लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए चुनावी सुधार ज़रूरी

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए देशों में भारत के पास लगातार सफल चुनाव संपन्न कराने का और एक मज़बूत व शांतिपूर्ण लोकतंत्र चलाने का अच्छा रिकॉर्ड है.  पिछले पचास सालों में कई देश जो लोकतान्त्रिक उम्मीदों के साथ जन्मे थे, समय के साथ तानाशाही ताकतों और सैन्य विद्रोहों का शिकार हो गए. हमारे पडोसी देश पाकिस्तान और बंगलादेश के उदाहरण से ही पता चलता है कि लोकतंत्र चलाना कितना कठिन है. फिर भी भारत विगत कई सालों से परिस्थितियों के साथ लचीलापन रखते हुए लोकतान्त्रिक मान्यताओं को बनाये रखने में कामयाब रहा है.  लोग बड़ी तादातों में वोट करने आते हैं और समय के साथ केंद्र व राज्यों की निर्वाचित इकाईओं में विभिन्न जातियों व सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व बढ़ा ही है.

मोंट पेलेरिन सोसाइटी के एशिया सम्मलेन में इन विचारों को रखते हुए लोक सत्ता पार्टी के अध्यक्ष जय प्रकाश नारायण ने कहा लोकतंत्र के प्रति हमारी प्रतिबद्धता में कई रोड़े भी आये हैं. १९७५ और १९७७ के बीच लगी इमरजेंसी ने कितने ही सामाजिक अधिकारों का हनन किया था और मीडिया की स्वतंत्रता पर वार किया था. इस के अलावा दूसरी कई समस्याओं से भी हमारा लोकतंत्र प्रभावित रहा है. जैसे कि निर्वाचन पत्रों में गड़बड़ी, बूथ कैप्चरिंग, वोटों की खरीद फरोख्त, चुनावों में बेहिसाब  खर्च,राजनीति का अपराधीकरण और विघटीकरण. विभिन्न प्रान्तों में पार्टियां व्यक्तिगत जागीरें बन कर रह गयीं हैं.  लोक सभा और विधान सभाओं में चर्चा व वाद-विवाद एक मज़ाक बन कर रह गया है. रातो रात विधायक खरीदें जाते हैं और सरकारें बदल जाती हैं. जनता का मत और अभिमत तो जैसे मायने ही नहीं रखता.  इन सभी बातों से एक अच्छी राजनैतिक व लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का ह्रास होता है.

श्री नारायण के अनुसार सब से पहली समस्या है चुनावों में ज़रुरत से ज्यादा खर्च. विधान सभा चुनावों में खर्च करने की तय राशि तो १० लाख रुपये है पर वास्तविकता में इस से कहीं ज्यादा व्यय होता है. ज़्यादातर व्यय वोट खरदीने, अधिकारियों को घूस देने और बाहुबलियों को रखने में होता है. दूसरे, धन बल और भ्रष्टाचार ने व्यवस्था को जैसे घेर के रखा है. पैसा और शराब आम तौर पर वोटरों को बाटी जाती है. चुनाव भी आजकल एक व्यवसाय की तरह बन गया है इस वजह से पढ़े लिखे लोगों का निर्वाचन प्रक्रिया से विश्वास सा उठ गया है. ज़्यादातर राज्यों में पार्टियां राजनैतिक/पारिवारिक जागीरें बन गयी हैं और धन बन, जाति बल, अफसरशाही से ताल्लुकात आदि जैसे मुद्दों पर चुनाव जीते जाते हैं और पार्टियों से आंतरिक लोकतंत्र ख़तम हो गया है.

जब बात चुनाव सुधार की होती है तो यह बात सहज ही जेहन में उभरती है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में धनबल और बाहुबल का वर्चस्व काफी बढ़ गया है। एक दौर वह था जब राजनीति को सेवा का जरिया माना जाता था और सियासत की डगर पर वैसे ही लोग अपने कदम रखते थे, जिनका एक सामाजिक जीवन होता था। पर आज हालात ऐसे हो गए हैं कि ईमानदार और सेवा भाव के साथ जीवन जीने वाले लोग राजनीति की राह पर आने से तौबा करने लगे हैं। आज सियासत की सवारी कसने वालों में अपराधी सबसे आगे नजर आते हैं। दुखद आश्चर्य तो तब होता है जब इन अपराधियों को टिकट देने के लिए हर प्रचलित दल ख़ुशी ख़ुशी इनका स्वागत करता हुआ दिखाई पड़ता है।

उन्होंने कहा कि निर्वाचित सरकारों का जीवन विधायकों के समर्थन पर निर्भर होता है. स्थानीय विधायक और अधिकारीगण हर बात में अपना फायदा देखने लगते हैं और भ्रष्टाचार का सिलसिला अनवरत चलता रहता है. वर्तमान चुनावी प्रणाली के आधार पर जो सरकारें बनती हैं, वे इन विकृतियों को दूर करने की बजाए इन्हें और मजबूत करती हैं। इसलिए देश में चुनावी सुधारो को जल्द से जल्द लाना  एक बड़ी ज़रुरत है और इस के लिए हम सबको आवाज़ उठानी चाहिए.

- स्निग्धा द्विवेदी