कानून के बाद भी शिक्षा के लक्ष्य बहुत दूर

बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 के पास हो जाने के बाद उम्मीद बढ़ी थी कि देश में प्राइमरी स्कूलों की शिक्षा के प्रबंध में भारी बदलाव आयेगा. 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के लिए बनाए गे इस कानून में बहुत कमियाँ हैं और इसको लागू करने की दिशा में ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति का  भी अभाव है. 1991 में जब मौजूदा प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने पी वी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री के रूप में कम संभाला था, उसके बाद से ही शिक्षा को अति महत्वपूर्ण मुकाम पर रख दिया गया था. डॉ मनमोहन ने वित्त मंत्री के रूप में उदारीकरण और वैश्वीकरण की जिन नीतियों का सूत्रपात किया था उन्हें बाद में आने वाली सरकारें भी नहीं  रोक सकीं.

आर्थिक विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी का सबसे अहम पक्ष है कि देश की आबादी का कुशल कामगार के रूप में विकसित होना. अपने पहले बजट से ही मनमोहन सिंह ने शिक्षा पर अधिक ध्यान देने की बात की थी. प्रधान मंत्री बनने के बाद तो उन्होंने नीतियों के स्तर पर सकारात्मक हस्तक्षेप की नीति अपनाई और आज देश में बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा का निजाम कायम हो गया है. लेकिन बात अभी ठीक नहीं हुई है. आज ही अखबारों में खबर है कि प्राइमरी स्कूलों में बच्चों के दाखिले घट रहे हैं. 2007 के बाद से ही यह प्रवृत्ति शुरू हो गयी है. 2008-09 और 2009-10 में  पहली और चौथी कक्षा के बीच 26 लाख कम बच्चे स्कूलों में पढने के लिए गए हैं. केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से जारी किये गए आंकड़ों के अनुसार देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में पिछले दो वर्षों में करीब दस लाख कम बच्चों ने नाम लिखवाया है. देश के अन्य बड़े राज्यों में भी हालत अच्छी नहीं है. महाराष्ट्र में भी प्राइमरी स्कूलों में बच्चों की संख्या घटी है. असम की हालत सबसे ज़्यादा खराब है. अजीब विडम्बना है कि जब से देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुआ है प्राइमरी स्कूलों में जाने वाले बच्चों की संख्या में गिरावट आ रही है. जहां तक केंद्र सरकार की बात है, उन्होंने  प्राइमरी शिक्षा के सचिव स्तर से एक चिट्ठी सभी राज्यों के शिक्षा सचिवों के नाम लिखवा दी है.

अब वह चिट्ठी केंद्र  सरकार की फाइलों में सुरक्षित है और आने वाले वक़्त में जब कभी कोई संसद सदस्य सवाल पूछेगा तो केंद्र सरकार की सक्षमता को रेखांकित करने में यह चिट्ठी बहुत काम आयेगी. लोकसभा में पूछे गए ऐसे ही एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार के मानव संसाधन विभाग की ओर से बताया गया कि पहली से दसवीं तक की शिक्षा पूरी करने के पहले 66 प्रतिशत से भी ज्यादा दलित बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं. 1950 में संविधान के लागू होने के साथ ही यह पक्का  कर दिया गया था कि सरकारें अगर दलितों के विकास के लिए कोई योजना बनाना चाहे तो उसमें किसी  तरह की कानूनी अड़चन न आये. संविधान लागू होने के 60 साल बाद भी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को शिक्षा के क्षेत्र में बाकी लोगों के बराबर करने के लिए कोई प्रभावी क़दम नहीं उठाया गया है.

ऐसा लगता है कि 1950 से अब तक कांग्रेस ने दलितों को वोट देने की मशीन से ज्यादा कुछ नहीं समझा. मार्च के पहले हफ्ते में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया गया कि स्कूलों में  पहली से दसवीं क्लास तक की पढाई करने जाने वाले अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के बच्चों की कुल संख्या में से बहुत बड़ी तादाद में  बच्चे पढाई बीच में ही छोड़ देते हैं. लोकसभा को बताया गया है कि दसवीं तक की शिक्षा पूरी करने के पहले अनुसूचित जातियों  के बच्चों का ड्राप रेट डरावना है. 2006-07 में करीब 69 प्रतिशत अनुसूचित जातियों के बच्चों ने पढाई छोड़ दी थी. जबकि 2008-09 में इस वर्ग के 66.56 प्रतिशत बच्चों ने स्कूल जाना बंद कर दिया था. अनुसूचित जनजातियों के सन्दर्भ में यह आंकड़े और भी अधिक चिंताजनक हैं. 2006-07 में अनुसूचित जनजातियों के 78 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया था जबकि 2007-08 में यह ड्राप रेट 2 प्रतिशत नीचे जाकर लगभग 76 प्रतिशत रह गया था. यह आंकड़े बहुत ही निराशा पैदा करते हैं. अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के बच्चों की  इतनी बड़ी संख्या का बीच में ही स्कूल छोड़ देना बहुत ही खराब बात है. ज़ाहिर है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और नौकरशाही के लापरवाह रुख के  कारण ही यह हालात पैदा हुए हैं और  इन पर फ़ौरन रोक लागने की ज़रुरत है.

सरकार ने दावा किया है कि सर्व शिक्षा अभियान नाम की जो योजना है वह समता मूलक समाज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी सरकार ने दावा किया है कि निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, सर्व शिक्षा आभियान, मध्याह्न भोजन योजना, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान का उद्देश्य स्कूलों में  अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के छात्रों सहित सभी वर्ग के छात्रों के नामांकन में वृद्धि करवाना है. सरकारी भाषा में कही गयी इस बात में लगभग घोषित कर दिया गया है कि दलित बच्चों का स्कूलों में नामांकन करवाना ही सरकार का उद्देश्य है. उनकी पढाई को पूरा करवाने के लिए सरकार कोई भी उपाय नहीं करना चाहती. ज़मीनी सच्चाई यह है कि इन योजनाओं के नाम पर जनता का धन तो बहुत बड़े पैमाने पर लग रहा है लेकिन बीच में निहित स्वार्थ वालों की ज़बरदस्त मौजूदगी के चलते यह योजनायें अपना मकसद हासिल करने से कोसों दूर हैं.

 

- शेषनारायण सिंह  
(यह लेख आज़ादी मीडिया फेलोशिप द्वारा समर्थित है)