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सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा प्रस्तुत आज़ादी पोडकास्ट के इस एपिसोड में आज हम चर्चा करेंगे बहुचर्चित कृषि सुधार कानून 2020 पर। हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि इन सुधारात्मक कानूनों के बारे में आम किसान क्या सोचता है और क्या वास्तव में किसानों का कुछ भला होगा? इस महत्वपूर्ण विषय को होस्ट कर रहे हैं आज़ादी.मी के संपादक अविनाश चंद्र और वक्ता हैं गुनवंत पाटिल। गुनवंत पाटिल किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं और पेशे से इंजीनियर और पैशन से फिलांथ्रोपिस्ट हैं। पाटिल किसानों के सबसे बड़े संगठन शेतकरी संगठन से जुड़े हैं और स्वतंत्र भारत पक्ष नामक राजनैतिक संगठन के जनरल सेक्रेटरी भी हैं।
  • मनचाहे क्रेता को फसल बेचने की आज़ादी मिली, मनचाहे बीज से फसल उगाने की आज़ादी कब 
  • जीएम बीजों के इस्तेमाल की अनुमति के लिये किसान लंबे समय से कर रहे हैं मांग
  • खेती को लाभदायक बनाने के लिये लागत में कमी आवश्यक, एचटीबीटी हो सकता है कारगर

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति आने के बाद से ही आरंभिक शिक्षा का माध्यम क्या हो इसे लेकर बहस का दौर फिर से शुरु हो गया है। बहस इस बात पर है कि छात्रों को प्राथमिक शिक्षा स्थानीय भाषा में प्रदान करना ठीक होगा या मातृभाषा में या फिर हिंदी में!
 

जन्मदिन मुबारकः
प्रमुख भारतीय उदारवादी चिंतक हृदयनाथ कुंजरु का जन्म 1 अक्टूबर 1887 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित अयोध्या नाथ कुंजरु और माता का नाम जनकेश्वरी था। वह लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे और चार दशकों तक संसद और विभिन्न परिषदों को अपनी सेवाएं दी। वर्ष 1946 से 1950 तक वह उस कांस्टिटुएंट असेम्बली ऑफ इंडिया के सदस्य भी रहे जिसने भारत का संविधान तैयार किया था।

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रिश्वत देकर अयोग्य लोग शिक्षक बन गए, जब तक राज्य सरकारें इस समस्या का हल नहीं करतीं, तब तक कोई नीति बच्चों का भविष्य नहीं संवार सकती

1947 में इंग्लैंड ने भारत छोड़ दिया, लेकिन वे अपने पीछे अंग्रेजी भाषा और भारतीयों के लिए सिरदर्द भी छोड़ गए। तब से हम अंग्रेजी के अपनी जिंदगी में स्थान को लेकर लड़ रहे हैं। विशेषकर, इस बात पर कि अपने बच्चों को किस भाषा में पढ़ाएं। 

Author: 
गुरचरण दास

“बाजार की असफलता” शब्दावली का ज्यादातर इस्तेमाल राजनेता, पत्रकार, विश्वविद्यालय और अर्थशास्त्र के उच्च श्रेणी के छात्र और शिक्षक करते हैं। हालांकि जो लोग इस शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, प्रायः उन्हें इस बात की बिल्कुल समझ नहीं होती है कि सरकार के पास इस संकट को दूर करने की कितनी क्षमता है। ऐसा मुख्य रूप से सामान्य ज्ञान की कमी और सार्वजनिक चयन वाले अर्थशास्त्र के प्रति अनभिज्ञता के कारण होता है। इसकी वजह से सामान्य बातों और आर्थिक मुद्दों को वह सार्वजनिक चयन सिद्धांत के नजरिए से नहीं देख पाते हैं।

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मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।
मैं सज्जा हूँ, मैं जीवन हूँ। मैं भावों का दर्पण हूँ।।
मैं अमृत हूँ, मैं संगत हूँ। मैं प्रेम की चिर यौवन हूँ।।
मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।

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दुनिया भर में 67 करोड़ लोगों के द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली ‘हिंदी’ विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। मैंड्रिन (चीनी) और अंग्रेजी का स्थान क्रमशः पहला और दूसरा है। दुनिया भर में एक ओर जहां तमाम भाषाएं विलुप्त हो रही हैं और उनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए अनेक कदम उठाने की जरूरत पड़ रही है वहीं हिंदी का प्रसार दिन दूनी रात चौगुनी गति से हो रहा है। लेकिन ऐसा हमेशा से ही नहीं था। आजादी के पहले व बाद में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर प्रयास किए जाते रहे। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, पं.

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आमतौर पर यह माना जाता है कि गरीबी दूर करने का सीधा और सरल तरीका यह है कि वंचित लोगों को वह सब उपलब्ध करा दिया जाए जो उनके पास नहीं है। गरीबी दूर करने का यह दर्शन काफी पुराना है और हम सब के दिलो दिमाग में पूरी तरह से रचा बसा है। धर्मार्थ कार्य में विश्वास करने वाले जहां दरिद्र नारायण की सेवा कर अपने को उप कृत समझते हैं वहीं जन कल्याण के लिए कार्य करने वाले (फिलॉंथ्रोपिस्ट्स) गरीबों को वह सब दे देने में विश्वास करते हैं जिन्हें वे स्वयं हासिल नहीं कर सकते। जबकि समाजवादी सरकारों का ज्यादा जोर रॉबिनहुड वाले तरीके यानी कि गरीबी मिटाने के लिए अमीरो

गरीबी को खत्म करने के अभी तक सुने गए प्रस्तावों में सबसे आसान एक एनजीओ में काम करने वाले एक दोस्त की ओर से आया। क्यों न हम न्यूनतम वेतन को इतना बढ़ा दें कि सभी लोग गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएं? यह कितना आसान लगता है मनोहारी और दर्दरहित। अफसोस, यह नाकाम रहेगा क्योंकि हमारे यहां एक ऐसा कानून है जिसका परिणाम अनपेक्षित है।

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