गरीब राज्यों को मिल रहा है बेहतर जनसांख्यिकी लाभांश

देश में गरीब राज्यों को बेहतर जनसांख्यिकी लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) मिल रहा है। इस बार की जनगणना में देश की जनसंख्या वृद्धि दर में कुछ कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2001 की जनगणना में जहां जनसंख्या वृद्धि दर 21.54 फीसदी दर्ज की गई थी, वहां इस बार की जनगणना में यह दर 17.64 फीसदी दर्ज की गई है। सबसे अच्छी बात यह है कि 0-6 वर्ष तक के बच्चों की संख्या में 3.08 फीसदी की कमी आई है।

बच्चों की संख्या में कमी होने से किसी भी क्षेत्र को जनसांख्यिकी लाभांश हासिल होता है, जिसके कारण आने वाले दशक में उन क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति आय में काफी वृद्धि होगी। छह वर्ष तक के बच्चों की संख्या में सर्वाधिक 4.1 फीसदी की कमी उत्तर प्रदेश में हुई। बच्चों की संख्या में राजस्थान में 3.5 फीसदी, मध्य प्रदेश में 3.4 फीसदी, छत्तीसगढ में 3.1 फीसदी और बिहार में 2.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

जनसांख्यिकी लाभांश का मततलब क्या है? आर्थिक विकास के कारण जब मृत्यु दर में गिरावट होती है, तो लोग बच्चों की संख्या घटाते हैं। कम बच्चों के कारण घर में काम करने वालों का अनुपात बढ़ता है और आश्रितों यानी, बच्चों और बूढ़ों के अनुपात में कमी आती है। इससे प्रति व्यक्ति आय बढ़ जाती है।

दूसरा, बच्चों की संख्या में कमी आने से कोई भी देश भौतिक सम्पत्ति, रोजगार प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी विकास पर अधिक खर्च कर सकता है। तीसरा, प्रजनन दर में कमी आने से अधिक से अधिक महिलाएं काम पर जा सकती हैं। इससे आश्रितों की संख्या में और कमी आती है। चौथा, कमाने वालों की संख्या बढ़ने से ज्यादा बचत होती है, जिससे अधिक निवेश करना संभव हो जाता है।

शेखर अय्यर और अशोक मोदी द्वारा तैयार किये गये आईएमएफ के वर्किंग पेपर (द डेमोग्राफिक डिविडेंटः एविडेंस फ्रॉम द इंडियन स्टेट) में कहा गया है कि 1980 के बाद सकल घरेलू उत्पाद में हुई वृद्धि में 40 फीसदी योगदान जनसांख्यिकी लाभांश का रहा है, न कि किसी आर्थिक सुधार का या अन्य कदमों का। वर्किंग पेपर में आंकलन करते हुए कहा गया है कि 1980 के दशक में इस लाभांश के कारण जीडीपी विकास की दर में 1.46 फीसदी की अधिक वृद्धि हुई। इस दशक में विकास दर में हुई तेज वृद्धि का एक कारण यह भी था, जबकि इस अवधि में आर्थिक सुधार में कोई विशेष तेजी नहीं दिखाई गई थी। यह लाभांश 1990 के दशक में 1.34 फीसदी था। इस पेपर में 2000 के दशक में इसके 1.74 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है। रिकार्ड जीडीपी विकास और जनगणना के प्रारंभिक आंकड़ों से लगता है कि यह अनुमान सही साबित होगा। लेखक का अनुमान है कि 2010 के दशक में आर्थिक विकास में इस लाभांश का 1.98 फीसदी अतिरिक्त योगदान रहेगा। इसके बाद 2020 के दशक में यह योगदान 2.04 फीसदी का रहेगा, हालांकि 2030 के दशक से यह योगदान घटने लगेगा। इस अवधि में गरीब राज्यों में प्रति व्यक्ति आय में अधिक तेजी से विकास होगा।

अधिकतर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अतिरिक्त श्रमिक यदि शिक्षित और प्रशिक्षित नहीं हों, तो देश के लिए सही नहीं होते। आश्चर्यजनक रूप से अय्यर और मोदी ने अपने अध्ययन में कहा है कि सरकार ने सामाजिक योजनाओं पर उतना खर्च नहीं किया है, जितना विकास की योजनाओं पर किया है। ऐसा शायद इसलिए है, क्योंकि निजी स्कूल और निजी कम्पनियां लोगों को प्रशिक्षित कर रही हैं। इस बात पर शोधकर्ताओं का ध्यान कम जाता है।

लेखकों ने इस अध्ययन में कहा है कि 15 से 60 वर्ष के उम्र की काम करने वाली आबादी तीन राज्यों-तमिलनाडु, कर्नाटक और गुजरात-में 1961 के 53.7 फीसदी से बढ़कर 2001 में 62.1 फीसदी हो गई है। इसी अवधि में तीन पिछड़े राज्यों-उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश-में काम करने वालों की आबादी 53.1 से मामूली बढ़कर 53.4 फीसदी ही हो पाई। इस आंकड़े पर अब तक शोधकर्ताओं का ध्यान कम ही गया है। इस आंकड़े से पता चलता है कि क्यों तीन विकसित राज्यों की जीडीपी विकास दर बेहतर रही है और क्यों तीन पिछड़े राज्यों की जीडीपी विकास दर कम रही है। उत्तर और मध्य भारत में हालांकि बच्चों की संख्या घटने से वैसा ही विकास देश के इस हिस्से में भी होने की संभावना है, जो पहले दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में हो चुका है। उम्मीद है इससे विभिन्न राज्यों के बीच समानता स्थापित होगी।

पिछले हफ्ते अपने लेख में मैने यह लिखा था कि दिल्ली में सामाजिक योजनाओं पर खर्च 1992-93 में जीडीपी के 1.28 फीसदी से बढ़कर 2008-09 में जीडीपी के 7.27 फीसदी हो गई। यह हालांकि सही नहीं था। दरअसल, 2008-09 के आंकड़े में शिक्षा और स्वास्थ्य के अलावा अन्य कल्याणकारी योजनाओं पर हुआ खर्च भी शामिल है। इन सभी खर्चों को मिलाकर 2005-06 में जीडीपी का 5.59 फीसदी खर्च हुआ था, जो 2008-09 में बढ़कर 7.27 फीसदी हो गया। कुछ आलोचकों का मानना है कि पिछले दो दशकों में सरकार ने शिक्षा पर होने वाले खर्च में उस दर से वृद्धि नहीं की, जिस रिकार्ड दर से इन दो दशकों में जीडीपी में वृद्धि हुई है।

सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के पार्थ जे शाह ने कहा कि सरकारी खर्च की बात छोड़िए, एक बड़ा बदलाव यह हुआ है कि लोगों ने खुद शिक्षा के ऊपर खर्च बढ़ा दिया है। आर्थिक सुधारों की वजह से लोगों की आय में वृद्धि हुई है। इस वजह से अब एक आम गरीब आदमी भी घटिया सरकारी स्कूलों की बजाय बेहतर प्राइवेट स्कूलों में अपने बच्चे को पढ़ाने लगे हैं। शोध संस्थान इंडीकस एनालिटिक्स के मुताबिक शिक्षा, किताब, अखबार और पत्रिकाओं पर निजी खर्च वर्ष 2009-10 में जीडीपी का 1.2 फीसदी हुआ है। इसी से पता चलता है कि पिछले एक दशक में साक्षरता दर में इतनी वृद्धि क्यों हुई। पिछले दशक में यह दर बिहार ( 16.82 प्रतिशतांक वृद्धि), यूपी (11.45 प्रतिशतांक), झारखंड (16.07 प्रतिशतांक) और उड़ीसा (10.37 प्रतिशतांक) में काफी बेहतर रही है।

इसके अलावा गरीब राज्यों ने पिछले दशक में शिक्षकों की कमी से निपटने के लिए बड़े स्तर पर शिक्षकों और अर्द्ध शिक्षकों की कांट्रेक्ट पर भर्तियां की हैं। अकेले बिहार में करीब दो लाख शिक्षकों की कांट्रेक्ट की भर्तियां की गई हैं। उन्हें स्थाई शिक्षकों को दिये जार रहे वेतन का पांचवा हिस्सा या उससे भी कम वेतन दिया जा रहा है। फिर भी एक अन्य शोधार्थी कार्तिक मुरलीधरण के मुताबिक इन भर्तियों से शिक्षा की स्थिति पहले से काफी सुधरी है।

जनसांख्यिकी लाभांश के कारण अगले तीन दशकों में बच्चों की संख्या लगातार घटती जाएगी। इससे शिक्षकों पर दबाव कम होगा और कक्षा का आकार भी घटेगा। इससे हालांकि शिक्षकों की जिम्मेदारी बढ़ाने और स्कूलों में सुधार के लिए सरकार द्वारा कदम उठाने की जरूरत खत्म नहीं हो जाती है।

- स्वामीनाथन अय्यर

स्वामीनाथन अय्यर