खतरा गलत नीतियों से है

कुछ इसलिए कि राबर्ट वडरा उर्फ मैंगो मैन के किस्से ज्यादा ही सुनने को मिल रहे हैं इन दिनों; कुछ इसलिए कि समस्याएं और भी हैं देश के सामने, मैं सोनिया जी के दामाद के बारे में नहीं लिखने वाली हूं। पिछले सप्ताह सुर्खियों में इतना छाए रहे दामाद साहब कि किसी ने ध्यान ही नहीं दिया उस झगड़े पर जो वित्त और पर्यावरण मंत्रालय के बीच छिड़ गया है। एलान-ए-जंग पर्यावरण मंत्री ने प्रधानमंत्री को एक लंबा-चौड़ा पत्र लिख कर किया, जिसमें मंत्री जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे किसी भी हाल में वित्तमंत्री का अपने मंत्रालय में दखल बर्दाश्त नहीं करेंगे। क्या है यह दखल? वित्तमंत्री ने इशारा किया है कि वे अपने मंत्रालय के तहत एक ऐसी संस्था बनाना चाहते हैं, जो पर्यावरण मंत्रालय से इजाजत लेने में निवेशकों की मदद करेगी।

वित्तमंत्री ने इस संस्था की जरूरत महसूस की है, क्योंकि पर्यावरण को बचाने के बहाने पर्यावरण मंत्रालय में नौ सौ से ज्यादा महत्त्वपूर्ण योजनाएं अटकी हुई हैं। कुछ ऐसी योजनाएं हैं जो कई करोड़ रुपयों का निवेश हो जाने के बाद वर्षों तक रुकी रही हैं, क्योंकि पूर्व पर्यावरण मंत्री, जयराम रमेश, ने अपने मंत्रालय के जरिए एक नए किस्म का लाइसेंस राज शुरू कर दिया था। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यही मुख्य कारण रहा है पिछले दो वर्षों की आर्थिक मंदी की शुरुआत का। निवेशकों, खासतौर पर विदेशी निवेशकों, ने जब जयराम रमेश के तेवर देखे तो उन्होंने भारत में निवेश बंद कर दिया। प्रधानमंत्री ने अपने पर्यावरण मंत्री को काबू में लाने की काफी कोशिश की, लेकिन जब जयराम साहब ने उनकी एक न सुनी तो उनको प्रमोशन देकर ग्रामीण विकास मंत्री बना दिया गया।

उनकी जगह पर जयंती नटराजन को लाया गया। इस उम्मीद से कि वे जान पाएंगी कि विकास को पर्यावरण का दुश्मन समझना जरूरी नहीं होता है। सबूत हैं पश्चिमी विकसित देश जहां आधुनिकता के साथ-साथ साफ नदियां, घने जंगल और साफ-सुथरे शहर दिखते हैं। इन देशों के विकास के रास्ते में जो गलतियां हुई थीं, वे तकरीबन सारी सुधार दी गई हैं। इन गलतियों से हम सीख सकते थे, लेकिन हम कुछ न सीखे। नतीजा यह कि गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियां भी हमने मैली कर दी हैं और गलत नीतियों और गुरबत की वजह से कटते जा रहे हैं हमारे वन, प्रदूषित होते जा रहे हैं पहाड़।

सोनिया-मनमोहन सरकार के दौर में पर्यावरण मंत्रालय ने नदियों, पहाड़ों और जंगलों को बचाने के बदले अपना सारा ध्यान बड़ी योजनाओं को रोकने पर दिया है। ए राजा जब इस मंत्रालय में थे तो उन्होंने अपनी निजी तरक्की के लिए बड़ी योजनाओं के सामने रुकावटें पैदा कीं। फिर आए जयराम रमेश, जिन्होंने रुकावटें पैदा की अपनी ताकत दिखाने के लिए और कुछ अपना नाम कमाने के लिए। सो छोटी-मोटी, अनजान गैर-सरकारी संस्थाओं के कहने पर, पर्यावरण बचाने के नाम पर उन्होंने बड़ी-बड़ी योजनाओं को रोक दिया। अफसोस कि जयंती नटराजन के आने के बाद भी पर्यावरण मंत्रालय के तौर-तरीकों में कोई फर्क नहीं आया है। न पर्यावरण बचाने का काम हो रहा है और न ही बड़ी योजनाओं के निर्माण में कोई तेजी आई है।

अगर उनको बदल कर किसी दूसरे राजनेता या आला अधिकारी को लाया जाए तो भी पर्यावरण मंत्रालय पर्यावरण को बचाने का काम नहीं कर सकेगा। इसलिए कि पर्यावरण की असली समझ सिर्फ विशेषज्ञों को होती है। प्रधानमंत्री अगर साबित करना चाहते हैं कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना भारत में विकास हो सकता है तो उनका पहला कदम होना चाहिए पर्यावरण मंत्रालय को समाप्त करना। उसकी जगह पर आनी चाहिए एक ऐसी संस्था, जिसमें सिर्फ विशेषज्ञ और वैज्ञानिक हों। यह सीएजी जैसी संवैधानिक संस्था होनी चाहिए, जिसमें राजनीतिक दखल की कोई गुंजाइश न हो। राजेंद्र पचौरी जैसे लोगों के तहत होनी चाहिए। यह नई संस्था, जिनका राजनीति से कोई रिश्ता न हो और पर्यावरण का ज्ञान हो।

ऐसी संस्था पर घटिया किस्म के एनजीओ हुक्म नहीं चला सकेंगे जो पर्यावरण के नाम पर सिर्फ घड़ियाली आंसू बहा कर करोड़ों रुपए इकट्ठा करते हैं। ये लोग विदेशों से भी पैसे बटोरते हैं और अक्सर देखा गया है कि विकास को रोकने का ही काम करते हैं, नदियों, पहाड़ों, जंगलों को बचाने का नहीं। समय आ गया है उनकी दुकानें बंद करने का और पर्यावरण बचाने के लिए वास्तव में कदम उठाने का।

स्थिति इतनी गंभीर है कि अगर अब भी प्रधानमंत्री ठोस कदम नहीं उठाते हैं तो वह दिन दूर नहीं जब भारत माता के ‘सुजलां सुफलां’ वाले दिन हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे। पर्यावरण एक राजनीतिक खेल नहीं, एक अति-गंभीर समस्या है, जिसका हल सिर्फ विशेषज्ञ और वैज्ञानिक ढूंढ़ सकते हैं। जिनको पर्यावरण की वास्तव में चिंता है वे अच्छी तरह जानते हैं कि हमारे देश में पर्यावरण को खतरा विकास से नहीं, गलत नीतियों से है, गलत किस्म के मंत्रियों से है।

- तवलीन सिंह
जनसत्ता से साभार