निर्यात बाजार की चुनौतियां

पिछले तीन-चार वर्षों में अमेरिका और यूरोप को भारत से होने वाले निर्यात की रफ्तार धीमी हुई है. ऐसे में भारत द्वारा नए निर्यात बाजार खोजे जा रहे हैं. इसी परिप्रेक्ष्य में मई 2011 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अफ्रीकी देशों की यात्रा की. उन्होंने अदीस अबाबा में आयोजित अफ्रीका-भारत फोरम के शिखर सम्मेलन में 15 अफ्रीकी देशों के लिए पांच अरब डॉलर के कर्ज की घोषणा की और अफ्रीकी देशों से कारोबारी संबंध बढ़ाने की संभावनाएं तलाशने की दिशा में कदम आगे बढ़ाए.

माना जा रहा है कि अफ्रीकी देश निर्यात के बड़े बाजार हैं. अफ्रीकी बाजार में लंबे समय से पांव जमाए चीन, फ्रांस, अमेरिका और रूस अफ्रीका में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और निर्यात के लिए नए सिरे से रणनीति बना रहे हैं. भारत के लिए भी अफ्रीका ऐसा बाजार है, जहां से भारत को कच्चा माल मिल सकता है और अफ्रीका तैयार माल का बड़ा बाजार भी बन सकता है. इतना ही नहीं, भारत अफ्रीकी देशों में अपनी पहुंच बढ़ाकर कई ऐसी परियोजनाएं विकसित करने में मदद कर सकता है, जो अफ्रीकी देशों के आर्थिक विकास को रफ्तार दे सकती हैं. वस्तुत: आज उद्योग-व्यवसाय की दृष्टि से अफ्रीका उस स्थिति में है, जहां भारत 1990 में था. अफ्रीका अब आर्थिक तरक्की और विकास के रास्ते पर है. यहां नौकरशाही का हस्तक्षेप कम है. साथ ही श्रम और बिजली भी सस्ती है. लिहाजा, उत्पादन की लागत काफी कम है. अफ्रीकी बाजार में फिलहाल अधिक प्रतिस्पर्द्धा नहीं है. ऊंचे लाभ का पूरा अवसर है. अफ्रीकी बाजार में भारतीय कंपनियों के पांव पहले से जमे हुए हैं. नए और बड़े मौके की तलाश में भारत की नई कंपनियां भी इस बाजार की ओर रुख कर रही हैं.

भारत ब्रिक्स देशों में भी निर्यात की नई संभावनाओं को आगे बढ़ा रहा है. इस समय ब्रिक्स देशों के गठजोड़ की चमकीली आर्थिक अहमियत दिखाई दे रही है. गौरतलब है कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ दक्षिण अफ्रीका को शामिल कर लिए जाने के बाद ब्रिक्स की मुट्ठी में दुनिया की 43 फीसद आबादी और वैश्विक जीडीपी का 25 फीसद हिस्सा है. ब्रिक्स देश दुनिया के ग्रोथ इंजन माने जा रहे हैं. आपसी व्यापारिक हितों के साथ अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मोर्चों पर भी निर्यात के परिप्रेक्ष्य में ब्रिक्स देशों की प्रभावी भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है.

निश्चित रूप से अमेरिका और यूरोप के परंपरागत बाजार और अफ्रीका सहित ब्रिक्स देशों में भारत से निर्यात बढ़ाने की डगर पर चीन एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने खड़ा है. भारत को चीन से मिल रही चुनौतियों को ध्यान में रखना होगा. निस्संदेह चीन का आंतरिक व्यापार और निर्यात भारत की तुलना में बहुत ज्यादा है. जहां विश्व निर्यात में भारत का हिस्सा एक फीसद है, वहीं चीन का हिस्सा दस फीसद है. चीन में श्रम भारत से बहुत सस्ता है. वह भारत से 30 फीसद कम लागत पर औद्योगिक उत्पादन कर लेता है. चीन ने अपने सस्ते उत्पादों से पूरे अंतरराष्ट्रीय बाजार को पाट दिया है. भारतीय कंपनियों के लिए अफ्रीकी बाजार में चीनी कंपनियों से निर्यात मोर्चे पर कड़ी चुनौती का अनुमान भारत और चीन द्वारा अफ्रीका को किए गए निर्यात मूल्य से भी लगाया जा सकता है. वर्ष 2008 में चीन और अफ्रीका के बीच कारोबार 108 अरब डॉलर था जबकि इसी साल भारत और अफ्रीका के बीच कारोबार महज 30 अरब डॉलर का था.

इसमें दो मत नहीं है कि अफ्रीका में निर्यात के लिहाज से चीन भारत से काफी आगे है. कई अफ्रीकी देशों में चीन इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में वह काफी धन खर्च कर रहा है और बदले में कच्चे माल तक उसकी पहुंच बढ़ रही है. हालांकि विदेश व्यापार एवं निर्यात के मोर्चे पर भारत के लिए भी उजली संभावनाएं आकार ले रही हैं. आईटी, बीपीओ, फार्मास्युटिकल्स, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स एवं धातु क्षेत्र में दुनिया की जानी-मानी कंपनियां हैं. भारत दवा निर्माण, रसायन निर्माण और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में सबसे तेजी से उभरता हुआ देश है. चीन के विद्यार्थियों की कमजोर अंग्रेजी की तुलना में भारतीयों की अच्छी अंग्रेजी विकास की संभावनाओं को बढ़ाते हुए दिखाई दे रही है.

इन सबके बावजूद अफ्रीका एवं ब्रिक्स देशों में भारत को चीन से आगे निकलने के लिए कई बातों पर ध्यान देना होगा. गुणवत्तापूर्ण एवं विशिष्ट तकनीकी शिक्षा को आगे बढ़ाना होगा. सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ढांचागत और भौतिक सुविधाएं विकसित करनी होंगी. संचार सम्पर्क सरल और सुचारू बनाए जाने होंगे. साथ ही भारत को कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने वाले देश के रूप में बाजार पहचान बनानी होगी.-स्निग्धा द्विवेदी