भारतीय उदारवादी और रंगीन तस्वीर

मैंने बेंगलूरु के बाहरी इलाके में उदारवाद पर एक परिचर्चा में दो दिन (13 से 15 जून 2010) बिताए थे। रात हम वातानुकूलित तंबू में बिताते थे और फिर दिन में कांफ्रेंस रुम में जमा होकर भारतीय उदारवाद की परिभाषा, औचित्य और गुंजाइश जैसे भारी-भरकम विषयों पर चर्चा करते थे। अपने साथ मौजूद लोगों के बुद्धिमानी के स्तर को देखकर मैं हैरत में पड़ गया - लेकिन साथ ही, फिज़ा में उसी किस्म के आपसी असहमति के स्वर थे, जैसे कि आमतौर पर वातानुकूलित तंबुओं में रहने के बाद होते हैं।

शुरुआत के लिए, ‘भारतीय उदारवाद’ क्या है? शब्द ‘उदार’ मूल अर्थ से इतना ज्यादा हट चुका है और इतनी विविधता के साथ इस्तेमाल हो विचलित हो चुका है कि इसने अपना मूल अर्थ ही खो दिया है। मैं अपने आपको एक परंपरागत उदारवादी मानता हूं, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विरोध के अधिकार और मुक्त समाज में यकीन रखता है। जैसी कि यूरोपीय महाद्वीप के उदारवादियों की अपने बारे में सोच होती है। फिर भी, अमेरिका में, इसका अर्थ ठीक उल्टा होता है, जैसे कि अमेरिकी उदारवादी, वामपंथ से जुड़े, मुक्त बाजार के खिलाफ हैं, जो इस शब्द को ही विरोधाभासी बना देता है। (मेरे कुछ दोस्त तो इससे ‘निरा मूर्खतापूर्ण’ करार देते हैं)।

भारत में इसे एक अनिश्चित शब्द के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और इस बात को लेकर आप निश्चिंत नहीं हो सकते कि आखिर इस के मायने क्या है। रामचंद्र गुहा अपने निबंध ‘द एबसेंट लिबरल’ में पी.सी.महालानोबिस को उदारवादी करार कर चुके हैं और हमारे साथ कांफ्रेंस से पहले चर्चा में जवाहरलाल नेहरु के लिए भी ऐसा ही कह चुके हैं। लोगों का नामकरण एक जटिल मामला है, खासतौर पर तब जब वे राजनीतिज्ञ हों या फिर बहुआयामी व्यक्तित्व वाले हों। ऐसे में नामकरण बहुधा सही भी होता है और गलत भी। यह परिप्रेक्ष्य पर निर्भर करता है, जैसा कि नेहरु (संस्थाओं का निर्माण और लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता पर जोर उनको उदारवादी के तौर पर दर्शाता है, लेकिन उनकी आर्थिक नीतियां, जिन्होंने भारत को बर्बाद कर दिया, ऐसा नहीं करतीं) के मामले में देखने को मिलता है।

कांफ्रेंस में मौजूद लगभग हम सभी परंपरागत उदारवादी थे, एक ऐसी दुनिया में कैद जहां या तो हमारी मान्यताओं को स्वीकार नहीं किया गया या फिर उन पर सवालिया निशान लगाए जा रहे हों। कांफ्रेंस में चर्चा का मुख्य विषय था कि उदारवादी सोच का प्रचार कैसे किया जाए और यह काम कई कारणों से काफी मुश्किल दिख रहा था। पहली बात, उदारवाद के सभी परंपरागत सच सहज ज्ञान के विपरीत, जैसे प्रगति में शामिल न नफा-न नुकसान से परे की स्थिति, सहज आदेश की सोच और सभी मनुष्यों की गलतियां करने की संभावना-इस संदर्भ में अंतिम महत्वपूर्ण हो जाता है, खासकर के सरकार में हमारे विश्वास को देखते हुए। जो कि हमेशा ही दोषपूर्ण लोगों का समूह होती है, जिनके इरादे ठीक नहीं होते।

दूसरा, आर्थिक उदारवाद उन लोगों के बढ़ते हमलों का शिकार हो रहा है, जो अमेरिकी आर्थिक संकट का ठीकरा मुक्त बाजार की नाकामी के सिर फोड़ते हैं या इस बात पर हैरानी जताते हैं कि इतना उदार होने के बाद भी भारत में इतनी असमानता क्यों मौजूद हैं।

इस तरह के हमलों का जवाब भी गंभीर और सम्मानजनक होना चाहिए, लेकिन मुझे अपने आस-पास मीडिया में ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं देता। इस बात पर भी विचार साझा करुंगा कि आखिर आर्थिक संकट या भारत में मौजूद असमानताओं की वजह मुक्त बाजार की नाकामी क्यों नहीं है। लेकिन, फिलहाल तो परिचर्चा के विषय पर लौट आएं कि कैसे हम परंपरागत उदारवाद की सोच का भारत में प्रसार कर सकते हैं?

मेरे परिचर्चा के कुछ साथियों ने स्वतंत्र पार्टी का हवाला दिया और यह जानने की कोशिश करने लगे कि क्या राजनीति में उस तरह की परंपरागत उदारवादी पार्टी को कुछ समर्थन मिल सकता है। जो प्रयास कर रहे हैं उन्हें और शक्ति मिले, लेकिन मेरी राय में, ऐसी पार्टी बस एक सपना ही है और समय की बर्बादी भी (मेरे विचार हमेशा से ऐसे नहीं थे)। एक राजनीतिक दल शुरुआत उदारवाद से कर सकता है, लेकिन राजनीति के कई अनिवार्य समझौते उसके किसी भी वैचारिक रुख को कमजोर करते जाएंगे, तब तक जब तक कि उसमें और पहले से मौजूद अन्य राजनीतिक दलों मे कोई अंतर बाकी नहीं रहेगा। जो सभी राजनीति के बाजार की अनिवार्यताओं की गुलाम हैं। जहां मौके विचारधारा से ज्यादा पहचान से हासिल किए जाते हैं।

इसकी बजाय मेरी राय में, परंपरागत उदारवादियों को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए, हम क्यों उदारवादी हैं? मेरे लिए, जवाब केवल इतना नहीं है कि उदारवाद मुझे ऐसा बौद्धिक ढांचा देता है, जिससे मैं दुनिया को समझ सकूं बल्कि यह भी है कि यह मुझे दुनिया और भारत के सामने मौजूद ढेर सारी समस्याओं का हल भी बता सकता है। विदर्भ के किसानों की आत्महत्या, बढ़ते दामों से लेकर बढ़ती असमानता तक। अगर मामला यह है और मेरे उदारवादी होने की वजह इसकी उपयोगिता है तो मुझे केवल उदारवाद को ही प्रोत्साहित करने की जरुरत नहीं है। बल्कि जरुरत है कि आज की दुनिया की मौजूदा समस्याओं को जल्द से जल्द हल करने के तरीके बता सकूं, इस बात के फेर में पड़े बगैर कि वे उदारवाद से जुड़ी हैं या नहीं बल्कि इस आधार पर कि वे सही हैं या गलत। तब मैं किसी भी एक छाप से बच सकूंगा और मेरा पूरा ध्यान वास्तविक दुनिया की समस्याओं के हल पर होगा। वह समस्याएं जो दुनिया को लेकर हमारी काल्पनिक सोच के कारण हमें दिखाई नहीं देती।

अगर मामला यह है तो हमें उदारवादी सोच के प्रचार के लिए अलग राजनीतिक दल की जरुरत नहीं है। इसकी बजाय हम दुनिया को बेहतर बनाने के लिए व्यावहारिक रास्ते बताएं तो हमारे विचार अपने आप प्रत्येक राजनीतिक पार्टी में पैठ बना लेंगे। तब उदारवाद विचारों के बाजार में जीत हासिल करके राजनीतिक युद्धक्षेत्र में भी जीत हासिल कर लेगा। वह भी बिना किसी नामकरण के, क्योंकि अच्छे विचार विचारधारा की छाप लग जाने के कारण अधिकांशतया प्रचारित ही नहीं हो पाते।

ऐसी ही वास्तविक जीवन की समस्या हल करने का एक अच्छा उदाहरण सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के संस्थापक पार्थ शाह के काम में देखने को मिलता है। वे ही इस परिचर्चा के प्रमुख थे। पार्थ और उनकी टीम कई सालों से स्कूल वाउचर की संकल्पना को प्रोत्साहित करते आ रहे हैं। कई हठधर्मी उदारवादी इस सोच का विरोध करेंगे, क्योंकि यह शिक्षा पर सरकार के खर्च पर आधारित है। लेकिन भारत एक गरीब देश है, शिक्षा हमारी प्रगति की कुंजी है और यह स्वीकार्य है कि सरकार प्रगति के लिए धन खर्च करेगी। यहां समस्या यह है कि हमारी सरकार, पिछले 63 साल से भी ज्यादा समय से, इस मामले में बहुत कम प्रगति कर पाई है। वह कैसे अपने धन को ज्यादा कुशलतापूर्वक खर्च कर सकती है?

मूलतः मिल्टन फ्रीडमैन की सोच स्कूल वाउचर, प्रतिस्पर्धा और मुक्त बाजार को शिक्षा का स्तर उठाने में मदद करते हैं। सरकारी स्कूलों का स्तर आधारहीन है, शिक्षकों की अनुपस्थिति एक स्थायी समस्या है और प्रोत्साहन के तमाम तरीके राह से भटके हुए हैं। इस प्रोत्साहन को बदलने का एक तरीका है जवाबदेहीः फंड छात्रों को दें, स्कूलों को नहीं। अगर छात्रों को स्कूल वाउचर दिए जाते हैं तो वे हर उस स्कूल में प्रवेश ले सकते हैं, निजी या सरकारी, जो उनकी राय में उन्हें बेहतर शिक्षा दे सकता है। ऐसे में अस्तित्व बनाए रखने के लिए स्कूलों को अपना स्तर उठाना ही होगा। सारे सूत्र एकाएक छात्रों और उनके माता-पिता के हाथों में आ जाते हैं और शिक्षा का स्तर अपने-आप ही ऊंचा उठ जाता है।

कहीं दूर बैठकर अखबारों में स्कूल वाउचर के बारे में लेखन और नीति की चर्चा की बजाय पार्थ और उनके सीसीएस गैंग ने देश भर में राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों से सीधा संवाद साधकर इसे हकीकत बना दिया। इसे लागू करने के लिए उन्होंने वास्तविक हल बताए और साथ ही यह अध्ययन भी किया कि किस तरह से कम लागत वाले निजी स्कूल गरीबों के लिए शिक्षा के मायने ही बदल रहे हैं। पहले से ही मौजूद प्रायोगिक परियोजनाओं और उनसे आ रहे परिवर्तनों को जानने के लिए उनकी वेबसाइट को देखें। (साथ ही, यहां मेरे इस बारे में पहले के लेख भी हैं-1, 2)

परिचर्चा में शिरकत करने वाले एक और भागीदार राज चेरूबल ने मुझे बताया कि किस तरह से उदारवादी ‘रंगीन तस्वीर’ से सबकुछ बदल सकते हैं।

चेरूबल, चेन्नई सिटी कनेक्ट में समन्वयक के तौर पर काम करते हैं। उनका यह मानना है कि राजनीतिज्ञ और नौकरशाह, जो हठधर्मी उदारवादियों द्वारा अधिकांश बार खलनायक के तौर पर पेश किए जाते हैं, अधिकांशतया हमारे साथ होते हैं। साथ ही वे समस्या की प्रकृति को लेकर हमसे सहमत भी होते हैं। लेकिन अगर हम उन्हें अव्यावहारिक और अमूर्त सुझाव दें कि उन्हें क्या करना है तो उनके पास इसे आगे ले जाने जितनी सोच नहीं होती। सबसे प्रभावी तरीका दोमुंहा है- पहला, उन्हें उदाहरण देकर समझाएं कि हमारे प्रयास किस तरह के कारगर साबित हुए हैं और दूसरा, उन्हें इसे हासिल करने के तौर-तरीके का खुलास पूरे विस्तार के साथ दें।

राज ने शहरी योजना के लिहाज से एक उदाहरण भी दिया। उनकी टीम एलबी रोड को आधुनिक बनाने के प्रस्ताव के साथ चेन्नई के शहरी विकास अधिकारियों के पास गई। जैसा कि होता है अधिकारी उलझन में पड़ गए और उन्होंने इसे लेकर ढेर सारी आपत्तियां उठाईं, जैसे वहां यह काम करने के लए पर्याप्त जगह ही नहीं है, फेरीवालों का क्या होगा... आदि आदि। चेरूबल और उनकी टीम ने उसके बाद सड़क का दौरा किया और कोने-कोने को नाप डाला। इसके बाद योजना का रंग-बिरंगा (फुटपाथ को लाल रंग) चार्ट तैयार किया, जिसमें साफ तौर पर बताया गया था कि सड़क का उद्धार होने के बाद यह कैसी दिखेगी, फिलहाल कितनी जगह बेकार जा रही है और साथ ही यह भी बताया कि इस जगह के इस्तेमाल के लिए क्या किया जा सकता है। यहां तक कि लागत का भी उल्लेख इसमें किया गया था। परियोजना मंजूर हो गई और अब इस पर काम चल रहा है। किस बात ने काम आसान किया, राज की मानें तो ‘रंगीन तस्वीर।’

टी नगर के इलाके को बदलने के लिए इसी तरह के प्रस्ताव का जिक्र करते हुए राज की टीम ने चेन्नई के अधिकारियों को बोगोटा और मैनहटन में मौजूद इसी तरह की गलियां बताकर समझाया कि किस तरह से ठीक उतनी ही जगह वाली चेन्नई की गलियों को बदला जा सकता है। (राज मुझे बताते हैं कि टी नगर का पानागल पार्क, मैनहटन के यूनियन स्क्वेयर की तरह हो सकता है)। फिर एक बार रंगीन तस्वीरों ने सबकुछ संभव कर दिया।

राज ‘रंगीन तस्वीर’ शब्द को रुपक और प्रतिनिधि की तरह इस्तेमाल करते हैं। दरअसल उन्होंने इन लोगों को जो दिखाया था वह था ‘बेहतर भविष्य का दृष्टिकोण’, उन्होंने इसे आकर्षक और मूर्त रुप दे दिया था, जहां भव्य विचारों को लेकर दिमाग में आशंकाओं के बादलो के लिए कोई भी जगह नहीं थी। अगर सैद्धांतिक तौर पर बात की जाए तो यह भारत में परंपरागत उदारवादी सोच के उदाहरण नहीं कहे जा सकते, लेकिन यही वह तरीका है जिसे भारत में परंपरागत उदारवादियों को अपनाना चाहिए। बड़ी-बड़ी बातों को तिलांजली दे दें, मैदान में उतर आएं, रंगीन तस्वीरों को बाहर निकालें।

- अमित वर्मा