कानून तथा न्यायपालिका

कृषि की दशा और किसानों की आर्थिक अवस्था में सुधार के उद्देश्य से देश में तीन नए कानून बनाए गए हैं। ये कानून हैं कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। सरकार के मुताबिक पहले विधेयक का उद्देश्य एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण करना है जहां किसानों और व्यापारियों को मंडी से बाहर फसल बेचने और खरीदने की आज़ादी होगी। दूसरे विधेयक का उद्देश्य कृषि करारों के संबंध में एक राष्ट्रीय तंत्र की स्थापना करना है जहां कृषि उत्पादो

एक पुरानी कहावत है - अमेरिकी लोगों की बुद्धिमता को कम आंक कर किसी का आर्थिक नुकसान नहीं हुआ अर्थात अमेरिकियों को आसानी से फुसलाकर पैसे कमाए जा सकते हैं। यदि आप इस पर आगे विचार करें तो उन्हें अधिक बुद्धिमान आंकना संभवतः ज्यादा कारगर होगा। यदि आप इस विषय पर और अधिक विचार करें तो पाएंगे कि ऐसी स्थिति सभी लोकतंत्रों के साथ है। और यदि आप में थोड़ा अधिक धैर्य है और आप और अधिक विचार करते हैं तो आप पाएंगे कि कहावत में ‘अमेरिकी लोगों’ के स्थान पर ‘भारतीय लोग’ ज्यादा सटीक बैठता है। विशेषकर वर्तमान में जारी उन बहसों के परिपेक्ष्य में जो बहु प्रतीक्षित,

- संसद में विस्तृत चर्चा की बजाए लाए गए अध्यादेश ने डाला डर का बीज
- पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा किसानों को दिखाए गए सब्ज़बाग की विफलता से डिगा है भरोसा
- भूमि सुधार और निजी सुरक्षा प्रदान करने के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ करने का है स्कोप

अर्थशास्त्री और लेखक गुरचरण दास कृषि क्षेत्र में सुधार के एक बड़े पैरोकार हैं और मोदी सरकार द्वारा लागू किये गए तीन नए कृषि क़ानूनों को काफ़ी हद तक सही मानते हैं. लेकिन 'इंडिया अनबाउंड' नाम की प्रसिद्ध किताब के लेखक के अनुसार प्रधानमंत्री किसानों तक सही पैग़ाम देने में नाकाम रहे हैं. वो कहते हैं कि नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिकेटर होने के बावजूद किसानों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल नहीं रहे.

Author: 
गुरचरण दास

कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग क्या है? खुद खेती करने वाले किसान ने बताई इसकी चुनौतियां, फायदे और नुकसान
गुणवंत समझाते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की यह प्रक्रिया कोई नई नहीं है। हम पहले से भी अपनी जमीन दूसरे को किराए पर देते रहे हैं। पहले मुंहजबानी काम होते आ रहे थे। अब कानून के तहत पूरी लिखा-पढ़ी के साथ होगी।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े जरूरी सवालों के जवाब

26 नवंबर यानी की राष्ट्रीय संविधान दिवस। इस दिन देश के समस्त नागरिकों विशेषकर युवाओं को संविधान और संविधान दिवस की महत्ता से अवगत कराने के लिये सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर तमाम कार्यक्रमों और गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। कुछ वर्षों से इस दिन को पुराने और अप्रासंगिक कानूनों के समापन के दिवस के तौर पर मनाने की मांग जोर पकड़ती जा रही है। इस मांग को अभियान का रूप देने के अगुआ के रूप में थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी का नाम सर्वप्रमुख है। इस विषय पर सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के एसोसिएट डायरेक्टर व सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत नारंग

26 नवंबर का दिन भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है। वर्ष 1949 में आज ही के दिन संविधान सभा ने देश के संविधान को स्वीकृत किया था। दो महीने बाद 26 जनवरी 1950 से यह पूरे देश में लागू हो गया। इस दिन की महत्ता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने वर्ष 1979 से इसे राष्ट्रीय कानून दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गजट नोटिफिकेशन के द्वारा इस दिन को संविधान दिवस के रूप में मनाए जाने की पहल की।

सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा प्रस्तुत आज़ादी पोडकास्ट के इस एपिसोड में हम चर्चा करेंगे देश में कानूनों की गुणवत्ता और उन्हें सुनिश्चित करने के तरीकों के बारे में। हम जानने की कोशिश करेंगे कि किस प्रकार कुछ प्रक्रियाओं को आत्मसात कर अच्छी नियत के साथ लागू किये गए कानूनों के अवांछनीय परिणामों से बचा जा सकता है। साथ ही हम इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर उठाए गए कदमों की भी पड़ताल करेंगें। इस महत्वपूर्ण चर्चा को होस्ट कर रहे हैं आज़ादी.मी के संपादक अविनाश चंद्र और वक्ता हैं थिंक टैंक  सेंटर फॉर सिविल सोसायटी की रिसर्च टीम से जुड़े एडवोकेट प्रशांत नारंग और जयना बेदी।

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