'ईज टू डू बिजनेस' में और पिछड़ा भारत

सुशासन सुधारेगा हालात
 
विश्व बैंक की इस वर्ष की 'ईज टू डू बिजनेस' रिपोर्ट में भारत 142वें स्थान पर पहुंच गया। पिछड़ने के आधार वही हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन जैसे सरकारी महकमों से संबंधित कार्यों में अड़ंगे और विलम्ब। अन्य देशों की तुलना में व्यापार और कर संबंधी कानून भी कुछ सख्त और जटिल हैं। दूसरे देश इन कानूनों में तेजी से सुधार कर रहे हैं लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो रहा। दूसरी ओर देश की नई सरकार निवेश को बढ़ावा देने के लिए 'मेक इन इंडिया' जैसे अभियान चला रही है। भारत में सकारात्मक बिजनेस माहौल पर सवाल उठाती यह रिपोर्ट 'मेक इन इंडिया' की सफलता के प्रति भी आशंकाएं जगाती है। कैसे सुधरे व्यापार का माहौल? जाने क्या कहते हैं जानकारः
 
कानूनों की समीक्षा हो
वर्ष 2006 से प्रतिवर्ष तैयार की जा रही ये रिपोर्ट किसी देश में बिजनेस माहौल का आकलन करती है। चूंकि यह रिपोर्ट विश्वबैंक बनाता है इसलिए इसकी स्वीकार्यता भी काफी ज्यादा है। दुनिया के सभी निवेशक इस रिपोर्ट को देखते और इससे अपनी निवेश संबंधी राय बनाते हैं। साथ ही अन्य प्रकार की रिपोर्टों जैसे आर्थिक आजादी सूचकांक, प्रॉपर्टी राइट सूचकांक, मानव विकास सूचकांक में भी इसका कुछ न कुछ असर दिखता है। चूंकि इस रिपोर्ट में जो आंकड़े होते हैं वो परसेप्शन के आधार पर होते हैं इसलिए इनकी वैधता पर कुछ विवाद हो सकता है पर कुल मिलाकर यह रिपोर्ट किसी देश में व्यापार सहुलियत माहौल का मूल्यांकन ठीक करती आ रही है। रिपोर्ट में कई मापदंड हैं जिनके ऊपर किसी देश के व्यापार माहौल को परखा जाता है। भारत ने जिन दो पैमानों पर सबसे खराब प्रदर्शन किया है वो हैं अनुबंध का क्रियान्वयन और भवन निर्माण परमिट का निपटान। इन दोनों पैमानों पर भारत का स्थान 189 देशों में क्रमशः 186 तथा 184 है। अर्थात दुनिया में लगभग सबसे नीचे। अनुबंध क्रियान्वयन में असफलता के दो उदाहरण तो बहुत ही चर्चित रहे हैं। 2 जी स्पेक्ट्रम और कोल खदान के लाइसेंसों का आवंटन निरस्त होना। इसी तरह से कुछ अन्य पैमानों पर भी भारत काफी पीछे है। बिजनेस चालू करने की सरलता में भारत का स्थान 158 वां है। कर चुकाने के पैमाने पर 156वां है।
 
प्रश्न यह भी उठता है कि पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका जैसे देश भी देश भी इस सूचकांक पर भारत से आगे कैसे हैं? इसका बड़ा कारण यह हो सकता है कि कई बार स्थिर और लोकतांत्रिक सरकार लोगों पर नजर रखने, कानून बनाने और उसका पालन कराने के प्रति ज्यादा सचेत होती हैं बजाए उन सरकारों के जहां स्थिरता नहीं है, लोकतंत्र नहीं है। सरकार में अस्थिरता के चलते सरकारी मशीनरी में अपने आप ही ढिलाई आ जाती है, यद्यपि यह सरकार का इरादा नहीं होता। अस्थिर देशों की सरकारों को इस बात की सुध लेने की फुर्सत ही नहीं होती कि कौन क्या कर रहा है। तनीजतन लोगों को, कंपनियों को ज्यादा आजादी मिल जाती है।
 
ऑस्ट्रेलिया से लें सबक
दूसरी वजह, यह हो सकती है कि भारत में कानून इतने ज्यादा हो गए हैं कि आप कोई भी काम या व्यापार करो, कोई न कोई कानून तो अनजाने में सही, टूटना ही है। कानून बनाने का इरादा भले अच्छा रहा हो, पर इसका परिणाम वह नहीं निकलता, जो कि सोचा गया था। कानून की इन सब समस्याओं के मद्देनजर ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में तो साल में दो दिन होते हैं जबकि संसद कोई नया कानून नहीं बनाती वरन् पुराने कानूनों की समीक्षा करती है और ऐसे कानूनों को जिनके क्रियान्वयन की लागत उनसे होने वाले लाभ से ज्यादा होती है उनको समाप्त करती है। इन दो दिनों को वहां 'रिपील डे' कहा जाता है। उनका लक्ष्य इतने कानूनों को खत्म करने का होता है कि सालभर में 1 अरब डॉलर की बचत उनके क्रियान्वयन की लागत में कमी से हो सके। इंग्लैंड आदि देशों में भी ऐसा किया जाता है। केंद्र सरकार ने भी इस काम को हाथ में तो लिया है पर अभी सरकार को इस दिशा में काफी दूर जाना है।
 
नई सरकार ने इस दिशा में और भी कुछ कदम उठाए हैं। जैसे डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन को यह जिम्मा दिया गया है कि वह ऐसे उपाय सुझाए जिससे बिजनेस आरंभ करने, विद्युत कनेक्शन आदि लेने में एक दिन से अधिक का समय नहीं लगे। इसी तरह आगामी संसद सत्र में कुछ श्रम कानूनों जैसे इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट, अनुबंध श्रमिक कानून, फैक्ट्री एक्ट के सुधार की बात भी की जा रही है। पर सरकार ने अभी तक टैक्स सरलता, सीमा पार व्यापार सहूलियत आदि की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। नई सरकार का लक्ष्य होना चाहिए कि भारत शीर्ष 50 देशों में हो। पूर्ण बहुमत वाली नई सरकार यह कर भी सकती है। खुद विश्व बैंक के अध्यक्ष विगत माह गुजरात में मोदी के काम की इस दिशा में तारीफ भी कर चुके हैं।
 
- अमित चंद्र के इनपुट के साथ डॉ. पार्थ जे. शाह (प्रेसिडेंट सेंटर फॉर सिविल सोसायटी)
साभारः राजस्थान पत्रिका