संकट काल में ही पड़ते हैं कामयाबी के बीज

बड़ी आपदाएं निरंतर आती रहती हैं। एशिया के आर्थिक संकट ने एशिया की चमत्कारिक अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर दिया। 2007-09 की महामंदी ने वॉल स्ट्रीट के पांच शीर्ष निवेश बैंकों, सबसे बड़े बैंक (सिटी बैंक), सबसे बड़ी इंश्योरेंस कंपनी (एआईजी), सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनी (जनरल मोटर्स) और सबसे बड़ी बंधक एवं बीमा कंपनी (फैनी मे और फ्रेडी मैक) को दीवालियेपन / राहत की कगार पर पहुंचा दिया। कैरिबियन सागर में हुई बीपी दुर्घटना दुनिया की सबसे बड़ी पर्यावरण त्रासदी मानी जाती है। कुछ लोगों को डर है कि ग्लोबल वार्मिंग अब तक का सबसे बड़ा मानवनिर्मित संकट होगा।

कई एनजीओ और राजनीतिक नेता सभी प्रकार के खतरों से बचाव के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी (गहरे समुद्र में खोजी गतिविधि, जलवायु के साथ की जाने वाली इंजीनियरिंग) का इस्तेमाल बंद करने की वकालत करते हैं। जबकि कुछ लोग आर्थिक और वित्तीय मामलों में नई खोजों से बचना हैं या फिर उन्हें पूरी तरह समाप्त कर देना चाहते है और उसकी जगह पूरी तरह राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था की वकालत करते हैं। हालांकि ये सुधार उस संकट से भी ज्यादा खतरनाक हैं, जिनका वे निदान करना चाहते हैं। सही तरीका तो ये है कि हादसों से सीख लें और नई खोजों के साथ सुरक्षा के बेहतर उपाय भी आजमाएं। गलत तरीका यह है कि नई खोज करना ही बंद कर दें। अमेरिका में कई लोग चाहते हैं कि समुद्र में तेल स्रोतों की खोज बंद कर देनी चाहिए। उनके मुताबिक बीपी संकट ने ये साबित कर दिया है कि ऐसी परियोजनाओं में फायदे से कहीं ज्यादा बड़ी कीमत चुकानी पड़ रहती है। ये बेकार का तर्क है। अगर इस तर्क में दम है, तो दुनिया में हर जगह समुद्र में तेल उत्पादन को प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि पर्यावरणीय हादसा तो कहीं भी हो सकता है। इस तरह के प्रतिबंध से तेल और गैस की कीमतों में चौगुना बढ़ोतरी हो जाएगी और विश्व महामंदी के दौर में पहुंच जाएगा। यह मानव सभ्यता के लिए बीपी हादसे से भी कई-कई गुना महंगी साबित होगी।

महामंदी के बाद कुछ लोग भारत और चीन में राज्य नियंत्रित बैंकिंग व्यवस्था को सुरक्षित बताकर उसकी तारीफ करते हैं। अभी तक यह साबित नहीं हो पाया है कि राज्य पर पूरी तरह निर्भर वित्तीय तंत्र हर तरह के संकट से उबरने में सक्षम होगा। कुछ देशों में जीडीपी की तुलना में 200 फीसदी के बैंक क्रेडिट का अनुपात बहुत ज्यादा हो सकता है लेकिन भारत में महज 50 फीसदी बैंक क्रेडिट का अनुपात काफी कम है और इसी वजह से जरूरतमंद नागरिकों का अत्यावश्यक लोन नहीं मिल पाता। अत्यधिक नियंत्रण की वजह से भारत एशिया के वित्तीय संकट से बच गया लेकिन बुरी तरह प्रभावित होने के बावजूद भारत के पड़ोसी एशियाई मुल्कों में प्रति व्यक्ति आय भारत की तुलना में 5 से 20 गुना ज्यादा है। 350 डॉलर की प्रति व्यक्ति आय वाले भारतीय अगर 3,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाले थाईलैंड में आए संकट की दुहाई देते हैं तो इसे अंगूर खट्टे हैं, वाली मिसाल ही माना जाएगा।

वास्तव में, पिछले एक दशक में भारत की आर्थिक कामयाबी मुख्यतः वित्तीय उदारीकरण से ही सम्भव हो पाई। आर्थिक संकट से भारत ने ये सबक लिया कि आर्थिक उदारीकरण के बहिष्कार की बजाय उसकी संभावनाओं को और अच्छी तरह से समझने की जरूरत है। वैश्विक व्यवस्था भी महामंदी से काफी कुछ सीख रही है। फिलहाल, प्रस्तावित बदलाव अपर्याप्त नजर आते हैं। लेकिन निश्चित तौर पर जोखिम को लेकर जागरूकता काफी बढ़ी है।

दुर्घटनाएं फिर भी होंगी। कोई भी नयी तरकीब या नयी खोज जोखिम से मुक्त नहीं है। लेकिन जिस तरह से जहाजों के डूबने की वजह से समुद्री यात्राएं बंद नहीं होती, उसी तरह आर्थिक और प्रौद्योगिकी दुर्घटनाओं या संकट के कारण हमें आर्थिक और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रयोग बंद नहीं कर देनी चाहिए। ड्यूक विश्वविद्यालय के हेनरी पेत्रोस्की ने एक पुस्तक लिखी है- सक्सेस थ्रू फेल्यर: द पाराडॉक्स ऑफ डिजाइन। इसका मुख्य सबक ही है कि कामयाबी से ज्यादा हम अपनी असफलताओं से सीखते हैं। असफलता हमें उन मौलिक बदलावों को करने के लिए मजबूर करती है, जो जरूरी तो हैं, लेकिन जिन्हें हम निरंतर कामयाबी के दौर में उपेक्षित कर देते हैं।

उदाहरण के तौर पर 1940 में अमेरिका में टकोमा पुल के ढहने की दुर्घटना को ही लें। दशकों से इंजीनियर बड़े-बड़े सस्पेंशन (बिना खंभों वाले) ब्रिज बना रहे थे और वो अति-विश्वास से लबरेज थे। टकोमा हादसे ने ये सबक दे दिया कि यदि पुल का घेरा और उसकी मजबूती विशेष तौर पर डिजाइन नहीं किए जाएं, तो हवा की तेज गति इस पुल के लिए एक खतरा बन सकती है। इस घटना के बाद भी कई सस्पेंशन ब्रिज बने, जिसमें कुछ टकोमा से भी ज्यादा लंबे थे, लेकिन वो पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बनाए गए। तेज हवा को झेलने के लिए कई बार इनमें दूसरे डेक भी बनाए गए। टकोमा की नाकामयाबी ने उससे कहीं ज्यादा लंबे ब्रिज की कामयाबी का रास्ता दिखाया, न कि छोटे ब्रिज की तरफ लौटने का।

1930 के दशक में वायुयान में हाईड्रोजन का इस्तेमाल होता था। दुनिया के सबसे बड़े वायुयान हिंडरबर्ग में आग लगने के बाद वायुयानों का उत्पादन ठप पड़ गया। हालांकि जल्द ही वायुयान में ज्वलनशील हाइड्रोजन की जगह पर ज्यादा सुरक्षित और निष्क्रिय हीलियम गैस का इस्तेमाल किया जाने लगा। टाइटेनिक की जलसमाधि, चर्नोबिल परमाणु रिएक्टर की दुर्घटना और 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के धराशायी होने के हादसों ने इंजीनियरों को हादसों को टालने के लिए ऐसे नए डिजाइन बनाने पर मजबूर किया, जिन्हें अब तक अधिक महत्व नहीं दिया जा रहा था।

1989 में शराब के नशे में डूबे एक कैप्टन ने एक्जॉन वाल्देज टैंकर को समुद्री चट्टान से भिड़वा दिया था, जिससे काफी तेल समुद्र में फैल गया था। इसके बाद से दुनिया भर में एक खाने वाले टैंकर की बजाय दो खाने वाले टैंकर का चलन शुरू हो गया, ताकि किसी दुर्घटना की स्थिति में कम से कम रिसाव हो। एक्जॉन वाल्देज हादसे के बाद एक्जॉन ने सुरक्षा के बेहतरीन रिकार्ड स्थापित किया। बीपी हादसे ने काफी विकसित संयंत्रों की जरूरत को रेखांकित किया ताकि समुद्र में ऐसे बड़े हादसों को टाला जा सके। अभी तक इस क्षेत्र की चार शीर्ष कंपनियां कैरिबियन सागर में सुरक्षा और बचाव संसाधनों को साझा करने का फैसला कर चुकी हैं। इस सबक को ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए जियो-इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी आजमाया जाना चाहिए। प्रायोगिक प्रोजेक्ट के तहत कार्बन अवशोषण क्षमता को बढ़ाने के लिए लौह अयस्क समुद्र में प्रवाहित किया जाने लगा है। सामान्य रूप से समुद्री जल का आसमान में छिड़काव किया जाए, तो बादल बनाए जा सकेंगे जो सूर्य की किरणों को परवर्तित कर देंगे और इस तरह से ग्लोबल वार्मिंग को कम किया जा सकेगा। कुछ ऐसा ही प्रभाव अंतरिक्ष में एरोसॉल्स और सल्फेट फैला कर पैदा किया जा सकता है। कई पर्यावरणवादी संगठन खतरनाक प्रभाव का हवाला देकर इस तरह की जियो-इंजीनियरिंग का विरोध करते हैं। मिसाल के तौर पर समुद्र में लौह अयस्क को प्रवाहित करने से समुद्र में एम्लीयता बढ़ सकती है और मूंगा-प्रवाल (कोरल) बदरंग हो सकते हैं। जबकि लौह अयस्क पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले सामान्य खनिजों में शुमार है और समुद्र की तलहटी में भी प्रचुर मात्रा में मौजूद होगा।

हमें जानकारी इकटृठा करने के लिए शुरू में पायलट परियोजना शुरू करना चाहिए, ताकि हम उसके फायदे और खतरों को समझ सकें, साथ ही खतरों को कम से कम करते हुए परियोजना का स्तर भी बढ़ाते जाना चाहिए। ग्लोबल वार्मिंग से निजात पाने में कार्बन कटौती की तुलना में जियो-इंजीनियरिंग कहीं सस्ता उपाय है। कई पर्यावरणवादी ये मानते हैं कि मानव को प्रकृति के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए वरना उसे इसका दंड भुगतना पड़ेगा। वास्तव में, शिकारी से विकसित मानव के रूप में सभ्यता का विकास ही इसलिए हो पाया क्योंकि मनुष्य के डीएनए में ही खोज और अन्वेषण के गुण मौजूद हैं।

कवि टीएस इलियट ने लिखा है कि हमें अन्वेषण से पीछे नहीं हटना चाहिए। हमारी सारी खोजों का अंत उसी बिंदु पर होगा, जहां से हमने शुरुआत की थी। हमारी जिज्ञासा हमारे उदगम को जानने के बाद ही शांत होगी। अन्वेषण से भयभीत पर्यावरणवादी उस प्रकृति के बारे में बेहद कम जानते हैं, जिसकी सुरक्षा को लेकर वो चिंतिंत हैं। और अज्ञानता में ही आनंद महसूस करते हैं। इस सबसे बेपरवाह, हम सभी मानवों को अनिवार्यतः प्रकृति की हर संभावनाओं को तलाशना होगा। तभी हम अपने उद्यम को पहली बार भली-भांति समझ पाएंगे।

- स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर