व्यापार

कोरोना महामारी के कारण देश की अर्थव्यवस्था को लगे तगड़े झटके से उबारने के प्रयास के तहत वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण सुधार की तमाम घोषणाएं कर रही हैं। इसी क्रम में उन्होंने कृषि क्षेत्र में सुधार की भी कई घोषणाएं की हैं। इन सुधारों में किसानों को अपने उत्पाद अपने मर्जी की कीमत पर देश में कहीं भी बेचने की आजादी और एपीएमसी ऐक्ट के प्रावधानों से मुक्त करने घोषणाएं मुख्य हैं। 

कृषि के क्षेत्र में सुधार के वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की योजनाओं और सपनों को साकार करने का हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री जे. पी. दलाल का क्या है प्लान! देखें सेंटर फ़ॉर सिविल सोसायटी के सीईओ यतीश राजावत के साथ.. एक्स्क्लुसिव www.azadi.me/video पर

कृषि कर्ज माफी का जो आंकड़ा है वह उद्योग जगत के कुल एनपीए के बराबर पहुंच गया है। यानि कि पिछले दस वर्षों में केंद्र व राज्य स्तर पर किसानों की कर्ज माफी के रूप में कुल 4.7 लाख करोड़ रूपए माफ किए गए हैं। हालांकि इतना सब होने के बावजूद किसानों की समस्या एक लाइलाज रोग की तरह अब भी मौजूद है। आए दिन किसान धरना दे रहे हैं या मौत को गले लगाने को मजबूर हो रहे हैं। आखिर क्या है किसानों की समस्याओं का इलाज!

आजादी पॉडकास्ट के इस एपिसोड में होस्ट अविनाश चंद्रा, संपादक, azadi.me और हरवीर सिंह, संपादक, आउटलुक पत्रिका, बातचीत करते हैं कृषि में संकट और उसके समाधान के बारे में।

जीएम टेक्नोलॉजी पूरी दुनिया के किसानों के लिए वरदान साबित हुई है। फिर भी, भारत की सरकारें इस तकनीकि के फायदों को समझने में असफल रही है और किसानों को इस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से वंचित रखा है।

  • गरीबी को खत्म करने के अभी तक सुने गए प्रस्तावों में सबसे आसान एक एनजीओ में काम करने वाले एक दोस्त की ओर से आया। क्यों न हम न्यूनतम वेतन को इतना बढ़ा दें कि सभी लोग गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएं? यह कितना आसान लगता है मनोहारी और दर्दरहित। अफसोस, यह नाकाम रहेगा क्योंकि हमारे यहां एक ऐसा कानून है जिसका परिणाम अनपेक्षित है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

वित्तमंत्री ने खतरा न उठाकर संजीदगी दिखाई, संरक्षणवाद को पलटने में नाकाम रहीं

हमारी जैसी मंदी से निपटने के केवल दो ही तरीके हैं। एक उपभोग के जरिए और दूसरा निवेश के माध्यम से। इस बजट में दूसरा तरीका अपनाया गया है और मेरे विचार में यह सही रास्ता है। उपभोग के पहले तरीके में लोगों के हाथों में बैंक ट्रांसफर के माध्यम से पैसा देना पड़ता। वे पैसा खर्च करते, सामान इस्तेमाल करते और मांग को बढ़ाते, जिससे फैक्टरियां चलतीं और अधिक नौकरियां आतीं, जिससे और खर्च बढ़ता। इस चक्र के चलने से अर्थव्यवस्था में गति आ जाती। 

Author: 
गुरचरण दास

बाजार, नागरिक समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। बाजार का उद्भव का कारण ही यह है कि मनुष्य व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले कार्य की तुलना में अन्य लोगों के सहयोग से ज्यादा हासिल कर सकता है और इसका अनुभव भी किया जा सकता है। यदि हम ऐसे प्राणी होते जिसके लिए व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले कार्यों की तुलना में सहकारिता के तहत किया जाने वाला कार्य ज्यादा उत्पादक नहीं होता, या फिर हम सहकारिता के लाभों को समझ पाने में असमर्थ होते तो हम अवश्य ही अलग थलग व एकाकी रहते। लेकिन इससे भी बुरा यह है जैसा कि लुडविंग वॉन माइसेस व्याख्या करते हैं, ‘प्रत्येक व्यक्ति

अर्थव्यवस्था में लेनदेन मुख्य रूप से उत्पादक और उपभोक्ता के बीच होता है। जैसे किसान सब्जी उगाता है और एक परिवार उसकी खपत करता है। यदि परिवार का कोई सदस्य गांव जाकर लौकी खरीदे तो कठिनाई होती है, इसलिए समाज ने मंडी और दुकानदार बनाए। अब यह काम इंटरनेट के जरिए होने लगा है। कई शहरों में लोगों ने सब्जी पहुंचाने की वेबसाइट बनाई है। आप सुबह अपना ऑर्डर बुक करा सकते हैं। साइट का मालिक मंडी से सब्जी लाकर सीधे आपके घर पहुंचा देगा। सब्जी पसंद न आए तो आप लौटा सकते हैं। दुकानदार और ठेले वालों की जरूरत नहीं रह गई है। इससे छोटे ही नहीं, बड़े विक्रेता भी संकट महसूस कर रहे हैं।

आस पास के रेहड़ी पटरी व्यवसायियों के पास आपका आना जाना अवश्य रहता होगा। रेहड़ी पटरी वाले ताजे फल-सब्जियों से लेकर हल्के फुल्क नाश्ते तक की हमारी दिन प्रतिदिन की सारी जरूरतों को पूरी करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नीतिगत अनिश्चितताओं के कारण अपनी आजीविका को लेकर प्रतिदिन उन्हें कितने जोखिमों का सामना करना पड़ता है?

देश के वर्तमान आर्थिक हालात को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यदि बैकिंग ढांचा पटरी पर आ गया तो अर्थव्यवस्था की गाड़ी को रफ्तार पकड़ने में ज्यादा देर नहीं लगेगी

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