मुंबई मुनिसिपल स्कूलों के आंकड़े निराशाजनक

इक्कीसवी सदी में शिक्षित मानव संसाधन हमारे देश की सब से बड़ी ज़रूरतों में से एक है. जैसे जैसे हमारी अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, वैसे ही हमारी ये मांग बढ़ती जा रही है. करोड़ो युवा भारतीयों को हम किस गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करेंगे? क्या हम सिर्फ साक्षरता पर केन्द्रित रह कर, शिक्षा को नज़रंदाज़ करेंगे? क्या सरकार अकेले इस मांग को पूरा कर पायेगी? क्या परोपकारी संगठन और निजी सेक्टर इस मुहीम में बड़ा रोल अदा कर पायेंगे? ये सभी कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनका हमें मिलजुल कर उत्तर देना होगा.

गत वर्षों में केंद्र व राज्य सरकारों ने हजारों करोड़ रुपये प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में लगाये पर उनके परिणाम सिर्फ मिले जुले ही मिले. प्राथमिक क्षेत्र में, सरकार ने साक्षरता पर अपना ध्यान केन्द्रित रखा और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आइआइटी और आईआईएम जैसे संस्थान स्थापित किये. शिक्षा का अधिकार कानून, सर्व शिक्षा अभियान और मिड-डे मील परियोजना जैसे उपायों से सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में ज़रूरी फेरबदल लाने की कोशिश करी. पर क्या इन प्रयासों से असली सफलता मिल पायी है? और क्या इन स्कीमो से हमें वो शिक्षित युवा मिल पाएंगे जिन की ज़रुरत हमारी बढती अर्थव्यवस्था और जॉब मार्केट को होगी?

प्रजा नामक एक गैरसरकारी संगठन पिछले तीन सालों में मुनिसिपल कारपोरेशन ऑफ़ ग्रेटर मुंबई (MCGM) द्वारा प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में चलाये गए प्रयासों का अध्ययन कर रहा है और इनसे सम्बन्धी डाटा एकत्रित कर रहा है. MCGM के पास 1762 करोड़ रुपये का बजट है और वो 1100 स्कूल चलता है जिस में 4 लाख बच्चे पढते हैं. पाए गए आंकड़ों से MCGM के शिक्षा विभाग की खराब छवि निकल कर आती है. एक साधारण गणना के अनुसार MCGM इस साल प्रत्येक बच्चे पर 40,000 रुपये खर्च करेगा जो कि मुंबई के ज़्यादातर प्राइवेट स्कूलों की फीस से अधिक है. फिर भी यदि 100 बच्चे पहली कक्षा में प्रवेश लेते हैं तो केवल उन में से 13 ही दसवी तक पहुँच पाते हैं. जहां मुंबई में SSC  का औसत पास प्रतिशत 89% है वहीँ MCGM स्कूलों में ये सिर्फ 62% है.

MCGM के निर्वाचित प्रतिनिधियों की शिक्षा कमेटी में सहभागिता और भी निराशाजनक है. इस कमेटी में MCGM के 22 निर्वाचित सदस्य हैं जिन में से 11 ने कभी भी कोई प्रश्न नहीं किया. पिछले तीन सालों में मुनिसिपल कारपोरेशन ने एक बार भी अपने शिक्षा विभाग के कार्य कलापों का लेखा जोखा नहीं लिया और फोकस एरिया का निर्धारण नहीं किया. प्रजा ने इसी मामले को लेकर एक श्वेत पत्र जारी किया जिसका उद्देश्य शिक्षा विभाग की कमियों को उजागर करना है और सरकार द्वारा किये जा रहे विभिन्न प्रयासों से सामान्य जनता को अवगत कराना है.

सन 2007 से लिए गए आंकड़ों के अनुसार ये पता चलता है कि हर कक्षा/ग्रेड में छात्रों का नामांकन घटा है. और जैसे जैसे ग्रेड बढ़ता है, वैसे वैसे छात्रों की संख्या इन मुनिसिपल स्कूलों में घट रही है. सर्वे के अनुसार हर साल 13% से अधिक बच्चे दसवी कक्षा तक नहीं पहुँच पायेंगे. डाटा के अनुसार मुंबई के मुनिसिपल स्कूलों से सन 2007-08 में 7.26% , 2008-09 में 6.32% और 2009-10 में 6.63% छात्रों ने ड्रॉप आउट किया. ड्रॉप आउट रेट लगातार 6% के आस पास बना हुआ है.

प्रजा ने शिक्षा पर अपना श्वेत पत्र जारी करने के बाद एक पैनल चर्चा भी आयोजित करी जिन में कुछ प्रमुख शिक्षाविदों को आमंत्रित किया गया. इस पैनल चर्चा से जो सुझाव निकल कर आये उन में प्रमुख था 1) पब्लिक-प्राइवेट-एन जी ओ साझेदारी 2) प्री-स्कूल के लेवल से शिक्षा के स्तर में सुधार लाया जाए 3) क्लास रूम को और रोचक बनाया जाए जिस से शिक्षा का माहौल और सुद्रण हो. ज्यादा से ज्यादा कोशिश हो कि मुंबई और पूरे भारत में शिक्षा का स्तर सुधारे ना कि सिर्फ साक्षरता का.

प्रजा आगे भी इस मामले की पड़ताल करेगी और मुंबई मुनिसिपल कारपोरेशन से अपील करेगी कि वो स्कूलों के प्रदर्शन आंकड़े और फोकस एरियो से निकलने वाले परिणाम बजट सभी के सामने लाये. संस्था ने ये भी तय किया है कि वो अपनी पैनल चर्चा के नतीजे और सुझाव कारपोरेशन की शिक्षा कमेटी के सदस्यों और सभी राजनैतिक पार्टियों के प्रमुखों को भेजेगी.

- स्निग्धा द्विवेदी