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मुफ्त बिजली, अत्यधिक सब्सिडाइज्ड यूरिया और खुली खरीद के खतरनाक मिश्रण से पंजाब की प्राकृतिक संपदा समाप्त हो रही है।

वर्ष 1991 में भारत में हुए सुधारों के दौरान कृषि को इससे दरकिनार कर दिया गया। कृषि और खाद्य आधारित नीतियां ‘गरीबों के संरक्षण’ के नाम पर उपभोक्ता केंद्रीत ही बनीं रही। 

ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म वर्ष 1827 में 11 अप्रैल को सतारा, महाराष्ट्र में हुआ था। वे जाति से माली थे और उनके परिवार का मुख्य व्यवसाय फूलों का था। जब उनकी उम्र मात्र 9 माह थी तभी उनकी मां चल बसी। बालक ज्योतिराव ने भी काफी समय तक अपने पिता के साथ फूलों के गजरे बनाने और बेचने का काम किया। जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने खेती भी की। उनके पिता उन्हें स्कूल नहीं भेजते थे। उन्हें लगता था कि पढ़ लिख जाने के बाद ज्योतिराव को काम करने में शर्म आएगी। लेकिन ज्योतिराव की पढ़ाई में रूचि और तेज दिमाग को देखते हुए बाद में उनका दाखिला स्कॉटिश मिशन्स हाई

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सर सी. वाई. चिंतामणि का पूरा नाम था, चिर्रावूरी यज्ञेश्वर चिंतामणि। चिर्रावूरी, कृष्णा जिले के उनके पैतृक ग्राम का नाम था। उनका जन्म तेलुगु नव-वर्ष के अवसर पर अप्रैल 10, 1880 को विजयनगरम (आंध्र-प्रदेश) में हुआ था। उस समय यह मद्रास प्रेसीडेंसी के अंतर्गत आता था। अपने पिता चिर्रावूरी रामसोमायाजुलु गारू की वे तीसरी संतान थे। उनके पिता सनातनधर्मी विद्वान् एवं विजयनगरम के शासक, महाराजा सर विजयराम गजपति राजू के ‘धार्मिक अनुष्ठानों’ के परामर्शदाता थे!

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सुधार की राह कभी भी आसान नहीं रही है। कड़े और संरचनात्मक सुधार के कारण चुनाव के दौरान चुनौतियों का सामना करना पड़ता है किंतु आपदा सदैव अपने साथ परिवर्तन के अवसर लेकर आती है और महामारी ने भी केंद्र सरकार को सुधार का ऐसा ही अवसर प्रदान किया है।

प्रमुख भारतीय उदारवादी चिंतक हृदयनाथ कुंजरु का जन्म 1 अक्टूबर 1887 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित अयोध्या नाथ कुंजरु और माता का नाम जनकेश्वरी था। वह लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे और चार दशकों तक संसद और विभिन्न परिषदों को अपनी सेवाएं दी। वर्ष 1946 से 1950 तक वह उस कांस्टिटुएंट असेम्बली ऑफ इंडिया के सदस्य भी रहे जिसने भारत का संविधान तैयार किया था। वह देश दुनिया की घटनाओं पर पैनी नजर और रूचि रखते थे। उन्होंने इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स और इंडियन स्कूल्स ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज

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हाल ही में आजादी.मी ने स्कूली शिक्षा से जुड़े विषय पर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता और मंडेला पुरस्कार से सम्मानित दीपक मिश्रा से लखनऊ स्थित उनके आवास पर विस्तारपूर्वक बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंश..

पिछले साल मार्च की शुरुआत से देश भर में स्कूलों के संचालन में बहुत सारी समस्याएं आई हैं। चूंकि भारत में स्कूलों को उद्यम नहीं माना जाता, उन्हें कोरोना महामारी से हुए वित्तीय नुकसान से निपटने के लिए सरकार से कोई राहत या किसी तरह की वित्तीय मदद नहीं मिली। लेकिन स्कूलों की फ़ीस भरने में अक्षम अभिभावकों ने राहत के लिए अदालतों में याचिकाएं दायर की। उच्च न्यायालयों ने अपने आदेश में स्कूलों को केवल ट्यूशन फ़ीस लेने और अपने कर्मचारियों को वेतन का भुगतान करने को कहा।

नजरियाः प्राइवेट नौकरियों में स्थानीयों के लिए 75% आरक्षण के कानून का असर बाकी राज्यों पर भी पड़ेगा

Author: 
गुरचरण दास

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 को कृषि क्षेत्र में नयी जान डाल देनी चाहिए ताकि उसकी पूरी क्षमता का दोहन किया जा सके। हालांकि जहां बहुत सारे लोगों की दलील है कि यह संशोधन सही दिशा में उठाया गया कदम है, यह अधिनियम आपने मौजूदा रूप में आदर्श नहीं है। कुछ नियमों के स्पष्ट न होने के कारण यह अनुत्पादक हो सकता है जिसकी वजह से उस स्थिरता पर खतरा पैदा हो सकता है जिसे यह बढ़ावा देना चाहता है।

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