तेज आर्थिक विकास का सबसे ज्यादा फायदा समाज के कमजोर तबकों को हुआ है

दलितों-मुसलमानों के घर तक पहुंची ग्रोथ
 
 
साल 2000 के दौरान देश में आर्थिक विकास ने तेज रफ्तार पकड़ी। इस दौरान गरीब अल्पसंख्यकों पर क्या असर हुआ? कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पनगढ़िया और मोरे ने एक पेपर तैयार किया है, जिसके मुताबिक इस बीच गरीबी भारत के दलित-आदिवासी समुदायों में अगड़ी जातियों के मुकाबले, और मुसलमानों में हिंदुओं के मुकाबले अधिक तेजी से कम हुई है। इस पेपर में 2004-05 और 2011-12 बीच के सात सालों का विश्लेषण किया गया है। इस दौरान भारत में गरीबी 15.7 प्रतिशत नीचे आई।
 
दलितों में गरीबी का अनुपात 21.5 प्रतिशत गिरा जबकि आदिवासियों में यह गिरावट 17 प्रतिशत के करीब थी। इनके मुकाबले अगड़ी जातियों में गरीबी की गिरावट काफी कम (10.5 प्रतिशत) थी। गरीबी में इतनी तेज गिरावट पहले कभी नहीं देखी गई। कोई 12 राज्यों में दलितों में गरीबी का अनुपात राष्ट्रीय औसत से कम है। देश में जातिगत भेद कम हो रहा है, यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।
 
कम हुए हैं फासले
हिंदी भाषी राज्यों को बीमारू राज्य कहा जाता है, लेकिन इन राज्यों में दलित जातियां तरक्की कर रही हैं। दक्षिणी और पश्चिमी भारत में भी दलितों में गरीबी कम हो रही है। केरल और तमिलनाडु के दलित सबसे कम गरीब हैं। मुसलमानों के लिए भी अच्छी खबर है। इन सात सालों के दौरान उनकी गरीबी भी तेजी से कम हुई है। उनके गरीबी अनुपात में 18.2 प्रतिशत की गिरावट हुई है जबकि हिंदुओं में यह गिरावट 15.6 प्रतिशत है। वैसे हिंदुओं के मुकाबले मुसलमान अधिक गरीब हैं लेकिन दोनों समुदायों के बीच का अंतर कम हुआ है। 2004-05 में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच 6.1 प्रतिशत का अंतर था, लेकिन 2011-12 में यह अंतर कम होकर 3.5 प्रतिशत पर पहुंच गया। ग्रामीण इलाकों में तो हिंदू-मुसलमानों के बीच गरीबी काफी हद तक कम हो गई है लेकिन शहरी इलाकों में अब भी मुसलमान, हिंदुओं के मुकाबले अधिक गरीब और कम पढ़े-लिखे हैं। उनमें साक्षरता और स्कूली शिक्षा की दर हिंदुओं के मुकाबले काफी कम है। इसकी एक वजह यह है कि वे अपनी बच्चियों को स्कूल नहीं भेजते। अच्छी बात यह है कि इस स्थिति में बदलाव आ रहा है।
 
2006 में सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि मुसलमानों को कई तरह के लाभ नहीं मिल पाते। उन्हें शिक्षा के अवसर नहीं मिलते। बैंक लोन लेने में मुश्किल होती है। सरकारी नौकरियों में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। लेकिन इस रिपोर्ट में भी कहा गया था कि मुसलमानों में गरीबी हिंदुओं के मुकाबले तेजी से कम हो रही है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट कई आश्चर्यजनक खुलासे करती है। कोई सात राज्यों में मुसलमान हिंदुओं के मुकाबले कम गरीब हैं। खासकर केरल में, जहां के काफी मुसलमान खाड़ी देशों में काम करते हैं। इस रिपोर्ट में ग्रामीण और शहरी अंतराल पर भी चर्चा है। गुजरात के ग्रामीण मुसलमानों में गरीबी का अनुपात सबसे कम (7.7 प्रतिशत) है, जो शहरी अनुपात से भी कम है। इसीलिए कई बार आंकड़ों को हकीकत से परे माना जाता है।
 
2002 में गुजरात के मुसलमान भयंकर हिंसा का शिकार हुए थे। आज भी वहां वे खुद को बेहद असुरक्षित महसूस करते हैं। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार दिखाई देता है। वैसे जैन समुदाय में गरीबी का अनुपात सबसे कम है। इसके बाद सिख और क्रिश्चियन समुदाय आते हैं। सच्चर समिति का कहना है कि मुसलमान कई मामलों में दलितों जैसी स्थिति में हैं। लेकिन गरीबी के मामले में नहीं।
 
2011-12 में 29.4 प्रतिशत दलित और 43 प्रतिशत आदिवासी गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे थे, जबकि मुसलमानों में यह अनुपात 25.4 प्रतिशत ही था। वैसे आंकड़ों का विश्लेषण करते समय बहुत सी बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। जैसे 2004-05 के दौरान देश में बारिश औसत से कम हुई थी, जबकि 2011-12 के दौरान अच्छी बारिश हुई थी। इसलिए इन दोनों अवधियों के आंकड़ों में खासा अंतर है। बेशक, 2011-12 के आंकड़े ज्यादा अच्छे हैं।
 
दूसरी बात यह है कि कई राज्यों में साल-दर-साल के आंकड़ों में बहुत अंतर है। संभव है वहां आंकड़ों में गड़बड़ी हो। तीसरी बात यह है कि सरकार ने तय किया है कि वह नई गरीबी रेखा निर्धारित करेगी, लिहाजा गरीबी से जुड़े आंकड़े दोबारा जमा किए जाएंगे। फिर भी मौजूदा रुझान खुशनुमा कहे जा सकते हैं। ग्रोथ बनाम मनरेगापनगढ़िया और मोरे का कहना है कि तेज जीडीपी ग्रोथ से गरीबी घटी है और इसका लाभ दलितों-मुसलमानों को भी हुआ है। कुछ समाजशास्त्रियों की राय इससे अलग है।
 
उनका कहना है कि गरीबी मनरेगा जैसी सरकारी योजनाओं की वजह से कम हुई है। लेकिन ऐसा है नहीं, क्योंकि गरीबी शहरी इलाकों में भी कम हुई है। दरअसल आर्थिक विकास के चलते समाज में सभी वर्गों की आय बढ़ी है। हां, दलितों और मुसलमानों को इसमें औरों से ज्यादा फायदा हुआ है।
 
 
स्वामीनाथन एस. अंकलेसरिया अय्यर
साभारः नवभारत टाइम्स (दिसंबर 2013 में प्रकाशित लेख के अंश)
स्वामीनाथन अय्यर