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1 और 2 अगस्त 1959 को मुंबई में हुए स्वतंत्र पार्टी के तैयारी सम्मेलन में इस 21 सूत्री कार्यक्रम को स्वीकार किया गया

यह लेख उद्योगपति जे.आर.डी. टाटा के एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री में दिए गए भाषण के समर्थन में  12 मई, 1975 को लिखा गया है। इसमें निजी उद्योग के अस्तित्व पर गहराते संकट को लेकर चेतावनी दी गई है…

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कोरोना महामारी के कारण देश की अर्थव्यवस्था को लगे तगड़े झटके से उबारने के प्रयास के तहत वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण सुधार की तमाम घोषणाएं कर रही हैं। इसी क्रम में उन्होंने कृषि क्षेत्र में सुधार की भी कई घोषणाएं की हैं। इन सुधारों में किसानों को अपने उत्पाद अपने मर्जी की कीमत पर देश में कहीं भी बेचने की आजादी और एपीएमसी ऐक्ट के प्रावधानों से मुक्त करने घोषणाएं मुख्य हैं। 

कृषि के क्षेत्र में सुधार के वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की योजनाओं और सपनों को साकार करने का हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री जे. पी. दलाल का क्या है प्लान! देखें सेंटर फ़ॉर सिविल सोसायटी के सीईओ यतीश राजावत के साथ.. एक्स्क्लुसिव www.azadi.me/video पर
सरकारों को कम से कम योजनाएं बनानी चाहिए। सरकारें जितनी अधिक योजनाएं बनाती हैं, लोगों के लिए व्यक्तिगत योजनाएं बनाने में उतनी अधिक परेशानी होती हैः एफ.ए. हायक (नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री)
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राज्य नामक अमूर्त प्राणी, भारत पर राज्य कर रहा है। हमने अपने देश में कुछ खाद्य पदार्थों के ब्रांड्स के विज्ञापन देखे हैं, जिन्हें बनाने और पैक करने की सारी प्रक्रिया बिना हाथ लगाए पूरी की जाती है। यह विवरण भारत की शासन व्यवस्था पर भी लागू होता है, जो कि हरसंभव मानवीय (जनता) से संपर्क से दूरी बनाए रहती है। राज्यपाल हमारी भाषा समझने को जरूरी नहीं मानते हैं। वे हमसे व्यक्तिगत संपर्क स्थापित करने को भी जरूरी नहीं मानते हैं। वे हमसे सिर्फ अफसरों के रूप में मिलते हैं।

रबीन्द्र नाथ टैगोर (1861-1941)

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धर्मसंकटः तालाबंदी हटने से संक्रमण बढ़ने का और जारी रहने से बेरोजगारी तथा भूख से लोगों के मरने का जोखिम

Author: 
गुरचरण दास

वैश्विक स्तर पर उभरे कोविड-19 संकट की चुनौतियों से देश दो तरफा जूझ रहा है। शहरी आबादी के सामने कोविड से बचाव व पलायन की वजह से पैदा हो रही परिस्थिति से निपटने की चुनौती है, वहीँ दूसरी तरफ ग्रामीण भारत के सामने आजीविका के सुरक्षा का सवाल है। भारत की बड़ी आबादी गांवों में रहती है तथा उसकी आजीविका निर्भरता भी श्रम संबंधी उपक्रमों पर टिकी है। ऐसे में जब लॉक डाउन की वजह से श्रम के अवसर कम हो गये हैं, तब शहरों के साथ-साथ गांवों में आजीविका और नकदी का संकट पैदा होना स्वाभाविक है। यह संकट लॉक डाउन की स्थिति में आम जन के धैर्य व भरोसे को भी डिगा सकता है। लगभग एक महीने के संपूर्ण लॉ

Author: 
शिवानंद दिवेदी

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