सहकारिता आंदोलन से खुलेंगे आर्थिक लोकतंत्र के द्वार

वर्ष 2012 को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सहकारिता के अंतराष्ट्रीय वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। इससे संबंधित सबसे बड़ा सम्मेलन कनाडा के क्यूबेक सिटी में हाल ही में 8 से 11 अक्टूबर के बीच सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। विश्व स्तर पर विभिन्न तरह के सहकारी उपक्रमों के लगभग 100 करोड़ सदस्य हैं, जबकि लगभग 10 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

सहकारी उपक्रम कई तरह के हैं। एक ही आजीविका से जुड़े विभिन्न व्यक्ति अपने उत्पाद या सेवाएं बेचने के लिए सहकारी समिति बना सकते हैं। उदाहरण के लिए किसान अपनी फ सल बेचने के लिए सहकारी संघ बनाते हैं तो पशुपालक दूध बेचने के लिए। इसके अतिरिक्त यह सरकारी समितियां किसानों या पशुपालकों के लिए खाद या चारा खरीदने का काम भी बेहतर ढंग से कर सकती हैं, क्योंकि जब बड़ी मात्रा में खरीद की जाएगी तो विक्रेता से कम कीमत व बेहतर क्वॉलिटी प्राप्त करने की संभावना बढ़ जाती है।

शहरों में टैक्सी चालक या अन्य तरह के कई छोटे कारोबारी अपने हितों की रक्षा के लिए सहकारी समितियां बना लेते हैं। इससे उन्हें अधिक ग्राहकों से संपर्क करने व बेहतर सेवाएं देने के अवसर भी मिलते हैं। इसी तरह विभिन्न उपभोक्ता बेहतर उपभोक्ता वस्तुएं प्राप्त करने के लिए हर स्तर पर सहकारिता समिति बना सकते हैं।

सस्ते ब्याज पर व अधिक विश्वसनीयता से ऋण पाने के लिए क्रेडिट सहकारी सोसायटी भी बनाई जाती है। इस तरह की बीमा सहकारी सोसायटी भी बनाई जाती है। क्रेडिट सहकारी समितियां विभिन्न स्तरों पर बहुत तेजी से फैल रही हैं, हालांकि हमारे देश में इनमें कुछ गड़बडि़यों के समाचार भी समय-समय पर मिलते रहे हैं।

कुछ देशों में सहकारी आंदोलन बड़े आश्चर्यजनक हद तक आगे बढ़ चुका है। नॉर्वे में 42 प्रतिशत नागरिक किसी न किसी (या एक से अधिक) सहकारी उपक्रमों के सदस्य हैं तो बोलीविया में 33 प्रतिशत व कनाडा में 25 प्रतिशत नागरिक ऐसी मेंबरशिप पा चुके हैं। जापान में कृषि क्षेत्र के सहकारी उपक्रम एक वर्ष में 90 अरब डॉलर का उत्पादन करते हैं।

हाल में भारत में रिटेल में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश पर काफी विवाद छिड़ा रहा है। इस संदर्भ में यह जानना महत्वपूर्ण है कि डेनमार्क में उपभोक्ता रिटेल बाजार का 36 प्रतिशत हिस्सा उपभोक्ता सहकारी उपक्रमों के हाथ में है। इससे पता चलता है कि चुनाव केवल निजी व्यापारियों व विदेशी कंपनियों के बीच नहीं है, अपितु सहकारिता संगठन भी एक विकल्प हो सकते हैं।

इनकी एक विशेषता यह है कि यह प्राय: 'एक सदस्य एक वोट' के आधार पर कार्य करते हैं। इस तरह यह आर्थिक लोकतंत्र की राह दिखाते हैं। अनेक सहकारी संगठन स्थानीय समुदायों से नजदीकी तौर पर जुड़े होते हें। उन्हें अपने आर्थिक कार्यों से जो लाभ होता है उसका उपयोग वे कई बार इन समुदायों के हित में करते हैं।

उदाहरण के लिए किसानों के सहकारी संगठन अपने लाभ का कुछ हिस्सा गांवों की सामूहिक भलाई के कार्यों के लिए खर्च करते हैं व टैक्सी चालकों के सहकारी संगठन अपने लाभ का हिस्सा दुर्घटनाग्रस्त सदस्यों के परिवारों की सहायता के लिए देते हैं।

अनेक सहकारी संगठनों ने आपसी सहयोग का भी अच्छा उदाहरण दिया है। स्पेन हाल ही में गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजरा है। इससे अनेक बिजनेस विफल हो गए हैं। पर सहकारी उपक्रम इस संकट से कम प्रभावित हुए। यहां का सबसे बड़ा सहकारी समूह मोंडाग्रोन के नाम से जाना जाता है जिसके साथ 270 सहकारी उपक्रम जुड़े हैं। इनमें से केवल एक ही विफल हुआ है। उसके कर्मचारियों को भी अन्य सहकारी समूहों में रोजगार दे दिया गया। इससे कोई भी कर्मचारी बेरोजगार नहीं हुआ।

अर्जेन्टीना में भी आर्थिक संकट के दौरान बहुत से उद्योग फेल हो गए तो ऐसे लगभग 200 अपेक्षाकृत छोटे स्तर के औद्योगिक उपक्रमों में वहां के कर्मचारियों व मजदूरों ने सहकारी समितियां बनाईं तथा इन उद्योगों को नए सिरे से जमाया। इसी तरह ब्राजील से 69 आद्योगिक इकाईयों को मजदूरों व कर्मचारियों के सहकारी संगठनों ने नया जीवन दिया। भारत व वेनेजुएला से भी ऐसे छुट-पुट समाचार मिले हैं।

भारत में आधुनिक रूप में सहकारिता अभियान की शुरुआत 1904 में मानी जाती है। दूसरे अकाल आयोग ने 1901 में देश में सहकारी सोसायटियों को आगे बढ़ाने की सिफारिश की थी व इस आधार पर वर्ष 1904 में कोआपरेटिव सोसायटी अधिनियम पास किया गया। इस तरह सहकारिता के प्रसार का वैधानिक आधार तो तैयार हो गया पर इसके बावजूद ब्रिटिश राज के दिनों में सहकारिता की वास्तविक प्रगति बहुत धीमी ही रही। वर्ष 1937 के आसपास जब कुछ प्रांतों में कांग्रेस को सीमित सत्ता मिली तो इन प्रांतों में सहकारिता ने अच्छी प्रगति आरंभ की। वर्ष 1942 में मल्टि यूनिट कोऑपरेटिव सोसायटीज अधिनियम पास किया गया।

आजादी के बाद पंचवर्षीय योजनाओं में सहकारिता योजनाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। जवाहरलाल नेहरु ने तो यहां तक कहा कि सहकारिता को ही राष्ट्र के विकास का मुख्य आधार बनाया जाए। विश्व स्तर पर भारत में सहकारिता के प्रतीक के रूप में इंडियन काफी हॉऊस व दूध के कोऑपरेटिव सामने आए।

अनुमान है कि भारत में सब स्तरों पर स्थापित सहकारिता उपक्रमों की संख्या 4 लाख से ऊपर है, जबकि इनके कुल सदस्यों की संख्या 20 करोड़ का आंकड़ा पार कर रही है। पर इन आंकड़ों में अतिश्योक्ति भी हो सकती है क्योंकि अनेक सहकारी समितियां निष्क्रिय हैं व बड़ी संख्या में सदस्य भी बस नाम मात्र के ही सदस्य हैं।

एक अन्य समस्या भ्रष्टाचार की है। भारत में हैंडलूम जुलाहों की भलाई के लिए सहकारी समितियों को एक मुख्य आधार बनाया गया था व कुछ जगहों पर यह सहकारिता समितियां काफी सफल रही हैं। पर वाराणसी जैसे रेशम हैंडलूम के बड़े केंद्र में कई सहकारी समितियों पर निहित स्वार्थों ने कब्जा जमा लिया व उनका इस तरह से दोहन निजी लाभ के लिए किया कि जुलाहे इन सहकारी समितियों को भंग करने की मांग करने लगे। अनेक समितियों से समय-समय पर भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलती रहती हैं।

एक समस्या यह है कि जहां अमीर-गरीब की खाई अधिक होती है वहां इस विषमता से सहकारी समितियां भी प्रभावित होती हैं। हमारे जिन गांवों में विषमता अधिक है, वहां स्थापित सहकारी समितियों पर बड़े भूस्वामियों ने अपना वर्चस्व जमा लिया व उन्होंने ही उनका अधिक लाभ प्राप्त किया। दूध और गन्ना उत्पादन के क्षेत्रों में सहकारिता अधिक फैली है पर इसका लाभ छोटे किसानों व पशुपालकों तक कम पहुंचा है।

अत: यह जरूरी है कि विषमता और भ्रष्टाचार को दूर करने के प्रयास भी मजबूत होने चाहिए। इस तरह की कुछ समस्याओं के बावजूद यह विश्वास से कहा जा सकता है कि सहकारिता के प्रचलित मॉडल में कुछ सुधार करते हुए यदि आगे बढ़ा जाए तो इसका भविष्य उज्ज्वल है। विकास के विभिन्न क्षेत्रों में सहकारिता को आगे बढ़ाने की संभावनाओं को बेहतर ढंग से तलाशना चाहिए।

 

- भारत डोगरा

साभारः नवभारत टाइम्स