लाल दुर्ग की दरकती नीव

कोलकाता की अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय के भीतर का नजारा देखकर अंदाजा हो जाता है कि आखिर क्यों यह पार्टी ममता बनर्जी के ‘परिबोर्तन’ यानी बदलाव के नारे के आगे असहाय हो गयी। कुछ समय पहले कोलकाता में एक यात्रा के दौरान मेरे अनुभव बहुत रोचक हैं. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के इंतजार में बैठने से पहले हमें कुछ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। बड़े से कमरे में हलकी रोशनी है, जिसमें रखी कुरसी पर बैठकर आप अपने स्कूल के परीक्षा वाले दिनों में खो जाते हैं। आसपास का दृश्य अतियथार्थवाद की बुनावट-सा लगता है। दीवार पर करीने से गुजरे जमाने के कम्युनिस्ट दिग्गजों की तसवीरें लगी हैं। वहां सभी हैं- कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ, हो ची मिन्ह। उनके साथ राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के कम्युनिस्ट नेताओं और क्रांतिकारियों की तसवीरें भी लगी हैं। मगर एक मुश्किल यह है कि इन सभी नेताओं के नाम चीनी लिपि में लिखे हैं, जिन्हें पहचान पाना मुश्किल है।

कमरे में एक बड़ा मानचित्र भी टंगा है, यह मानचित्र उन देशों का है, जो अब पूंजीवादी समूहों में शामिल हो गए हैं। यह मानचित्र ग्लासनोस्त और सोवियत संघ के विभाजन से पहले का है। यह कमरा उस घड़ी की तरह है, जो दशकों पहले बंद हो गई। और इस तरह, कोई भी समझ सकता है कि इन चुनावों में लगभग शुभंकर बन चुके ‘परिबोर्तन’ के नारे का जवाब देने में पार्टी क्यों इतनी असहाय हो गयी।

और जैसे ही परेशान, किंतु अब भी रहस्यमय पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री दिल्ली से आई संपादकों की टीम से मिलने के लिए कमरे में कदम रखते हैं, तो उनके रक्षात्मक हावभाव को पहचानना मुश्किल नहीं होता। वह कहते हैं, ‘हम जानते हैं कि हमारे प्रति लोगों के विश्वास में कुछ कमी आई है। हम उनके विश्वास को जीतने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।’ मुख्यमंत्री बताते हैं कि मध्य वर्ग का एक तबका, खासकर युवा और उनमें से अधिक संपन्न लोग वाम मोरचे की नीतियों से तादात्म्य स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। वे सोचते हैं कि हम उतने होशियार और आधुनिक नहीं हैं कि उनकी आकांक्षाओं को पूरा कर सकें।

वह राज्य प्रशासन और नीतियों में सुधार लाना चाहते थे, लेकिन व्यवस्थित ढंग से। उनकी विफलता का पहला संकेत माकपा के केंद्रीय नेतृत्व ने ही दिया था। ममता की तृणमूल कांग्रेस ने बुद्धदेव बाबू की पार्टी को निशाना बनाने का काम बाद में किया।

यह किसी से छिपा नहीं है कि माकपा की बंगाल इकाई, खासकर मुख्यमंत्री ने परमाणु करार मुद्दे पर केंद्रीय नेतृत्व के यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने का जोरदार ढंग से विरोध किया था। अगर उस सलाह पर ध्यान दिया जाता, तो कांग्रेस और तृणमूल के बीच गठजोड़ नहीं होता और आज चुनाव विश्लेषक कुछ और ही धुन में गा रहे होते। अब बुद्धदेव बाबू के पास यह कहने के अलावा और कोई उपाय नहीं कि पार्टी में उनका किसी से मतभेद नहीं है, खासकर प्रकाश करात से। वह साहसपूर्वक कहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र के गरीब अब भी उनका समर्थन करते हैं, ‘क्योंकि वे जानते हैं कि हमने उनके लिए क्या किया।’

राज्य के दुर्गापुर, पुरुलिया और मिदनापुर जैसे कुछ बेहद गरीब और अति पिछड़े इलाके की यात्रा में हमने अनुभव किया कि कम्युनिस्टों के 34 वर्षों के निर्बाध शासन के दौरान इतने परिश्रम से पोषित गरीबी के इस गढ़ में ममता के रथ को रोकना मुश्किल है। जब तक कोई अप्रत्याशित चमत्कार माकपा कैडर व उनके महान संगठनात्मक कौशल को नहीं बचाता, उन्हें ‘परिबोर्तन’ के नारे का मुकाबला करते देखना मुश्किल है।

लोगों ने तो अपने मिजाज का संकेत 2009 के संसदीय चुनाव में ही दे दिया था, जब वाम मोरचा 294 विधानसभा क्षेत्रों में से सिर्फ 99 में ही बढ़त हासिल कर सका था। मुख्यमंत्री के मुताबिक, 1977 में वाम मोरचा जब सत्ता में आया था, तो लगभग 55 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे थी, आज वह आंकड़ा 20 प्रतिशत से भी कम है। 1977 के बाद से 13 लाख एकड़ जमीन भूमिहीनों में वितरित की गई है। उनकी सरकार ने अकेले पिछले पांच वर्षों में 20 हजार एकड़ जमीन वितरित की है।

वह सिंगूर जैसे भावनात्मक मुद्दे पर अपनी गलती को स्वीकार करते हैं, जहां पार्टी विकास को लेकर अपना संदेश पहुंचाने में विफल रही। वह मानते हैं कि सरकार को भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर सतर्क रहने की जरूरत थी। वह कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण के लिए ऐसे मॉडल की जरूरत है, जिससे उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण न हो और पुनर्वास की व्यापक व्यवस्था हो।

आगे की रणनीति को लेकर पार्टी में मतभेद की बात भी वह स्वीकारते हैं, ‘कुछ लोग ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने के साथ बुनियादी चीजों पर लौटने की वकालत करते हैं, जबकि कुछ लोग अपनी नीतियों में औद्योगिकीकरण को भी शामिल करने को ज्यादा व्यावहारिक मानते हैं।’ बुद्धदेव बावू के आत्मविश्वास और दमदार शब्दों से उनका अनुभव झलकता है। वह बेहद भद्र हैं और झूठा प्रदर्शन नहीं करते। वह ऐसे शख्स की तरह लगे, जो जानता है कि इतने बड़े मंच पर वह आखिरी बार लोगों का अभिवादन कर रहा है।

- संजीव श्रीवास्तव