व्यापार

कृषि की दशा और किसानों की आर्थिक अवस्था में सुधार के उद्देश्य से देश में तीन नए कानून बनाए गए हैं। ये कानून हैं कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। सरकार के मुताबिक पहले विधेयक का उद्देश्य एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण करना है जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी से बाहर फसल बेचने और खरीदने की आज़ादी होगी। दूसरे विधेयक का उद्देश्य कृषि करारों के संबंध में एक राष्ट्रीय तंत्र की स्थापना करना है जहां कृषि उत्पादो

संतोष गानर महाराष्ट्र के तटीय इलाके में स्थित रायगढ़ में दो एकड़ जमीन के मालिक हैं। यह जगह अल्फांज़ो आम के लिए विख्यात है। इसके बावजूद उन्होंने अत्यधिक मुनाफा दिलाने वाले आम की बजाय सस्ता चावल उगाने का विकल्प चुना है। जब मैंने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें भी आम उगाना पसंद है। चावल की खेती से उन्हें प्रति एकड़ 30 हजार रूपये ही प्राप्त होते हैं जबकि आम उगाने से उन्हें इससे दस गुना अधिक आय हो सकती है। लेकिन वह इस काम के लिए आवश्यक आरंभिक निवेश को वहन नहीं कर सकते थे, न ही वे पेड़ से फल प्राप्त करने के लिए पांच साल तक की अ

एक पुरानी कहावत है - अमेरिकी लोगों की बुद्धिमता को कम आंक कर किसी का आर्थिक नुकसान नहीं हुआ अर्थात अमेरिकियों को आसानी से फुसलाकर पैसे कमाए जा सकते हैं। यदि आप इस पर आगे विचार करें तो उन्हें अधिक बुद्धिमान आंकना संभवतः ज्यादा कारगर होगा। यदि आप इस विषय पर और अधिक विचार करें तो पाएंगे कि ऐसी स्थिति सभी लोकतंत्रों के साथ है। और यदि आप में थोड़ा अधिक धैर्य है और आप और अधिक विचार करते हैं तो आप पाएंगे कि कहावत में ‘अमेरिकी लोगों’ के स्थान पर ‘भारतीय लोग’ ज्यादा सटीक बैठता है। विशेषकर वर्तमान में जारी उन बहसों के परिपेक्ष्य में जो बहु प्रतीक्षित,

केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ राजस्थान विधानसभा में तीन कृषि संशोधन विधेयक पारित किए गए हैं जिनका उद्देश्य इन कानूनों के राज्य के किसानों पर असर को निष्प्रभावी करना है। राजस्थान सरकार का कहना है कि इससे किसानों के हितों की रक्षा होगी और उनके लिए न्यूनतम आय सुनिश्चित होगी। लेकिन विधेयकों पर ध्यान देने से पता चलता है कि इसके प्रावधान किसानों की मदद करने की बजाए लंबे समय में उन्हें नुकसान ही पहुंचाएंगे।

पिछले 30 दिनों से देश की राजधानी दिल्ली को घेरे बैठे किसानों को हालिया कृषि सुधार कानूनों को रद्द करने के अतिरिक्त और कुछ भी मंजूर नहीं है। किसान यह तो मानते हैं कि उनके उपज के लिए एक से अधिक खरीददार का होना उनके हित में है, लेकिन उन्हें डर है कि सरकार यदि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और बाद में सरकारी मंडियों को यदि समाप्त कर देती है तो उनका क्या होगा?

देश में बिजनेस के क्षेत्र में आंत्रप्रेन्योरशिप की तर्ज पर कृषि के क्षेत्र में फार्मप्रेन्योरशिप को बढ़ावा देने की सख्त जरूरत है। एमएसपी और उसकी दर को लेकर राजनीति और विवाद हमेशा चलते रहेंगे लेकिन यदि समस्या का हमेशा के लिए समाधान तलाशना है तो इस क्षेत्र में भी उद्यमिता को बढ़ावा देना अत्यंत जरूरी है। ऐसा कृषि कार्य में तकनीक और उद्यमिता का मेल करके किया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इस देश में किसान को अबतक बाजार का विश्लेषण करने और उसके आधार पर जोखिम लेते हुए फसल पैदा करने और बाजार में बेचकर उसका पुरस्कार प्राप्त करने में अक्षम म

आज किसानों को अन्नदाता की भूमिका से निकालकर फार्मप्रेन्योर यानी कृषि उद्यमी बनाने और खेती को मुनाफे की वृति बनाने के लिए तमाम जतन किये जा रहे हैं। इसके लिए अनेक नीतियां बनाई जा रही हैं। हालांकि देश में बहुत सारे फार्मप्रेन्योर पहले से ही नई तकनीक और गैर परंपरागत फसलों की मदद से न केवल जबर्दस्त मुनाफा कमा रहे हैं बल्कि अन्य लोगों को इस क्षेत्र में आने और लाभ कमाने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं। ऐसे ही एक फार्मप्रेन्योर हैं सुधांशु कुमार जो कि बिहार के समस्तीपुर के एक छोटे से गांव नयानगर से आते हैं। सुधांशु कुमार ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से ग्रेजुएट

वर्ष 1947 में भारत को एक विदेशी ताकत से राजनीतिक आजादी मिली थी और 1991 में भारत ने भारतीय राज्य से आर्थिक आजादी हासिल की। राजनीतिक आजादी के साथ सबको मताधिकार मिला और सभी नागरिक बराबर के भागीदार बने। बदकिस्मती से, 1991 में मिली आर्थिक आजादी का फायदा सभी नागरिकों को नहीं मिला। इसने मुख्य रुप से औपचारिक औद्योगिक क्षेत्र को लाइसेंस-परमिट-कोटा राज से मुक्ति दिलायी। आर्थिक सुधारों के दायरे में आबादी का एक बड़ा हिस्सा नहीं आया जो अपनी आजीविका औपचारिक औद्योगिक क्षेत्र के बाहर कमाता था। भारतीय समाज के सबसे निचले तबके को किसी तरह की आर्थिक आजादी नहीं म

- सुधारों को आत्मसात करना किसानों के हित में
- तीनों कानूनों को वापस लेने से कम कुछ भी मंजूर नहीं वाला रुख किसानों के लिए नुकसानदायक

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