भ्रष्टाचार की पहेली को समझिए

नेताओं को समझना होगा कि भारत का नया मध्यवर्ग आत्मसम्मान के लिए लड़ने को तैयार है. वह अपने गुस्से को खुद जाहिर कर रहा है. जन भावना का दबाव राजनीतिक व्यवस्था व नेताओं को अस्थिर कर देगा या फ़िर एक वास्तविक राजनीतिक सुधार की नींव रखेगा.

एक साल पहले किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि कई मंत्री, राजनेता, वरिष्ठ अधिकारी और सीइओ तिहाड़ जेल में होंगे और सुनवाई का सामना कर रहे होंगे. भारत में भ्रष्टाचार अब कोई नयी खबर नहीं है, यह आम प्रतिक्रिया अप्रत्याशित और एक पहेली की तरह है. यदि ऐसा है तो फ़िर घूसखोरी के खिलाफ़ अंतहीन आंदोलन क्यों हो रहे हैं? दरअसल, आज खुद के प्रति आश्वस्त और जिज्ञासु नया मध्यवर्ग तेजी से उभर रहा है. इस मध्यवर्ग ने आत्मसम्मान और गरिमा हासिल की है और अब इसे मीडिया और राजनेताओं के द्वारा भी गंभीरता से लिया जा रहा है. अनुमान है कि मध्यवर्ग 2020 तक भारत की आबादी का 50 प्रतिशत तक हो जायेगा. तब हमारी राजनीति भी बदल जायेगी. हम आज जिन घटनाओं से रूबरू हो रहे हैं, वे आने वाले बड़े बदलाव के ट्रेलर मात्र हैं.

आज बड़ी खबर इस्लामिक आतंकवाद या वैश्विक आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि यह है कि चीन और भारत ने उदार अर्थव्यवस्था की अवधारणा को किस तरह गले लगाया कि वे आज आर्थिक शक्ति के रूप में ऊभर रहे हैं. दोनों ही देशों में मध्य वर्ग एक नयी प्रतिष्ठा हासिल कर रहा है, जिससे उसे लंबे समय से वंचित रखा गया था. डेयरड्रे मैक क्लोसके की नयी किताब ’बॉरजियस डिग्निटी : ह्वाय इकोनॉमिक्स कैन नॉट एक्सप्लेन द मॉडर्न वर्ल्ड’ के मुताबिक 1800 के बाद पश्चिम का उदय केवल आर्थिक कारणों से नहीं हुआ, बल्कि बाजार, उद्यम और शोध के प्रति उनकी धारणा भी बदल गयी. लोग उद्यमशीलता के प्रति उत्साही हुए, बिजनेसमैन को सम्मान देना शुरू किया. पश्चिम के उदय को सिर्फ़ उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद या फ़िर माक्र्स के वर्ग सिद्धांत के जरिये नहीं समझा जा सकता. इससे कहीं ज्यादा यह समझने की जरूरत है कि लोगों की अवधारणा और उम्मीदें कैसे बदल गयी.

नोबेल पुरस्कार प्राप्त अमेरिकी अर्थशास्त्री रॉबर्ट लुकास कहते हैं, ’किसी भी समाज में आय में वृद्धि इस प्रकार से हो कि इसके ज्यादातर लोग अपने और बच्चों के जीवन में परिवर्तन महसूस कर सकें.’ भारत में आज हर आदमी खुशहाल भले न हो, एक बड़ी आबादी अपने जीवन में बदलाव महसूस कर रही है. सच है कि आज भी बहुत से इलाकों में लोग गरीबी और अभावों से बुरी तरह जूझ रहे हैं, पर लोगों की बड़ी संख्या ऐसी भी है जो देख रही है कि उसका जीवन स्तर उसके पिता से काफ़ी बेहतर है. पहली बार उन्हें महसूस हो रहा है कि उनके लिए भविष्य की संभावनाएं खुली हैं और वे अपने प्रयासों से जीवन स्तर में बदलाव ला सकते हैं. भारतीय इतिहास में पहली बार मध्यवर्ग के सपनों में सम्मान की भावना भी शामिल है. आज सभी वर्गो के बच्चे एमबीए की डिग्री हासिल कर रहे हैं, इस भावना के साथ कि कल वे सीइओ बन सकते हैं. चाय और चाट के साथ सामान्य गपशप में भी बाजार, शेयर और ट्रेडिंग के किस्से आम हो चले हैं. यहां तक कि वामपंथी दलों और कांग्रेस के सिद्धांतकार भी अपने पूर्वाग्रहों पर पुनर्विचार के लिए मजबूर हुए हैं. कुल मिलाकर भारतीय तहजीब में भी एक बड़ा बदलाव आया है, जिसमें बिजनेसमैन और कारोबारियों के लिए सम्मान की भावना है.

भारतीयों ने राजनीतिक आजादी भले ही 1947 में पायी हो, ओर्थक आजादी उन्हें 1991 में मिली, जिसके जरिये उन्होंने धीरे-धीरे आत्मसम्मान हासिल किया है. आत्मसम्मान दिमाग की वह अवस्था है, जो सामाजिक, राजनीतिक और ओर्थक आजादी से हासिल होती है. सरकारी अफ़सर लोगों को लंबे समय से इस आत्मसम्मान से दूर रख रहे थे, जिसकी अब लोग मांग कर रहे हैं. अपनी गाड़ियों पर बत्ती लगाकर शहरों के दौरे पर निकलने वाले अधिकारी आम लोगों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हुए उन्हें इंतजार के लिए मजबूर करते रहे हैं. यही लोग जब जन्म प्रमाणपत्र, राशन कार्ड या पासपोर्ट जैसे जरूरी कागजात हासिल करने, जिसे पाना उनका हक है, के लिए इन अधिकारियों के दप्तर में पहुंचते हैं तो उन्हें वहां भी लंबी लाइनों में इंतजार करना पड़ता है.

भारत के मध्यवर्ग में उभरता आत्मसम्मान लगभग वैसा ही है, जिसे जाने-माने दार्शनिक एवं अर्थशास्त्री एडम स्मिथ ने कभी ’आजादी की प्राकृतिक प्रणाली’ कहा था. तात्पर्य यह है कि किसी खुले, पारदर्शी और प्रतियोगी बाजार में जब आम आदमी अपने हितों की देखरेख शांतिपूर्वक कर पाता है, तब एक ’अदृश्य हाथ’ उसे मध्यवर्ग में शामिल होने, बेहतर और सम्मानित जीवन जीने में मदद करता है. पश्चिम और सुदूर पूर्व के हालिया इतिहास बताते हैं कि ऐसा न सिर्फ़ संभव है, बल्कि इससे राष्ट्रीय गौरव भी हासिल किया जा सकता है. आत्मसम्मान के बिना आजादी आत्म-घृणा के समान है, जिसमें लोगों की आशाएं मर जाती हैं.

यदि आम लोगों की समृद्धि और सम्मान का आधार आर्थिक सुधार है तो यूपीए सरकार के गत सात साल के कार्यकाल को इसकी कमियों के रूप में कैसे देखा जा सकता? यहीं सवाल यह भी है कि भाजपा गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स को समर्थन न देने की जिद क्यों कर रही है, जो भविष्य के लिए सुधार का संभवत: सबसे ब़ड़ा कदम है? सोनिया गांधी को भी यह समझना चाहिए कि खाद्य पदार्थो की महंगाई इतना नहीं रुला रही होती, यदि खेती में भी सुधार किया होता. रियल एस्टेट क्षेत्र में सुधार हुआ होता तो काला धन का आकार काफ़ी छोटा होता. लोग इतने आक्रोश में नहीं होते, यदि सरकार नौकरशाही को जवाबदेह बनाने के अपने वादे पूरे करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था सुधार चुकी होती.

अब राजनेताओं को समझना होगा कि भारत का नया मध्यवर्ग आत्मसम्मान के लिए लड़ने को तैयार है. उसकी आवाज संसद तक नहीं पहुंच रही, इसलिए वह अपने गुस्से को खुद जाहिर कर रहा है. जन भावना का दबाव राजनीतिक व्यवस्था और नेताओं को अस्थिर कर देगा या फ़िर एक वास्तविक राजनीतिक सुधार की नींव रखेगा. भारत की पहेली का जवाब मध्यवर्ग के आत्मसम्मान में ही छिपा है.

-गुरचरन दासGurcharan Das

गुरचरण दास