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दुनिया में कोरोना वायरस का तांडव लगातार जारी है। दुनिया में अबतक लगभग चार करोड़ लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं जबकि 11.15 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। जनसंख्या के हिसाब से दूसरा सबसे बड़ा देश भारत भी इस प्रकोप से बुरी तरह प्रभावित है। अब तक देश में 75 लाख लोग इस संक्रमण से ग्रसित हो चुके हैं और 1.15 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। पिछले 100 साल के इतिहास में इसे सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में देखा जा रहा है। कुल मौतों के हिसाब से भारत अमेरिका (2,24,282) और ब्राजील (1,53,690) के बाद तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। जबकि संक्रमित लोगों

पेट्रोल-डीजल पर सब्सिडी के रूप में प्रतिवर्ष खर्च होने वाली भारी धनराशि से निजात पाने और तेल कंपनियों को होने वाले घाटे से उबारने के लिए भारत सरकार ने वर्ष २०१० में पेट्रोल की कीमतों को विनियमित करने यानी बाजार के हवाले करने का फैसला किया। कीमतों को विनियमित करने से तात्पर्य तेल कंपनियों को वैश्विक दर के हिसाब से देश में तेल की कीमतों को कम या अधिक करने की आज़ादी प्रदान करना और सरकारी हस्तक्षेप को कम करना था। इस फैसले का एक अलिखित उद्देश्य पेट्रोल की कीमतों के राजनीतिकरण को रोकना भी था। सरकार के इस फैसले के बाद पेट्रोल की कीमतों में शुरुआती ब

कोरोना महामारी से मंद पड़ी कारोबार की रफ्तार की तेज करने के लिए हरियाणा सरकार जिला स्तर पर तैनात नोडल अफसरों को और अधिक शक्तियां प्रदान करने जा रही हैं। राज्य को उम्मीद है कि कारोबार की सुगमता बढ़ाए जाने से जहां राज्य में निवेश के द्वार खुलेंगे वहीं कोरोना काल में गिरे राजस्व संग्रह में भी सुधार की संभावना बढ़ेगी। अभी तक नए निवेश के लिए सीएलयू, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मंजूरी व बिजली कनेक्शन से लेकर 20 से अधिक विभागों की 80 तरह की मंजूरियां  चंडीगढ़ स्थित हरियाणा उद्यम प्रोत्साहन केन्द्र से दी जाती हैं। अब ये मंजूरियां जिला स्तर पर ही जिला उद्योग केंद्रों में तैनात नोडल

कोरोना महामारी के कारण देश की अर्थव्यवस्था को लगे तगड़े झटके से उबारने के प्रयास के तहत वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण सुधार की तमाम घोषणाएं कर रही हैं। इसी क्रम में उन्होंने कृषि क्षेत्र में सुधार की भी कई घोषणाएं की हैं। इन सुधारों में किसानों को अपने उत्पाद अपने मर्जी की कीमत पर देश में कहीं भी बेचने की आजादी और एपीएमसी ऐक्ट के प्रावधानों से मुक्त करने घोषणाएं मुख्य हैं। 

कृषि के क्षेत्र में सुधार के वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की योजनाओं और सपनों को साकार करने का हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री जे. पी. दलाल का क्या है प्लान! देखें सेंटर फ़ॉर सिविल सोसायटी के सीईओ यतीश राजावत के साथ.. एक्स्क्लुसिव www.azadi.me/video पर

कृषि कर्ज माफी का जो आंकड़ा है वह उद्योग जगत के कुल एनपीए के बराबर पहुंच गया है। यानि कि पिछले दस वर्षों में केंद्र व राज्य स्तर पर किसानों की कर्ज माफी के रूप में कुल 4.7 लाख करोड़ रूपए माफ किए गए हैं। हालांकि इतना सब होने के बावजूद किसानों की समस्या एक लाइलाज रोग की तरह अब भी मौजूद है। आए दिन किसान धरना दे रहे हैं या मौत को गले लगाने को मजबूर हो रहे हैं। आखिर क्या है किसानों की समस्याओं का इलाज!

आजादी पॉडकास्ट के इस एपिसोड में होस्ट अविनाश चंद्रा, संपादक, azadi.me और हरवीर सिंह, संपादक, आउटलुक पत्रिका, बातचीत करते हैं कृषि में संकट और उसके समाधान के बारे में।

जीएम टेक्नोलॉजी पूरी दुनिया के किसानों के लिए वरदान साबित हुई है। फिर भी, भारत की सरकारें इस तकनीकि के फायदों को समझने में असफल रही है और किसानों को इस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से वंचित रखा है।

  • गरीबी को खत्म करने के अभी तक सुने गए प्रस्तावों में सबसे आसान एक एनजीओ में काम करने वाले एक दोस्त की ओर से आया। क्यों न हम न्यूनतम वेतन को इतना बढ़ा दें कि सभी लोग गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएं? यह कितना आसान लगता है मनोहारी और दर्दरहित। अफसोस, यह नाकाम रहेगा क्योंकि हमारे यहां एक ऐसा कानून है जिसका परिणाम अनपेक्षित है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

वित्तमंत्री ने खतरा न उठाकर संजीदगी दिखाई, संरक्षणवाद को पलटने में नाकाम रहीं

हमारी जैसी मंदी से निपटने के केवल दो ही तरीके हैं। एक उपभोग के जरिए और दूसरा निवेश के माध्यम से। इस बजट में दूसरा तरीका अपनाया गया है और मेरे विचार में यह सही रास्ता है। उपभोग के पहले तरीके में लोगों के हाथों में बैंक ट्रांसफर के माध्यम से पैसा देना पड़ता। वे पैसा खर्च करते, सामान इस्तेमाल करते और मांग को बढ़ाते, जिससे फैक्टरियां चलतीं और अधिक नौकरियां आतीं, जिससे और खर्च बढ़ता। इस चक्र के चलने से अर्थव्यवस्था में गति आ जाती। 

Author: 
गुरचरण दास

बाजार, नागरिक समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। बाजार का उद्भव का कारण ही यह है कि मनुष्य व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले कार्य की तुलना में अन्य लोगों के सहयोग से ज्यादा हासिल कर सकता है और इसका अनुभव भी किया जा सकता है। यदि हम ऐसे प्राणी होते जिसके लिए व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले कार्यों की तुलना में सहकारिता के तहत किया जाने वाला कार्य ज्यादा उत्पादक नहीं होता, या फिर हम सहकारिता के लाभों को समझ पाने में असमर्थ होते तो हम अवश्य ही अलग थलग व एकाकी रहते। लेकिन इससे भी बुरा यह है जैसा कि लुडविंग वॉन माइसेस व्याख्या करते हैं, ‘प्रत्येक व्यक्ति

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