक राजतंत्र का निर्माण किया। इससे कानून में राजशाही हस्तक्षेप से मुक्ति मिली। इसके साथ ही संसद की मुहर के बिना किसी तरह के कर और शांति काल में सैन्य शासन से भी लोगों को आजादी मिल गई। निष्पक्ष चुनाव और अभिव्यक्ति की आजादी भी अधिकार के तौर पर प्राप्त हुई। ये सभी अधिकार थे, इनटाइटलमेंट नहीं।

1776 में यूएस डिकलयरेंस ऑफ इंडिपेंडेंस (आजादी की घोषणा) में कहा गया था कि सभी लोग एक समान हैं और उन्हें जीवन जीने का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार और अपनी पसंद का जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। 1789 में बने यूएस बिल ऑफ राइट्स में धर्म और अभिव्यक्ति की आजादी,  कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके से सभाएं करने का अधिकार, शांति काल में सैन्य कुर्की या जब्ती से मुक्ति का अधिकार, गैरकानूनी अधिग्रहण या गिरफ्तारी से मुक्ति का अधिकार दिया गया। इस कानून के तहत लोगों को अत्यधिक जमानत, यातना, मनमाने दोषारोपण और असहनीय और क्रूर दंड से भी मुक्ति दी गई। इसके साथ ही नागरिक सिपाहियों को हथियार रखने, कोर्ट द्वारा सार्वजनिक सुनवाई और कानूनी सलाह लेने का अधिकार भी मिला।

फ्रांस की क्रांति ने राइट्स ऑफ मैन (मानव का अधिकार) की नई अवधारणा रखी। इसने घोषणा की कि मानव जन्मजात तौर पर स्वतंत्र और समान है और उससे स्वाधीनता का अधिकार नहीं छीना जा सकता। इसके साथ ही मानव को संपत्ति, सुरक्षा और किसी भी प्रकार के दमन का विरोध करने के अधिकार से भी वंचित नहीं रखा जा सकता। इसने सभी लोगों के लिए समान नागरिक सहभागिता, कानूनी प्रक्रिया से इंसाफ पाने और धर्म और अभिव्यक्ति की आजादी दी।

इन तीन देशों (ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस) ने मौलिक अधिकार देने में दुनिया की अगुवाई की। इन तीनों देशों में अधिकार आजादी के लिए दिए गए थे, इन्टाइटलमेंट के लिए नहीं।

बाद में लोगों ने कहा कि ये पर्याप्त नहीं और इन्टाइटलमेंट्स की अवधारणा रखी- जिसे कुछ लोगों ने सेकेंड जेनरेशन राइट्स (दूसरी पीढ़ी के अधिकार) का नाम दिया। मार्क्सवादियों ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी, चुनाव और निजी स्वतंत्रता मध्य वर्ग का छलावा है, इससे गरीबों को कोई ताकत नहीं मिलती। लेनिन ने सर्वहारा वर्ग की निरंकुश व्यस्था का प्रस्ताव रखा, जिसने सभी आधारभूत आजादी के अधिकारों को जब्त कर लिया और इसके बदले भोजन, आवास और काम के अधिकार दिए। अजब बात है कि कोई भी शख्स लेनिन के इन दोयम दर्जे के प्रावधान को चुनौती नहीं दे सका। कोई भी माओ को कटघरे में खड़ा नहीं कर पाया, जबकि उसने अपने विस्तार के लिए 3 करोड़ लोगों को मरवा दिया। कोई स्टालिन पर सवाल नहीं उठा सका, जबकि उसने यूक्रेन में 40 से 60 लाख किसानों को मौत के घाट उतार दिया।

मार्क्सवादी शासन के अनुभव बताते हैं कि कल्याणकारी अधिकारों को मूलभूत स्वतंत्रता से ज्यादा प्राथमिकता देने की नीति गरीबी की ओर ले जाती है। और पूंजीवादी कल्याणकारी राज्यों के अनुभव अब यह बता रहे हैं कि इनटाइटलमेंट्स, हालांकि किसी भी लोकतंत्र में बेहद जरूरी और अपरिहार्य हैं लेकिन उन्हें जरूरतमंदों तक लक्षित और सीमित करना ही होगा ताकि उस पर ही पूरी आमदनी खर्च न हो जाए और राज्य कंगाली के कगार पर न पहुंच जाए।

ऐसे में भारत के कल्याणकारी स्वरूप में सुधार के लिए क्या सबक मिलते हैं? कुछ बदलाव जैसे कि-सूचना का अधिकार-बिलकुल उचित अधिकार है, क्योंकि इससे बजट पर कोई बोझ नहीं बढ़ता। इससे अलग, रोजगार गारंटी योजना या भोजन का अधिकार, ये इन्टाइटलमेंट्स हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं के दबाव में आकर इसे सभी लोगों को मुहैया कराने की बजाय सिर्फ जरूरतमंदों तक सीमित करना चाहिए। बात बहुत सीधी है, मुकेश अंबानी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार जरूर दिया जाना चाहिए लेकिन उन्हें 35 रुपये किलो का चावल 3 रुपये प्रति किलो में क्यों दिया जाए?

- स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर