कैसे हो अमल शिक्षा के अधिकार पर

शिक्षा का अधिकार कानून की संवैधानिकता के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह प्रायवेट स्कूलों में आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों को 25 प्रतिशत आरक्षण को लागू करने के लिए पारदर्शी,न्यायपूर्ण और जवाबदेह तरीके ईजाद करे। इस पहल को आरक्षण के बजाय 25 प्रतिशत समावेशी सीटें या 25 प्रतिशत अवसर या राज्य संचालित सीटें कहा जा सकता है। एक सामान्य अनुमान यह है कि इस पर पूर्ण अमल के पहले वर्ष में 25 लाख से 70 लाख के बीच गरीब बच्चे लाभान्वित होंगे। उसके बाद आठ वर्ष तक यह आंकड़ा हर साल दोगुना होता जाएगा। इसलिए इन 25 प्रतिशत अवसर सीटों के सही इस्तेमाल के साथ गरीब छात्रों की बड़ी संख्या का भविष्य दांव पर लगा हुआ है।

पिछले दो वर्षों के दौरान इस प्रावधान पर हुई व्यापक चर्चा और मशविरे के बाद कुछ ऐसे विचार उभर कर आए हैं जिनसे इस समावेशी शिक्षा के वायदे को पूरा करने में मदद मिल सकती है।

पहला केंद्र सरकार 25प्रतिशत अवसर सीटों के भुगतान के लिए राज्य सरकारों पर निर्भर रहने के बजाय  सीधे भुगतान करे। राज्य सरकारें तो पहले से ही कह रही हैं कि उन्हें सर्व शिक्षा अभियान के लिए केंद्र से  मिल रही आर्थिक मदद में प्रायवेट स्कूलों की 25 प्रतिशत सीटों की लागत शामिल नहीं है। इस लागत को सर्व शिक्षा अभियान के बजट में शामिल करने के बजाय, जो हर राज्य में अलग –अलग है ,केंद्र के लिए ज्यादा आसान  और सुविधाजनक होगा कि वह सीधे यह जिम्मेदारी अपने ऊपर ले। कितनी रकम अदा की जाए इसे राज्य सरकारें अपने राज्य के स्कूलों को शिक्षा देने पर आनेवाली लागत के आधार पर तय करें। यह लागत  हर राज्य में अलग –अलग होगी। भुगतान केंद्र सरकार की तरफ से होना चाहिए।

केंद्र सरकार को हर वर्ष अदायगी की रकम की एडजस्ट करने के लिए एकरूप मापदंड अपनाने चाहिए। भविष्य के वर्षों में इस रकम की पुर्नगणना करने के बारे में राज्यों के वर्तमान शिक्षा का अधिकार कानून के तहत बने नियम अलग –अलग हैं।कुछ राज्यों में दो वर्षों में राज्य के खर्च की समीक्षा और भुगतान की रकम की पुनर्गणना की बात कही गई है। जबकि अन्य राज्यों का प्रस्ताव है कि भविष्य के वर्षों के लिए  पहले वर्ष की खर्च की राशि को  महंगाई के दर के साथ समायोजित किया जाए।

दूसरा केंद्र सरकार  भुगतान के प्रबंधन के लिए स्वतंत्र संगठन का गठन करे इसे भारत समावेशी शिक्षा कोष कहा जाए । इसमें केंद्र सरकार तो योगदान देगी ही यह संगठन कंपनियों ,फाउंडेशनों और और व्यक्तियों से भी धन जुटाए।इस गैर सरकारी कोष का उपयोग सरकारी स्कूलो की प्रति व्यक्ति लागत और प्रायवेट स्कूलों की फीस के  बीच के खाई पाटने के लिए प्रतिपूर्ति राशि के रूप में किया जा सकता है । प्रायवेट स्कूल इस खाई को पाटने  और अपने लिए धन जुटाने के लिए दानराशि स्वीकार सकते हैं, संगीत समारोह, सांस्कृतिक मेलों और अन्य वार्षिक कार्यक्रमों का आयोजन कर सकते हैं। इनसे मिलनेवाली राशि वे इस उपक्रम से निर्माण होनेवाली आर्थिक खाई को पाट सकते हैं. साथ ही, उन्हें सरकारी निधि भी मिलती रहेगी। गरीब वर्ग के 25 प्रतिशत छात्रों को शिक्षा प्राप्ति का मार्ग उपलब्ध करा देने के इस उपक्रम पर बेहतर तरीके से अमल कर सामाजिक एकीकरण और समग्र शिक्षा योजना में सहयोग देने के लिए स्कूलों को पुरस्कार भी दिए जा सकते हैं। इस योजना को लागू किए जाने के कारण निर्माण होनेवाली निजी स्कूलों की आर्थिक खाई की इन पुरस्कारों से आंशिक रूप से भरपाई की जा सकती है और साथ ही, इस चुनौती को गंभीरता से लेने के लिए भी उन्हें प्रोत्साहित किया जा सकता है।

तय रकम की प्रतिपूर्ति पूरी तरह और सही समय पर किए जाने के बारे में स्कूलों को आश्वस्त कराने के लिए केंद्र द्वारा अपना योगदान वार्षिक केंद्रीय शिक्षा बजट में शामिल कर रकम को 1अप्रैल को ही स्कूलों के खातों में डालना चाहिए।केंद्र सरकार को  अपनी देनेदारी पिछले वर्ष समावेशी शिक्षा कोष द्वारा अदा की गई रकम के बराबर माननी चाहिए और उतनी राशि एक अप्रैल तक कोष के खाते में जमा करा देनी चाहिए। नेशनल यूनिफार्म रूल के अनुसार अगस्त तक वर्तमान शैक्षिक वर्ष के लिए लागत  राशि का समायोजन कर लिया जाए पिछले वर्ष अदा की गई रकम को आधार माना जाए और 1 सितंबर तक उतनी राशि जमा की जाए।

तीसरी बात कि, 25 प्रतिशत के तहत योग्य उम्मीदवारों की पहचान की परिभाषा और उनको चुनने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ दी जाए. कुछ राज्यों ने सुझाव दिया है कि वे योग्य छात्रों की पात्रता तय करने के लिए वे छात्र कार्ड जारी करेंगे और इन कार्डों के आधार से स्कूल छात्रों का योग्यता तय कर सकते हैं। कुछ राज्यों द्वारा स्मार्ट कूपन्स, वाउचर्स या बायोमेट्रिक कार्डस् दिए जा सकते हैं। पहचान के बेहतर तरीके तय करने के लिए विभिन्न तरीके अपनाकर प्रयोग किए जाने की जरूरत है। कुछ वर्षों के अनुभव के पश्चात हम शायद ऐसा तरीका ढूंढ पाएं जो सभी राज्यों द्वारा स्वीकृत किया जाए।

योग्य उम्मीदवारों का जांच  राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण  आयोग(एनसीपीसीआर) की राज्य शाखाओं,और उससे जुड़े गैर सरकारी संगठनों को करना चाहिए। आयोग के पास यह अधिकार होना चाहिए कि वह 25 प्रतिशत अवसर सीटों के लिए योग्य छात्रों की शिनाख्त करने में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां होने पर  राज्यों के खिलाफ कार्रवाई कर सके ताकि उन पर अपनी शिनाख्त की प्रक्रिया और तकनीक में सुधार लाने के लिए दबाव बने।

इतना ही नहीं शिक्षा का अवसर सीटों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए कई और  प्रक्रियाएं तैयार करनी होंगी लेकिन उपरोक्त बातें उस संरचना की नींव होंगी जो शिक्षा का अधिकार के ऐतिहासिक वायदे को पूरा करने में मदद करेगी।

-पार्थ जे शाह
(लेखक सेंटर फार सिविल सोसायटी के अध्यक्ष हैं)