सार्वजनिक नीति - लेख

उत्कृष्ट शिक्षा के माधयम से पहुंच में सुधार

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की अति महत्वपूर्ण परियोजना का नाम स्कूल चयन अभियान है और इसे वर्ष 2007 में आरंभ किया गया था। यह ऐसा अभियान है जिसमें वर्तमान भारत के स्कूली शिक्षा पध्दति में बहुत ही जरूरी सुधार किए जाएंगे और इसके लिए शिक्षा प्रमाणकों, नियामक सुधारों और प्रोत्साहक शिक्षा जिज्ञासुओं की त्रि-भुजा पहुंच का प्रयोग किया जाएगा।

40 प्रतिशत भारतवासी अशिक्षित हैं, और सरकारी स्कूल भारत के बच्चों की जरूरतों पर खरे नहीं उतरते। नागरिक समाज केन्द्र गुण सुधार, विशेषकर गरीबों के लिए शिक्षा की पहुंच पर प्रकाश डालता है। नीति निर्धारकों, शिक्षा विशेषज्ञों और आम कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर स्कूली चयन अभियान हमारा ध्यान दाखिले के अवरोधों को हटाने और शिक्षा प्राप्त करने वालों को प्रोत्साहित में केन्द्रित करता है और स्कूलों और कॉलेजों को लाभप्रद बनाते हुए विधि और विस्तार की गुंजाइश और शिक्षा प्रमाणकों के माधयम से प्रतिस्पर्धाओं की ओर आगे बढ़ता है।

अधिक जानकारी के लिये देखें: स्कूल चयन अभियान

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पिछले साल मार्च की शुरुआत से देश भर में स्कूलों के संचालन में बहुत सारी समस्याएं आई हैं। चूंकि भारत में स्कूलों को उद्यम नहीं माना जाता, उन्हें कोरोना महामारी से हुए वित्तीय नुकसान से निपटने के लिए सरकार से कोई राहत या किसी तरह की वित्तीय मदद नहीं मिली। लेकिन स्कूलों की फ़ीस भरने में अक्षम अभिभावकों ने राहत के लिए अदालतों में याचिकाएं दायर की। उच्च न्यायालयों ने अपने आदेश में स्कूलों को केवल ट्यूशन फ़ीस लेने और अपने कर्मचारियों को वेतन का भुगतान करने को कहा।

लेकिन शैक्षणिक वर्ष

वर्ष 2020 के शुरुआती महीनों में देश में तेजी से फैल रहे कोविड 19 संक्रमण की कड़ी को तोड़ने के लिए ‘टोटल लॉकडाउन’ जैसा कठिन और अभूतपूर्व फैसला लिया गया। इस दौरान सभी प्रकार के फ़ैक्टरियों, कारखानों, दुकानों, परिवहन, दफ्तर, स्कूल सहित अन्य सभी गतिविधियों को पूरी तरह बंद कर दिया गया। लगभग दो महीने तक जारी रहे टोटल लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से धीरे समाप्त किया गया और देश एक बार फिर अनलॉक हो गया। हालांकि कोविड 19 संक्रमण के प्रसार के कारण लागू किये गए लॉकडाउन के दस महीने से अधिक बीतने के बाद भी शारीरिक दूरी, मास्क और सेनेटाइज़र के प्रयोग जैसी

- लॉकडाउन 1 के दौरान से स्कूलों के खुलने पर लगी रोक के दुष्परिणाम दूरगामी होंगे
- मॉल्स, थिएटर्स, पार्क खोलने की मिल चुकी है अनुमति, शादी समारोहों पर भी नहीं है रोक
- सरकारी और बजट स्कू लों के छात्रों का शैक्षणिक भविष्य खतरे में, स्कूल ड्रॉपआउट्स की संख्या में वृद्धि का आशंका बलवती

कोरोना महामारी के विस्तार को रोकने के लिए मार्च 2019 से लागू किया गया देशव्यापी लॉकडाउन कुछ प्रतिबंधों और दिशा निर्देशों के साथ लगभग लगभग समाप्त हो गया है। देश के अनलॉक

तीन दशकों से अधिक के इंतजार के बाद आयी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की कार्ययोजना तैयार की गई है। इसमें कई उत्कृष्ट प्रस्तावों को शामिल किया गया है जो वर्तमान परिदृश्य के हिसाब से बेहद प्रासंगिक हैं। 3-6 वर्ष की आयु वर्ग के नौनिहालों के लिए अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन, तीसरी कक्षा तक पहुंचने से पहले छात्रों को आधारभूत शिक्षा और संख्या ज्ञान सुनिश्चित करना, आर्ट्स, कॉमर्स और साइंस वर्ग के बीच की स्पष्ट विभाजन रेखा को अप्रासंगिक बनाना और नियमित स्कूली शिक्षा के साथ साथ रोजगार परक शिक्षा

रिश्वत देकर अयोग्य लोग शिक्षक बन गए, जब तक राज्य सरकारें इस समस्या का हल नहीं करतीं, तब तक कोई नीति बच्चों का भविष्य नहीं संवार सकती

1947 में इंग्लैंड ने भारत छोड़ दिया, लेकिन वे अपने पीछे अंग्रेजी भाषा और भारतीयों के लिए सिरदर्द भी छोड़ गए। तब से हम अंग्रेजी के अपनी जिंदगी में स्थान को लेकर लड़ रहे हैं। विशेषकर, इस बात पर कि अपने बच्चों को किस भाषा में पढ़ाएं। 

इस बहस की ताजा वजह

पिछले दिनों बहु प्रतिक्षित और बहु चर्चित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। देश की शिक्षा को लेकर नीति क्या हो, आखिरी बार यह 1986 में तय किया गया था। हालांकि 1992 में इसमें छिटपुट संशोधन किया गया था। वर्ष 2014 की चुनावी रैलियों में तब के बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और वर्तमान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा नीति में बदलाव की ज़रूरतों को मुद्दा बनाया था। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा लागू किये गए शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधानों की प्रधानमंत्री ने चुनावी रैलियों के दौरान मुखर

पढ़े-लिखे बेरोजगारों की विशाल फौज को देखकर लोग अनायास ही कह देते हैं कि शिक्षा को 'रोजगार परक' बनाया जाना चाहिए। उनका तात्पर्य यह होता है कि जिन क्षेत्रों में रोजगार की अधिक संभावाएँ हैं, उनसे संबंधित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। देश के अधिकांश महाविद्यालयों में शिक्षा के नाम पर भाषा, साहित्य, इतिहास, राजनीति, समाजशास्त्र, विज्ञान, आदि विषय ही पढ़ाए जाते हैं। और इन विषयों की डिग्री लेने से किसी को कोई नौकरी मिलेगी, इसका कोई भरोसा नहीं। अत: ऐसे विषयों की पढ़ाई एवं उन पर होने वाले सरकारी खर्च के औचित्य पर प्रश्न उठना लाजिमी है। आखिर शिक्षा को

मुनि इंटरनेशनल स्कूल, वेस्ट दिल्ली के भीड़ भाड़ वाले उत्तम नगर एरिया में संचालित होने वाला एक बजट स्कूल है। बजट स्कूल यानी सरकारी स्कूलों में प्रतिछात्र प्रतिमाह खर्च होने वाली राशि के बराबर या कम शुल्क में शिक्षा प्रदान करने वाले प्राइवेट अनऐडेड स्कूल्स। आम दिनों में स्कूल और इसके आस पास छात्रों व अभिभावकों की काफी चहल पहल रहती है। लेकिन इन दिनों यहां सन्नाटा पसरा हुआ है। स्कूल के मुख्य द्वार पर ताला लटका हुआ है। इन पर जमी धूल और मकड़ी के जालों को साफ साफ देखा जा सकता है। इसके मालिक और भूतपूर्व सैनिक अशोक ठाकुर के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं।

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