ईश्वरचंद्र विद्यासागर की 128 पुण्यतिथि पर विशेष

महान समाज सुधारक, शिक्षा शास्त्री और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर, 1820 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम ठाकुरदास बंधोपाध्याय और माता का नाम भगवती देवी था। माता पिता ने इन्हें ईश्वरचंद्र बंदोपाध्याय नाम दिया था लेकिन विभिन्न विषयों पर इनकी पकड़ और ज्ञान के कारण उनके गांव के लोगों ने उन्हें विद्यासागर नाम की उपाधि प्रदान की थी।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय से ही हुई थी। उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता के संस्कृत विद्यालय में गये। संस्कृत की शिक्षा के साथ-साथ वे अंग्रेजी की शिक्षा भी प्राप्त करते रहे। सन 1839 में उन्होंने प्रतिष्ठित लॉ कमिटी की परीक्षा उत्तीर्ण की।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर स्कूलों के सहायक निरीक्षक के पद पर नियुक्त हुए। तब उन्होंने शिक्षा की बहुत सी बातो का सुधार किया। उन्होंने बंगाल के सभी जिलो में ही बीस ऐसे आदर्श विद्यालय खोले जिसमे विशुद्ध भारतीय शिक्षा दी जाती थी।

उन दिनों संस्कृत कालेजो में केवल उच्च जाति के लोगो को ही प्रवेश दिया जाता था। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका कहना था की हर जाति के हर व्यक्ति को हर प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर जानते थे की बालिकाओ की शिक्षा से ही समाज में फैली रूढ़िवादिता, अन्धविश्वास और कुरुतियां दूर की जा सकती है और देश को समृद्ध, समर्थ और योग्य नागरिक प्रदान करने के लिए बालिकाओ की शिक्षा जरुरी है। उन्होंने बंगाल में ऐसे 35 स्कूल खोले जिसमे बालिकाओ की शिक्षा का प्रबंध था। वे बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए मेहनती और मेधावी छात्रो को पुरुस्कार भी दिया करते थे। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से सबसे पहले एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली चंद्रमुखी बोस को प्रोत्साहित और सम्मानित था।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर ब्रह्म समाज नामक संस्था के सदस्य थे। स्त्री की शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने विधवा विवाह और विधवाओ की दशा सुधारने का काम भी किया। उन्होंने समाज में विधवाओं की दुबारा शादी कराने की पैरवी की। वर्ष 1856 के विडो रिमैरेज ऐक्ट XV को आगे बढ़ाया। इसके लिए ईश्वरचंद्र विद्यासागर को बहुत सी कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

अंत में विधवा विवाह को क़ानूनी स्वीकृति प्राप्त हो गयी। सुधारवादी विचारधाराओ का जनता के बीच प्रचार करने के लिए ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अंग्रेजी व बंगला में पत्र निकाले। ईश्वरचंद्र विद्यासागर का कहना था की कोई भी व्यक्ति अच्छे कपडे पहनने, अच्छे मकान में रहने तथा अच्छा खाने से ही बड़ा नहीं होता बल्कि अच्छे काम करने से बड़ा होता है।

उन्होंने अपने समय में फैली अशिक्षा और रूढ़िवादिता को दूर करने का संकल्प लिया। अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए भी उन्होंने शैक्षिक, सामाजिक और महिलाओं की स्थिति में में जो सुधार किये उसके लिए हमारे देशवासी उन्हें सदैव याद करेंगे।

रवींद्रनाथ टैगोर ने उनके निधन पर कहा था कि 'हैरत होती है कि ईश्वर ने 4 करोड़ बंगाली बनाते वक्त एक महात्मा को कैसे बनाया?'

- आजादी.मी

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