दस पूंजीपतियों को मिटाएं नहीं दस करोड़ पूंजीपति पैदा करें -ओशो

एक मित्र ने पूछा है कि इतने गरीब है इनकी जिम्मेदारी अमीरों पर नहीं है?

मैं आपसे कहता हूं, बिल्कुल नहीं है। इनकी जिम्मेवारी इन गरीबों पर ही है। इसको थोड़ा समझ लेना जरूरी होगा।

बड़े मजे की बात है कि किसी गांव में दस हजार गरीब हो और दो आदमी उनमें से मेहनत करके अमीर हो जाएं तो बाकी नौ हजार नौं सौ निन्यानबे लोग कहेंगे कि इन दो आदमियों ने अमीर होकर हमको गरीब कर दिया। और कोई यह नहीं पूछता कि जब ये दो आदमी अमीर नहीं थे तब तुम अमीर थे? तुम्हारे पास कोई संपत्ति थी जो इन्होंने चूस ली। नहीं तो शोषण का मतलब क्या होता है? अगर हमारे पास था ही नहीं तो शोषण कैसे हो सकता है? शोषण उसका हो सकता है जिसके पास हो। अमीर के न होने पर हिन्दुस्तान में गरीब नहीं था? हां, गरीबी का पता नहीं चलता था। क्योंकि पता चलने के लिए कुछ लोगों का अमीर हो जाना आवश्यक है। तब गरीबी का बोध होना शुरू होता है।

बड़े आश्चर्य की बात है –जो लोग मेहनत करें बुद्धि लगाएं ,श्रम करें और अगर थोड़ी बहुत संपत्ति इकट्ठा कर लें तो ऐसा लगता है कि इन लोगों ने बड़ा अन्याय  किया होगा।

सारा मुल्क काहिल और सुस्त है लेकिन इस काहिलियत और सुस्ती को समझने की हमारी तैयारी नहीं। सारा मुल्क चुपचाप बैठा है, धन पैदा करने की न कोई इच्छा है न कोई श्रम है, और न कोई बुद्धि है, न उस दिशा में कोई चेष्टा है। और फिर दस आदमी धन कमा लें तो हम कहते हैं इन दस लोगों ने सारे मुल्क को गरीब कर दिया। अन्याय हो रहा है गरीब के साथ। गरीब अपने को गरीब रखने की व्यवस्था में जी रहा है।

असल में मेरा मतलब यह है कि पूंजीपति को हम कहते हैं कि उसने शोषण कर लिया तो हम भूल जाते हैं कि उसने किसका शोषण किया? किसी के पास संपत्ति थी? किसी का धन गड़ा हुआ इसने निकाल लिया? इसने सिर्फ एक बुरा काम किया कि किसी के पास श्रम था और किसी को दो रूपया देकर उसका श्रम खरीद लिया। यह नहीं खरीदता तो वह श्रम बेचता नहीं। श्रम गंगा की धार की तरह बह जाता है।

अगर मेरे पास  श्रम की ताकत है आठ घंटे की और मैं उसका उपयोग न करूं तो कल मेरे पास दो रूपये नहीं बच जाएंगे क्योंकि मैंने श्रम का उपयोग नहीं किया। अगर मैं श्रम का उपयोग करूं तो कोई दो रूपये देने को तैयार है। जो मुझे दो रूपया देकर मेरे श्रम को पूंजी में कन्वर्ट करता है उसको मैं कहता हूं कि यह मेरा शोषण कर रहा है। तो आप शोषण मत करवाइए ,आप बैठ जाइए अपने घर  और अपने श्रम को तिजोरी में बंद करके ऱखिए। फिर पता चलेगा कि शोषण हो रहा है कि क्या हो रहा है। शोषण नहीं हो रहा है।

पूंजीवाद शोषण की व्यवस्था नहीं है। पूंजीवाद एक व्यवस्था है श्रम को पूंजी में कन्वर्ट करने की। श्रम को पूंजी में रूपांतरित करने की व्यवस्था है। लेकिन जब आपका श्रम रूपांतरित होता है, जब आपको या मुझे दो रूपये मेरे श्रम के मिल जाते हैं तो मैं देखता हूं जिसने मुझे दो रूपये दिए उसके पास कार भी है, बंगला भी खड़ा होता जाता है। स्वभावता तब मुझे खयाल आता है कि मेरा कुछ शोषण हो रहा है। और मेरे पास कुछ भी नहीं था उसका शोषण हुआ।

हालांकि इस आदमी ने मकान और कार खरीदी और व्यवस्था बनाई जिससे मुझे दो रूपये मिले। ध्यान रहे यह जो इतने गरीब दिखाई पड़ रहे हैं ,इन गरीबों की गरीबी के लिए पूंजीपति जिम्मेवार नहीं है। हां इन गरीबों को जिंदा रखने के लिे जरूर पूंजीपति जिम्मेवार हैं।अगर वह कोई अन्याय है तो अन्याय हुआ है।

आज से पांच सौ साल पहले दुनिया में दस बच्चे पदा होते थेऔर नौ बच्चे मरते थे। क्योंकि दस बच्चों के लिए न तो भोजन था, न काम था, न जीवन था, न सुविधा थी। आज दस बच्चे पैदा होते हैं तो नौ बच्चे बचते हैं और एक बच्चा मरता है। यह जो नौ बच्चे बच रहे हैं यह पूंजीवाद ने श्रम को धन में रूपांतरित करने की जो व्यवस्था की है उसका परिणाम है। लेकिन यह नौ बच्चे इकट्ठा हो जाते हैं और वे गरीब दिखाई पड़ते हैं और ये गरीब बच्चे चिल्लाते हैं कि हमारा शोषण कर लिया गया है।

पूंजीवाद शोषण की व्यवस्था नहीं है. और अगर हम पूंजीवाद को सबतक पहुंचाना चाहते हैं कि वह गरीब तक पहुंच जाए तो इसका मतलब यह  नहीं है पूंजीवाद की व्यवस्था को तोड़ना है। उसका मतलब है व्यवस्था को बड़ा करें। उसका मतलब है पूंजीवाद की व्यवस्था गांव –गांव ,कोने –कोने तक फैल जाए। उसका मतलब यह नहीं है कि हिन्तुस्तान के दस पूंजीपतियों को हम मिटा दें। उसका मतलब है हिन्दुस्तान में दस करोड पूंजीपति पैदा करें। उसका मतलब है पूंजी का विस्तार हो, पूंजीपतियों का विस्तार हो, उद्योगों का विस्तार हो।