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मोदी सरकार ने कृषि सुधार के लिए जिन दो बिलों को लोकसभा और राज्यसभा से पास करवाया है उसमें एक का संबंध कांट्रैक्ट फार्मिंग यानी अनुबंध खेती से है। सरकार का जहां इसे किसानों विशेषकर छोटे व सीमांत किसानों के लिए फायदेमंद बता रही है वहीं कुछ किसान समूह व राजनैतिक दल इसे एक छलावा बता रहे हैं। उनका कहना है कि नए प्रावधानों के कारण किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन जाएगा और सारा फायदा कंपनी उठा ले जाएगी। इस विषय पर “आजादी.मी” ने किसानों के देश के सबसे बड़े संगठन शेतकरी संगठन से जुड़े गुनवंत पाटिल से बा

दुनिया में कोरोना वायरस का तांडव लगातार जारी है। दुनिया में अबतक लगभग चार करोड़ लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं जबकि 11.15 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। जनसंख्या के हिसाब से दूसरा सबसे बड़ा देश भारत भी इस प्रकोप से बुरी तरह प्रभावित है। अब तक देश में 75 लाख लोग इस संक्रमण से ग्रसित हो चुके हैं और 1.15 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। पिछले 100 साल के इतिहास में इसे सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में देखा जा रहा है। कुल मौतों के हिसाब से भारत अमेरिका (2,24,282) और ब्राजील (1,53,690) के बाद तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। जबकि संक्रमित लोगों

विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम यानी कि फॉरेन कॉंट्रिब्यूशन रेग्युलेशन एक्ट में एक बार फिर संशोधन किया गया है। विगत दिनों संसद के दोनों सदनों से नए संशोधनों वाले फॉरेन कॉंट्रिब्यूशन (रेग्युलेशन) अमेंडमेंट बिल 2020 को पास करा लिया गया। सरकार का दावा है कि इससे विदेशी चंदा प्राप्त कर देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वाली संस्थाओं और संगठनों पर अंकुश लग सकेगा और देश की आंतरिक सुरक्षा मजबूत होगी। साथ ही साथ धर्म परिवर्तन जैसी गतिविधियों पर भी रोक लगाई जा सकेगी।

सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा प्रस्तुत आज़ादी पोडकास्ट के इस एपिसोड में आज हम चर्चा करेंगे बहुचर्चित कृषि सुधार कानून 2020 पर। हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि इन सुधारात्मक कानूनों के बारे में आम किसान क्या सोचता है और क्या वास्तव में किसानों का कुछ भला होगा? इस महत्वपूर्ण विषय को होस्ट कर रहे हैं आज़ादी.मी के संपादक अविनाश चंद्र और वक्ता हैं गुनवंत पाटिल। गुनवंत पाटिल किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं और पेशे से इंजीनियर और पैशन से फिलांथ्रोपिस्ट हैं। पाटिल किसानों के सबसे बड़े संगठन शेतकरी संगठन से जुड़े हैं और स्वतंत्र भारत पक्ष नामक राजनैतिक संगठन के जनरल सेक्रेटरी भी हैं।
  • मनचाहे क्रेता को फसल बेचने की आज़ादी मिली, मनचाहे बीज से फसल उगाने की आज़ादी कब 
  • जीएम बीजों के इस्तेमाल की अनुमति के लिये किसान लंबे समय से कर रहे हैं मांग
  • खेती को लाभदायक बनाने के लिये लागत में कमी आवश्यक, एचटीबीटी हो सकता है कारगर

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति आने के बाद से ही आरंभिक शिक्षा का माध्यम क्या हो इसे लेकर बहस का दौर फिर से शुरु हो गया है। बहस इस बात पर है कि छात्रों को प्राथमिक शिक्षा स्थानीय भाषा में प्रदान करना ठीक होगा या मातृभाषा में या फिर हिंदी में!
 

जन्मदिन मुबारकः
प्रमुख भारतीय उदारवादी चिंतक हृदयनाथ कुंजरु का जन्म 1 अक्टूबर 1887 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित अयोध्या नाथ कुंजरु और माता का नाम जनकेश्वरी था। वह लंबे समय तक राजनीति में सक्रिय रहे और चार दशकों तक संसद और विभिन्न परिषदों को अपनी सेवाएं दी। वर्ष 1946 से 1950 तक वह उस कांस्टिटुएंट असेम्बली ऑफ इंडिया के सदस्य भी रहे जिसने भारत का संविधान तैयार किया था।

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रिश्वत देकर अयोग्य लोग शिक्षक बन गए, जब तक राज्य सरकारें इस समस्या का हल नहीं करतीं, तब तक कोई नीति बच्चों का भविष्य नहीं संवार सकती

1947 में इंग्लैंड ने भारत छोड़ दिया, लेकिन वे अपने पीछे अंग्रेजी भाषा और भारतीयों के लिए सिरदर्द भी छोड़ गए। तब से हम अंग्रेजी के अपनी जिंदगी में स्थान को लेकर लड़ रहे हैं। विशेषकर, इस बात पर कि अपने बच्चों को किस भाषा में पढ़ाएं। 

Author: 
गुरचरण दास

“बाजार की असफलता” शब्दावली का ज्यादातर इस्तेमाल राजनेता, पत्रकार, विश्वविद्यालय और अर्थशास्त्र के उच्च श्रेणी के छात्र और शिक्षक करते हैं। हालांकि जो लोग इस शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, प्रायः उन्हें इस बात की बिल्कुल समझ नहीं होती है कि सरकार के पास इस संकट को दूर करने की कितनी क्षमता है। ऐसा मुख्य रूप से सामान्य ज्ञान की कमी और सार्वजनिक चयन वाले अर्थशास्त्र के प्रति अनभिज्ञता के कारण होता है। इसकी वजह से सामान्य बातों और आर्थिक मुद्दों को वह सार्वजनिक चयन सिद्धांत के नजरिए से नहीं देख पाते हैं।

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