वे खुद कार्टून बनते जा रहे हैं

अक्सर कहा जाता है कि हम भारतीयों में सेंस आफ ह्यूमर की भारी कमी है।हमारे सांसदों ने यह साबित कर दिया कि यह सही है। जहां तक राजनेताओं का सवाल है वे हमेशा ही कार्टूनिस्टों के निशाने पर रहे हैं आखिर क्यों न रहें? वे देश के भाग्यविधाता जो बन गए हैं और उन्होंने देश का जो हाल बनाया है उसके बारे में सभी जानते हैं। मगर इस देश में लोकतंत्र है और लोगों को अभिव्यक्ति का अधिकार मौलिक अधिकार के तौर पर मिला हुआ है इसलिए वे  व्यंग्यबाण चुपचाप झेलने को मजबूर थे। लेकिन पहला मौका मिलते ही उन्होंने कार्टूनिस्टों को निशाना बना डाला। उनके कार्टूनों को चुन-चुनकर पाठ्यपुस्तकों से निकाल फेंका।

यह घटना तब की है जब संसद की साठवी सालगिरह मनाए जाने के आसपास की। तब संसद में जनता के किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीर बहस नहीं हो रही थी वरन एक 63 साल पुराने कार्टून पर हंगामा हो रहा था। जिन कार्टूनों पर तब कोई विवाद या हंगामा नहीं हुआ था उन पर आज हंगामा हो रहा था ।मुद्दई सुस्त गावाह चुस्त कहावत पर अमल करते हुए जिस कार्टून पर अंबेडकर को एतराज नहीं था उस कार्टून पर अंबेडकर के उत्साही अनुयायी ऐसे एतराज जता रहे थे कि इससे अंबेडकर का घोर अपमान हुआ हो।  तब उन्हें जरा भी यह खयाल नहीं आया कि उनका रवैया अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के घोर समर्थक रहे डा.अंबेडकर को कितना दुखी कर रहा होगा। हंगामा भी ऐसा कि मानव संसाधन विकास मंत्री को घोषणा करनी पड़ी कि पाठ्यपुस्तक में से यह कार्टून हटाया जाएगा। और जैसे ही एक कार्टून हटा वैसे ही और भी नेताओं के अनुयायायियों ने अपने नेताओं का अपमान होने की बात कहकर उनके कार्टून भी हटाने की मुहिम शुरू कर दी और सरकार को आखिरकार पाठ्यपुस्तकों में से सभी कार्टून हटाने का फैसला करना पड़ा। यानी बाकी सांसद भी कार्टून हटवाने की भेड़चाल में शरीक हो गए। अव जो पाठ्यपुस्तकें प्रकाशित होंगी उनमें कार्टून नहीं होंगे।

हमारे यहां कहते हैं कि साठा सो पाठा याने जो साठ साल का हो जाता है वह ज्यादा गंभीर ,प्रौढ़ और मजबूत हो जाता है। लेकिन सांसदों का यह कृत्य साठा सो पाठा नहीं सठिया जाने वाला ही कहा जाएगा। जनप्रतिनिधि होने के नाते सांसदों  से अपेक्षा की जाती है कि वे लोगों के अधिकारों की रक्षा करें और देश में स्वस्थ परंपराएं बनाने में मदद करें। लेकिन सांसदों का यह कृत्य ठीक उल्टा है। पिछले कुछ समय से हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का बुरी तरह से गला घोंटा जा रहा है। कभी धर्म, कभी जाति, कभी मूल्यों, कभी किसी महापुरुष का अपमान करने के नाम पर किताबों पर पाबंदी लगाना तो हमारी पहचान बन गई है। ऐसा करना यानी यह मान लेना है कि कुछ बातें आलोचना और तर्क से परे हैं। उनके खिलाफ आवाज उठाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। लेकिन लगता है कि अब तो इस श्रेणी में राजनेताओं को शामिल किया जा रहा है। तभी तो ममता बनर्जी के खिलाफ कार्टून बनानेवाले को जेल जाना पड़ता है। अंबेडकर के कार्टून छापनेवाली किताब खारिज कर दी जाती है। उसके बाद तो सभी कार्टूनों को पाट्यपुस्तकों से तडीपार कर दिया गया है गोया वे असामाजिक हों।

जबसे कार्टून कला ईजाद हुई है कार्टूनिस्ट जीवन के सभी क्षेत्रों की घटनाओं और हस्तियों पर टिप्पणियां करके पाठकों को हंसाते, गुदगुदाते और तिलमिलाते रहे हैं। इस सबके बीच घटनाक्रम के बारे में पाठकों की समझ बढ़ाते हैं। कई बार तो जो बात कई लेख मिलकर नहीं कह पाते वह एक कार्टून कह जाता है इसलिए कार्टून की मार बहुत गहरी होती है। इसके बावजूद हमारे नेता कार्टूनों को बर्दाश्त करते रहे हैं। कुछ उन्हें पसंद करते रहे हैं। कुछ तो स्वयं कार्टूनिस्ट भी रहे हैं – जैसे बाल ठाकरे और राज ठाकरे। लेकिन पिछले कुछ समय से राजनेता कार्टूनों के प्रति भी असहिष्णु होते जा रहे हैं। वे इस हदतक कार्टून विरोधी हो गए हैं कि न केवल पाठ्यपुस्तकों को हटाया जा रहा है वरन सरकार से मांग की जा रही है कि इन कार्टूनों को पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा बनानेवाली एनसीईआरटी को भंग कर दिया जाए। वे अपने कार्टून विरोध को इस सीमा तक ले जाकर एक तरह से बेहतर पाठ्यपुस्तकें बनाने की सारी संभावनाओं को ही खत्म कर रहे हैं। जिन पाठ्यपुस्तकों को लेकर इतना विवाद पैदा हो रहा है उन्होंने कोशिश की है कि छात्र केवल रटने के बजाय ज्ञान के तमाम साधनों के जरिये विषय को समझे। कार्टून और ग्राफिक्स भी इसी प्रक्रिया के अंग हैं। हिंदी की पाठ्यक्रम निर्मात्री समिति के सदस्य हिमांशु पांडे ने अपनी एक टिप्पणी में लिखा था - बच्चों को उपदेशों की खुराक नहीं चाहिए, उन्हें सहभागिता की चुनौती चाहिए। उपदेशों का खोखलापन हर बच्चा जानता है। यह और दो हज़ार पांच में बनी अन्य किताबें बच्चों को नियम/ सूत्र/ आंकड़े/ तथ्य रटाना नहीं चाहतीं। प्रसंगवश पाठ्यचर्या दो हज़ार पांच की पृष्ठभूमि में यशपाल कमेटी की रिपोर्ट थी। बच्चे आत्महत्या कर रहे थे, उनका बस्ता भारी होता जा रहा था, पढ़ाई उनके लिए सूचनाओं का भण्डार हो गयी थी, जिसे उन्हें रटना और उगल देना था। ऐसे में इस तरह के कार्टून और सवाल एक नयी बयार लेकर आये। ज्ञान एक अनवरत प्रक्रिया है, यदि ज्ञान कोई पोटली में भरी चीज़ है जिसे बच्चे को सिर्फ ‘पाना’ है तो पिछली पीढ़ी का ज्ञान अगली पीढ़ी की सीमा बन जाएगा। किताब बच्चे को अंतिम सत्य की तरह नहीं मिलनी चाहिये, उसे उससे पार जाने, नए क्षितिज छूने की आकांक्षा मिलनी चाहिए।

लेकिन इस नजरिये को नजरंदाज कर  शायद हम पाठ्यपुस्तकों को फिर उस युग में  ले जाना चाहते हैं जिसमें केवल कुछ महान नेताओं की जयजयकार और महिमागान हो, छात्र तोतारंटंत के जरिये उनका घोटा लगा लें। कहना न होगा कि हमारे नेताओं का यह रवैया प्रतिगामी और खतरनाक है। ऐसा करके वे खुद ही कार्टून बनते जा रहे हैं।

- सतीश पेडणेकर