ई कॉमर्स से हाथ मिलाने में ही समझदारी

अर्थव्यवस्था में लेनदेन मुख्य रूप से उत्पादक और उपभोक्ता के बीच होता है। जैसे किसान सब्जी उगाता है और एक परिवार उसकी खपत करता है। यदि परिवार का कोई सदस्य गांव जाकर लौकी खरीदे तो कठिनाई होती है, इसलिए समाज ने मंडी और दुकानदार बनाए। अब यह काम इंटरनेट के जरिए होने लगा है। कई शहरों में लोगों ने सब्जी पहुंचाने की वेबसाइट बनाई है। आप सुबह अपना ऑर्डर बुक करा सकते हैं। साइट का मालिक मंडी से सब्जी लाकर सीधे आपके घर पहुंचा देगा। सब्जी पसंद न आए तो आप लौटा सकते हैं। दुकानदार और ठेले वालों की जरूरत नहीं रह गई है। इससे छोटे ही नहीं, बड़े विक्रेता भी संकट महसूस कर रहे हैं।
 
फ्यूचर ग्रुप के किशोर बियानी ने भी ई-कॉमर्स से समस्या पैदा होने की बात कही है। पर विरोधों के बावजूद ई-कॉमर्स फलता-फूलता रहेगा। जिस प्रकार घोड़ागाड़ी का स्थान ऑटोरिक्शा ने और एसटीडी फोन बूथ की जगह मोबाइल शॉप ने ले ली, उसी प्रकार दुकानदारी के एक हिस्से पर ई-कॉमर्स का दबदबा हो जाएगा। यह बदलाव पूरी दुनिया में हुआ है। एक रपट के अनुसार इंग्लैंड में हर सात में से एक दुकान खाली पड़ी है, क्योंकि ग्राहक ई-कॉमर्स की ओर मुड़ गए हैं।
 
सबकी चॉइस पूरी
ई-कॉमर्स से कंस्यूमर की चॉइस में विस्तार हो रहा है। मुझे मोबाइल खरीदना था। तीन चार दुकानों में गया तो कुछ ही मॉडल उपलब्ध थे। ऑनलाइन सर्च किया तो 20-25 मॉडल दिखे और अपना मनपसंद मॉडल मैंने एक ई-कॉमर्स वेबसाइट से मंगवा लिया। पसंद की चीज भी मिली और सुविधा भी। एक प्रकाशक ने बताया कि उनकी पुरानी पुस्तकें नहीं बिकती थीं। बुकसेलर केवल नई पुस्तकें रखना चाहते थे। उन्होंने अपनी सारी किताबों को वेबसाइट पर डाला तो पुरानी पुस्तकें भी बिकने लगीं। जिन चुनिंदा ग्राहकों को इन बुक्स की जरूरत थी, उन तक इन्हें पहुंचाना मुमकिन हो गया।
 
दुकानदारों को इस परिस्थिति से निपटने पर विचार करना होगा। वे ऐसी सेवाएं मुहैया कराएं, जो ई-कॉमर्स से उपलब्ध नहीं हो सकती हैं। जैसे ट्यूटोरियल, डांस ट्रेनिंग, बाल काटना, मालिश करना, भाषाएं सिखाना या ब्यूटीशन का काम। आने वाले समय में इन सेवाओं की मांग बढ़ेगी, जबकि किताब, सब्जी, टेलिविजन और कपड़ों की बिक्री ई-कॉमर्स के माध्यम से ज्यादा होगी।
 
ई-कॉमर्स से हमारे लिए पूरी दुनिया का बाजार खुलने की संभावना है। तमाम ऐसी सेवाएं हैं जो इंटरनेट के माध्यम से दूसरे देश पहुंचाई जा सकती है। मेरे जानकार एक मित्र ने अमेरिकी छात्रों को ऑनलाइन ट्यूशन देने का काम शुरू किया है। तमाम भारतीय इंजीनियर विदेशियों की वेबसाइट डिजाइन कर रहे हैं। ग्लोबलाइजेशन के साथ-साथ विभिन्न भाषाओं के बीच अनुवाद की मांग बढ़ेगी। भारतीय युवा यदि जर्मन से जापानी में अनुवाद कर सकें तो बहुत बड़ा बाजार उनकी सेवा के लिए तैयार रहेगा।
 
बड़ी इंटरनेट कंपनियों के लिए स्थानीय सेवाएं उपलब्ध कराना कठिन होता है। जैसे आपको गुड़गांव में गणित की ट्यूशन चाहिए। अब कैलिफोर्निया स्थित अमेजन के लिए पचासों टीचरों की काबिलियत जांचना, उनकी लोकेशन के अनुसार ग्राहक से मैच कराना, उनके रेट एवं उपलब्धता को ग्राहक की सुविधा के अनुसार एडजस्ट करना कठिन होगा। इसलिए दुकानदारों को चाहिए कि ई-कॉमर्स के माध्यम से स्थानीय बाजार को माल तथा सेवाएं उपलब्ध कराएं।
 
फॉरेस्टर कंसल्टिंग द्वारा इंग्लैंड में किए गए एक अध्ययन में पता चला कि 38 प्रतिशत लोग माल की खोज इंटरनेट पर करते हैं, लेकिन खरीदते हैं दुकान से। कारण कि माल में शिकायत आने पर आप दुकानदार से शिकायत कर सकते हैं, सामान बदल सकते हैं। वेबसाइट से खरीदे सामान में ऐसा करना कठिन होता है। किसी व्यक्ति ने ई-कॉमर्स के माध्यम से कोई सॉफ्टवेयर खरीदा। सीडी आई तो वह बताए गए सॉफ्टवेयर की नहीं निकली। शिकायत की तो कहा गया कि सीडी वापस कर दो। वापस किया तो जवाब आया कि वापस की गई सीडी विक्रेता द्वारा भेजी गई सीडी नहीं है। इस प्रकार की समस्या दुकान से की गई खरीदारी में कम आती है। इसलिए दुकानदारों को चाहिए कि ग्राहकों को अच्छी सेवा दें, जो ई-कॉमर्स से उपलब्ध नहीं हो सकती है।
 
बड़ी ई-कॉमर्स साइटों से घबराने की जरूरत नहीं है। हर व्यापार का एक विशेष साइज होता है। जैसे 10,000 लोगों को बैठाने वाले रेस्तरां नहीं बनाए जाते। इसी प्रकार ई-कॉमर्स की वेबसाइटों का आकार कुछ समय में निर्धारित हो जाएगा। एक ई-कॉमर्स कंपनी ने बताया कि माल की बुकिंग के तीन दिन के अंदर डिस्पैच करना होता है अन्यथा ऑर्डर कैंसिल हो जाता है और बदनामी भी होती है। इसलिए भरोसेमंद सेवा देना छोटी ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए लगातार चुनौती बना रहता है।
 
सरकार की भूमिका
ई-कॉमर्स में भारत की संभावनाओं को साकार करने में सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। छोटी साइटों से लोग माल खरीदने में कतराते हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं होता कि सही क्वालिटी का माल सही समय पर आएगा। इसलिए सरकार को ई-कॉमर्स के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर देना चाहिए। बाकायदा ई-कॉमर्स पुलिस का गठन करना चाहिए जो शिकायतों का शीघ्र निपटारा कर सके। विकसित देशों के संगठन ओईसीडी के एक अध्ययन में कहा गया है कि छोटे उद्योगों के लिए खुले और प्रतिस्पर्धात्मक ई-एक्सचेंज बनाना बेहद जरूरी है। सरकार को इस दिशा में कदम उठाना चाहिए। जिस प्रकार बड़े उद्योगों पर अधिक एक्साइज ड्यूटी लगाई गई है, उसी प्रकार बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों पर टैक्स लगाना चाहिए।
 
 
- डॉ. भरत झुनझुनवाला
साभारः नवभारत टाइम्स