आर्थिक सुधार अभी नहीं तो कभी नहीं

ऐसा भी मौका आता है जब तमाशा बंद करके असली काम शुरू करना पड़ता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुकूल रहे हरियाणा व महाराष्ट्र के चुनावों के साथ ऐसा लगा कि वह वक्त आ गया है। उन्हें अौर उनके मंत्रियों को अब कठोर तथ्यों का सामना करना पड़ेगा। जन-धन योजना के तहत 7.25 करोड़ बैंक खाते खोलना किसी भी दृष्टि से प्रभावी उपलब्धि है, लेकिन अब तक एक-चौथाई के खातों में ही रकम आई है। खाली खाता तो किसी के लिए भी काम का नहीं हो सकता। इसी तरह मंत्रियों और नौकरशाहों द्वारा समारोहपूर्वक सफाई करने से देश स्वच्छ नहीं होने वाला। रेलवे के कामकाज का परीक्षण करने के लिए एक और समिति नियुक्त करने से बुलेट ट्रेन तो छोड़िए, मौजूदा ट्रेनों की रफ्तार तक नहीं बढ़ेगी और न वे समय पर चलने लगेंगी। 
 
जी-20 समूह की शिखर बैठक में प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया कि आर्थिक सुधारों का विरोध होना अपरिहार्य है। ‘मेक इन इंडिया’ तब तक साकार नहीं होगा जब तक इस विरोध पर काबू नहीं पा लिया जाता। प्रधानमंत्री को विदेशों  में जो निवेश का आश्वासन मिलता है, वह भारत में व्यवसाय अनुकूल वातावरण बनने पर ही साकार होगा। यदि सरकार स्मार्ट शहरों सहित आधारभूत ढांचे पर अधिक खर्च करना चाहती है, तो अधिक भारतीयों को कर चुकाने के लिए राजी करना होगा। फिलहाल आबादी का सिर्फ 5 फीसदी तबका आयकर चुकाता है। 
 
इस पृष्ठभूमि में नए मंत्री कितने योग्य दिखाई देते हैं?  मंत्रिमंडल के पुनर्गठन से यह धारणा सही नहीं लगती कि मोदी को मंत्रियों की परवाह नहीं है और वे नौकरशाही के सहयोग से भारत को चलाने का इरादा रखते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से उन मंत्रालयों के लिए मंत्रियों का चयन उनकी प्रतिभा को देखते हुए किया है, जो मंत्रालय विकास के उनके वादे पर खरा उतरने के लिए महत्वपूर्ण हैं। 
 
कार्यकुशलता के साथ ईमानदारी की प्रतिष्ठा रखने वाले मनोहर पर्रीकर को रक्षा मंत्री चुनकर मोदी उम्मीद कर रहे होंगे कि वे उन रक्षा सौदों की राह खोलेंगे, जो अपनी ईमानदार छवि के प्रति जुनून के चलते उनके पूर्ववर्ती ने बंद कर दी थी। पर्रीकर यहां लगे फाइलों के ढेर के सबसे ऊपर गोला-बारूद और अावश्यक सैन्य आपूर्तियों के खतरनाक अभाव की फाइल है। अरुण जेटली अब वित्त मंत्रालय को परेशान कर रही दीर्घावधि समस्याओं से निपटने के लिए स्वतंत्र हो गए हैं।
 
चमचमाती डिग्रियों और बैंकिंग का अंतरराष्ट्रीय अनुभव रखने वाले जयंत सिन्हा उनके हाथ मजबूत करेंगे। इन दोनों को टैक्स इकट्‌ठा करने वालों से निपटना होगा, जो कर चुकाने वालों को तो परेशान करते हैं, जबकि जो नहीं चुकाते उनकी अनदेखी कर देते हैं। मोदी ने बार-बार कहा है कि वे विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वापस लाएंगे। जेटली और सिन्हा का इससे भी बड़ा योगदान तो तब होगा जब वे भारत में सक्रिय कालेधन को  बाहर लाकर दिखाएंगे।
 
रेलवे मोदी के आधारभूत ढांचे के प्रमुख लक्ष्यों में से एक है। यहां भी उन्होंने कार्यकुशलता के लिए मशहूर  सुरेश प्रभु को मंत्री चुना है। उनके साथ रेलवे में जवाबदेही और पारदर्शिता पर सलाह के लिए भारत के मेट्रो-मैन श्रीधरन को जोड़ना मास्टर-स्ट्रोक साबित हो सकता है। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि नौकरशाही ने रेलवे का दम कहां घोट रखा है। जब मैंने दिल्ली मेट्रो प्रोजेक्ट के इस स्टार का इंटरव्यू लिया था तो उन्होंने कहा था कि मेट्रो प्रशासन में भारतीय रेलवे की कोई भूमिका नहीं होगी।
 
महाराष्ट्र के मंत्री रहते नितिन गडकरी ने सड़कें बनाई थीं, इसलिए वे आधारभूत ढांचे के इस हिस्से में विकास को गति दे सकेंगे। चार्टर्ड अकाउंटेंट, इनवेस्टमेंट बैंकर, मैनेजमेंट कंसल्टेंट पीयूूष गोयल के पास निश्चित ही वह पृष्ठभूमि है कि वे महत्वपूर्ण ऊर्जा व कोयला क्षेत्रों में गड़बड़ियों का समाधान निकाल सकेंगे। मंत्रिमंडल के गठन में अपरिहार्य रूप से क्षेत्रीय संतुलन और आगामी चुनाव को ध्यान में रखकर थोड़ी राजनीतिक बाजीगरी दिखाई गई है, लेकिन मंत्रियों तथा राज्यमंत्रियों के चयन में न तो जाति और न नस्ल ने कोई भूमिका निभाई है। मोदी ने ऐसे मंत्री नियुक्त किए हैं, जो उनकी विकास योजनाओं के निर्णायक क्षेत्रों में नतीजे हासिल करने की विशिष्ट योग्यता रखते हैं।
 
अब उन्हें नतीजे दिखाना शुरू करना होगा, क्योंकि मोदी वादों के भरोसे ज्यादा दिन नहीं चल सकते। उनके पहले आए प्रधानमंत्रियों का अनुभव है कि यदि नई संसद की शुरुआत में ही सुधार नहीं लाए गए तो फिर वे कभी नहीं लाए जा सकते। नरसिंह राव ने अपने प्रमुख सुधार कार्यकाल की शुरुआत में ही लाए थे और अगले दो वर्षों के भीतर ही अर्जुन सिंह पार्टी के भीतर उनके खिलाफ संकट खड़ा करने लग गए थे। हो सकता है नरसिंह राव की तुलना में मोदी ज्यादा महफूज हों, लेकिन जिस प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को वे प्रोत्साहन दे रहे हैं, उसे भाजपा के भीतर से भी विरोध है।
 
ऐसे में मोदी के वादों पर नई मंत्रिपरिषद द्वारा नतीजे देने की कितनी संभावना है? पिछले समय से तुलना करें तो उससे तो बेहतर संभावनाएं हैं। राजीव गांधी के शुरुआती दिनों के बाद वे किसी भी अन्य प्रधानमंत्री की तुलना में ज्यादा मजबूती से कुर्सी पर विराजमान हैं। किसी को संदेह नहीं है कि बॉस वे ही हैं। नौकरशाहों के साथ मंत्री भी जानते हैं कि उनका इरादा ऐसे ही बने रहने का है, इसलिए उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि अंतर-मंत्रालयीन झगड़े और निर्णय लेने के प्रति उदासीनता, प्रशासनिक मशीनरी को ठप न कर दें। अब उस तरह का गठबंधन दलों का दबाव नहीं है, जिसके कारण व्यक्तिगत रूप से असंदिग्ध ईमानदार मनमोहन सिंह को भ्रष्टाचार और बेअसर प्रशासन को सहना पड़ा यानी प्रदर्शन न करने वालों की भी अनदेखी करनी पड़ी।
 
विकास के लिए मंत्रियों का उनका चयन बताता है कि सहयोगियों के चयन में पार्टी में वरिष्ठता सबसे महत्वपूर्ण विचार बिंदु नहीं है बल्कि मोदी और अमित शाह की जोड़ी के लिए चुनाव जीतना ज्यादा महत्वपूर्ण है। यही बात क्रियान्वयन में विलंब का कारण है। इस देरी की पूर्ति की जा सकती है, यदि मोदी अपनी प्रेरक और वक्तृत्व शक्ति का उपयोग प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के अवसर सुधारने या श्रम सुधार जैसे विवादास्पद कानूनों को मतदाताओं के गले उतार दें, अपनी पार्टी के उन विरोधियों को नजरअंदाज करके, जो इन्हें वोट गंवाने वाली नीतियां समझते हैं। किंतु एक जटिल समस्या है।
 
मोदी के पक्ष में बहुत कुछ हैं, लेकिन नतीजे देने की उनकी क्षमता सीमित हो जाएगी बशर्ते वे वह कर दिखाएं, जो किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया- प्रशासनिक मशीनरी का आधुनिकीकरण। मेरे हिसाब से दो खतरे भी हैं। सहज रूप से सरकार के एकछत्र बॉस होने से यह अपरिहार्य खतरा है कि मोदी सत्ता को जरूरत से ज्यादा केंद्रीकृत कर दें। इससे उनके मंत्री स्वतंत्रतापूर्वक काम नहीं कर पाएंगे और वह प्रतिभा नहीं दिखा पाएंगे, जो उन्होंने उनमें देखी है। दूसरा खतरा अक्खड़पन, अहंकार का है, जो उस तरह की शक्ति के साथ आता है, जिसका वे लुत्फ उठा रहे हैं। प्राय: एक उक्ति में सावधानी की चेतावनी दी जाती रही है, ‘सत्ता भ्रष्ट बनाती है और पूर्ण सत्ता पूरी तरह भ्रष्ट बना देती है।’
 
 
- मार्क टली
भारत में बीबीसी के ब्यूरो चीफ रहे हैं