विकास बन रहा है सबसे बड़ा मुद्दा

बिहार में मुख्यमंत्री नितीश कुमार को मिली हालिया चुनावी जीत ने मतदाताओं के व्यवहार में आए बदलाव की पड़ताल करने का एक अवसर दिया है। नीतीश कुमार ने बिहार को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाकर गरीबों का मसीहा बनने का दंभ भरने वाले लालू यादव को हालिया चुनाव में करारी शिकस्त दी है।

इस पड़ताल के लिए 2004 से शुरुआत करना बेहतर होगा, जब भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन को चौंकाने वाली हार का सामना करना पड़ा था। मीडिया के मुताबिक उन्हें यह हार ‘‘सत्ता विरोधी लहर’’ से मिली थी, जिसकी तह में इंडिया शाइनिंग की नीति थी, जिसमें ग्रामीण गरीबों को नज़रंदाज किया गया था। मीडिया के इस विश्लेषण में हालांकि इस तथ्य की अनदेखी की गई थी कि गांव में गरीबी वास्तव में कम हुई थी और गांवों और शहरों में मतदान के रुझान में कोई भेद नहीं था।

जगदीश भगवती और मैंने तब कहा था कि सत्ता विरोधी लहर का कारण शायद जनता की अपेक्षाओं में हुई अचानक वृद्धि थी, जो सुधार की वजह से उपजी संभावनाओं के कारण हुई थी। जब तक विकास अत्यधिक धीमा रहा और गरीबी में हो रही कमी साफ तौर पर दिख नहीं रही थी, तब तक मतदाता बार-बार पुराने विकल्प की ओर लौटते रहे और बार-बार कांग्रेस को वापस सत्ता में लाते रहे। उदारवादी सुधार ने हालांकि इस चक्र को तोड़ा और दिखाया कि तेज विकास और गरीबी की समाप्ति संभव है। उसके बाद से तेज विकास करने में असफल रहे राजनीतिज्ञों को बाहर का रास्ता दिखाया जाता रहा है।

बाद में 2009 के संसदीय चुनाव पर टिप्पणी करते हुए मैंने इस सोच को और स्पष्ट करते हुए कहा था कि "भारत में सत्ता विरोधी लहर की खासियत यह है कि इसका प्रभाव राज्य के स्तर पर होता है। मतदाता बेहतर काम करने वाले मुख्यमंत्रियों की पार्टी को तो जिताते हैं, लेकिन उसी जगह न सिर्फ राज्य में खराब प्रदर्शन कर रही पार्टियों को हराते हैं, बल्कि संसद में खराब प्रदर्शन कर रही पार्टियों को भी हराती है।" उस समय संसदीय चुनाव में केंद्र में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी को बिहार, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के कुल 72 सीटों में से सिर्फ 9 सीटें मिली थीं। तब बिहार, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में बेहतर काम करने वाली गैर-कांग्रेसी सरकारें थीं।

अर्थशास्त्री पूनम गुप्ता और मैंने हाल के एक शोधपत्र में इस भगवती-पनगरिया अवधारणा की व्यवस्थित पड़ताल की। हमने इस शोध में 2009 के संसदीय चुनाव पर उपलब्ध विशाल आंकड़ों से चुनाव में खड़े हुए उम्मीदवारों की विशिष्टता, राज्य और केंद्र में उनकी सत्ताधारी या सत्ताविरोधी स्थिति और राज्य में विकास की स्थिति पर तथ्य इकट्ठा किए। विशिष्ट स्थिति को देखते हुए हमने इस शोध में पूर्वोत्तर के सात राज्यों, सिक्किम और जम्मू एवं कश्मीर को शामिल नहीं किया। हमने उन 19 राज्यों (जिसमें दिल्ली की गिनती एक राज्य के रूप में की गई) पर अध्ययन को केंद्रित किया, जहां राज्य की सत्ताधारी पार्टी या पार्टियों की स्पष्टता के साथ पहचान की जा सकती थी। इसके साथ ही 2004-05 से 2008-09 के बीच विकास दर को देखते हुए इन राज्यो को उच्च विकास, मध्यम विकास और निम्न विकास वाले राज्यों के तीन समूहों में विभाजित किया। उच्च विकास वाले राज्यों में सात, मध्यम विकास वाले राज्यों में छह और निम्न विकास वाले राज्यों में छह राज्यों को शामिल किया।

आश्चर्यजनक ढंग से हमने पाया कि उच्च विकास वाले राज्यों में सत्ताधारी पार्टियों के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले 85 फीसदी उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई। मध्यम विकास वाले राज्यों में यह आंकड़ा 50 फीसदी था और निम्न विकास वाले राज्यों में यह आंकड़ा 30 फीसदी था। हमने इन आंकड़ों का कई तरह से विश्लेषण किया और पाया कि उच्च विकास वाले राज्यों में सत्ताधारी पार्टी को राजनीतिक पुरस्कार मिला, जबकि निम्न विकास वाले राज्यों में राजनीतिक दंड मिला।

इसी श्रंखला में अभी जारी कुछ और अध्ययनों से पता चलता है कि मतदाता कुछ संकोच के साथ विकास कार्य को ध्यान में रखते हुए मतदान करने लगे हैं। विकास के पहले के चरणों में जब विकास के जारी रहने का भरोसा नहीं बन पाया था, तब मतदान में कई दूसरी बातों का महत्व बना हुआ था। जैसे जैसे विकास की गति बढ़ती गई मतदाताओं को धीरे-धीरे विकास के तेजी से जारी रहने पर भरोसा बनता गया और इसी के साथ-साथ उन्होंने विकास करने वालों को पुरस्कृत करना शुरू किया।

इस तरह 1996 में जब विकास की तस्वीर बहुत स्पष्ट नहीं थी, राज्य की सत्ताधारी पार्टियों के उम्मीदवारों की चुनावी जीत का विकास से सीधा संबंध नहीं बन पाया था। तब उच्च विकास दर वाले राज्यों में सत्ताधारी पार्टियों के उम्मीदवारों को सिर्फ 27 फीसदी चुनावी जीत हासिल हुई थी। मध्यम विकास वाले राज्यों में सत्ताधारी पार्टियों के उम्मीदवारों को 48 फीसदी और निम्न विकास दर वाले राज्यों में सत्तापक्ष के उम्मीदवारों को 47 फीसदी चुनावी जीत हासिल हुई थी। साल 2004 में सत्ताधारी पार्टियों के उम्मीदवारों को मिलने वाली चुनावी जीत का संबंध विकास के साथ बना, लेकिन साल 2009 की तरह यह बहुत स्पष्ट फिर भी नहीं था। तब उच्च विकास दर वाले राज्यों में सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवारों को 38 फीसदी, मध्यम विकास दर वाले राज्यों में 36 फीसदी और निम्न विकास दर वाले राज्यों में 30 फीसदी चुनावी जीत हासिल हुई थी। यदि ये परिणाम मतदाताओं के व्यवहारों में आ रहे बदलावों को सही तरह से बता रहे हैं, तो नीतीश कुमार जैसे विकास की राजनीति करने वाले मुख्यमंत्रियों को पुरस्कृत किया जाता रहेगा। दूसरी तरफ विकास दे पाने में असफल मुख्यमंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाता रहेगा। यह देश और इसकी गरीब जनता के लिए एक अच्छी खबर है।

यहां दो बातों पर गौर किया जा सकता है। पहली बात ये कि जहां तक विकास का संबंध गरीबी खत्म करने, कानून व्यवस्था और सुशासन से कारकों से है, पूरी संभावना है कि मतदाता विकास को नहीं बल्कि इन कारकों के आधार पर मत देने का फैसला करते हैं। लेकिन यह कोई बड़ा मसला नहीं है, क्योंकि चुनावी जीत की इच्छा रखने वाले नेता व्यावहारिक तौर पर आखिर विकास का ही लक्ष्य रखेंगे। दूसरी बात ये कि ऊपर बताई गई इन तमाम बातों के बावजूद इसकी संभावना है कि भविष्य में कभी भी कोई खास तात्कालिक मुद्दा चुनाव की दिशा निर्धारित कर सकता है, जैसे, कोई बहुत बड़ा घोटाला, सहानुभूति लहर जैसे किसी पार्टी के बड़े नेता की हत्या या राष्ट्रीय अपातकाल, आदि। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जब ऐसा कोई तात्कालिक बड़ा मुद्दा नहीं होगा, तो यह लगभग तय है कि विकास ही चुनाव परिणाम की दिशा निर्धारित करने वाला सबसे प्रमुख मुद्दा रहेगा।

-अरविंद पनगरिया (लेखक कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं)