मोरलिटी आफ कैपिटलिज्म – कई मिथों को तोड़ती एक किताब

पिछले दिनों एक किताब हाथ लगी। उसका शीर्षक देखकर ही मैं चौंक गया। शीर्षक था –मोरलिटी आफ कैपिटलिज्म यानी पूंजीवाद की नैतिकता। चौंकने की वजह यह थी कि पहली बार पता चला कि पूंजीवाद की भी कोई नैतिकता होती  है । अब तक तो यही जाना था कि  पूंजीवाद और नैतिकता का कोई लेना देना नहीं है । कुछ लोग कहते हैं कि पूंजीवाद नैतिकतावहीन है तो कुछ लोगों का कहना था कि पूंजीवाद अनैतिक है। कुछ व्यंग्य में कहते थे कि पूंजीवाद की एक ही  नैतिकता है कि ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाओ और अपनी तिजोरियां भरो। वामपंथियों का जो प्रचार हम लोग सुनते थे उसका एक ही लब्बोलुबाब यही होता था कि पूंजीवाद  न केवल अनैतिक है वरन एक ऐसा दानव है जिससे मुक्ति पाना जरूरी है।

पुस्तक का उपशीर्षक भी काफी चौंकानेवाला था – जो आपके प्रोफेसर आपकों नहीं बताएंगे। इस शीर्षक ने मेरी पुस्तक के प्रति मेरी उत्सुकता और भी बढ़ा दी। पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर ही पूंजीवाद के चार मूल्य बताए गए थे स्वतंत्रता,शांति,समृद्धि और उद्योजकता । सचमुच पूंजीवाद के इन मूल्यों के बारे में हमारे प्रफेसरों ने हमें कभी गंभीरता से बताया ही नहीं था।

इन सारी बातों ने  पूंजीवादी दर्शन के सशक्त प्रवक्ता टाम पामर की पुस्तक - मोरालिटी आफ कैपिटलिज्म – पढने को प्रवृत्त किया। जब मैंने पुस्तक को पढ़ना शुरू किया तो उसकी प्रस्तावना का शीर्षक - पूंजीवाद का धर्म -  देखकर तो और चौंकगया सोचा यह तो  पूंजीवाद के शैतान द्वारा  धर्मशास्त्रों का हवाला दिए जाने की नायाब मिसाल है। लेकिन बहुचर्चित और बहुप्रशंसित पुस्तक - इंडिया अनबाउंड- के लेखक गुरूचरण दास द्वारा लिखी प्रस्तावना काफी विचारोत्तेजक और नया नजारिया लिए है। उसमें महाभारत और अन्य धर्मशास्त्रों के हवाले से यह बताया गया है कि लिबर्टी और बाजार पूंजीवाद  के विचारों की जड़े गैर पशिचमी देशों में भी रही है और उदारवादी परंपरा इस दृष्टि से सार्वजनीन है। वे कहते हैं कि आर्थिक गतिविधियों का एक उद्देश्य होता है और प्राचीन भारत के लोग इसके प्रति सचेत थे। इसलिए ही उन्होंने अर्थार्जन को भी जीवन का एक पुरूषार्थ या उद्देश्य माना था। उनकी मान्यता थी पैसा कमाना तब तक सही है जबतक वह बेहतर जीवन की तरफ ले जाए। लेकिन अच्छी जिंदगी के कुछ और भी उद्देश्य हैं वह है  धर्म । महाभारत हमें याद दिलाता है कि अर्थार्जन को धर्म के अंतर्गत होना चाहिए। यानी अर्थार्जन के सही और गलत रास्ते हैं। आज की भाषा में कहें तो आर्थिक गतिविधियों का उद्देश्य दुनिया को बेहतर बनाना है।

उदारवाद और पूंजीवाद  का विचार केवल पश्चिम देशों की बपौती नहीं है वरन वह  एक वैश्विक विचारधारा है इस वास्तविकता को रेखांकित करने के लिए संपादक टाम पामर ने सभी उपमहाद्वीपों के उदारवादी चिंतकों के विचार इस पुस्तक में संग्रहीत करके इसे वैश्विक आयाम देने की कोशिश की है। वे पुरजोर तरीके से एक बात कहते हैं कि पूंजीवाद का मतलब केवल वस्तुओं और सेवाओं के विनिमय का बाजार भर नहीं है वरन  वह नवीनीकरण,संपदा के निर्माण और सामाजिक परिवर्तन की व्यवस्था है जो अरबों लोगों के लिए सम्रद्धि लेकर आई है जिसकी अतीत में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। लेकिन वे यह बात बहुत जोर देकर कहते हैं कि पूंजीवाद एक स्वतस्फूर्त व्यवस्था है और मुक्त बाजार पर आधारित पूंजीवाद और क्रोनी कैपीटलिज्म या चहेतों के पूंजीवाद में स्पष्ट तौरपर फर्क किया जाना चाहिए। क्योंकि चेहेतों का पूंजीवाद कई देशों में फैली वह व्यवस्था है जिसने कई देशों को भ्रष्टाचार और पिछडेपन के दलदल में धकेला है। इन देशों में अगर कोई अमीर है तो बहुत संभावना है कि उसके हाथों में राजनीतिक सत्ता है या वह राजनीतिक सत्ताधारियों का नजदीकी है। उसकी संपत्ति अच्छे गुणवत्तापूर्ण उत्पाद  पैदा करने के कारण नहीं वरन सत्ता से नजदीकी के कारण पैदा होती है। दरअसल क्रोनी कैपीटलिज्म शब्द अमेरिका पर भी लागू होता है क्योकि वहां भी दीवालिया फर्मों को बेल आउट किया जाता है।

पुस्तक का एक बहुत बड़ा आकर्षण है होल फूड मार्केट के सह संस्थापक और कांशियंस कैपीटलिज्म इंस्टीट्यूट के ट्रस्टी जान मैके का  विचारोत्तेजक इंटरव्यू जो पूंजीवाद के कई प्रमुख सिंद्धांतकारों के इस सिद्धांत को चुनौती देता है कि मनुष्य हर काम स्वार्थवश करता है। मैके कहते है कि मनुष्य एक जटिल प्राणी है हम कई तरह की प्रेरणाओं के कारण काम करते हैं। उनमें से अपना हित एक है लेकिन वह एकमात्र प्रेरणा नहीं हो सकती। लेकिन केवल स्वार्थ को ही एकमात्र प्रेरणा मानने के कारण उदाववादी आंदोलन वैचारिक गतिरोध का शिकार हो गया है । लेकिन उनका मानना है किकेवल स्वार्त को एकमात्र प्रेरणा मानकर  हम पूंजीवाद और मानवीय स्वभाव के साथ न्याय नहीं कर रहे।वे अपनी सचेतन पूंजीवाद के फलसफे के बारे में कहते है कि उसका पहला सिद्धांत यह है कि व्यापार का  पैसा बनाने से आगे  भी कोई उच्च लक्ष्य हो सकता है।

संपदा का  सृजन और वितरण – खंड में पार्थ जे शाह और स्वामीनाथन अय्यर जैसे जानेमाने अर्थशास्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। पार्थ जे शाह मौजूदा आर्थिक स्थिति का पैना विश्लेषण करते हुए  कहते हैं कि 1990 के आर्थिक सुधार कुछ लोगों का पूंजीवाद है जबकि जरूरत इस बात की है कि आम लोगों के पूंजीवाद की स्थापना की जाए। यह दलील चौंकानेवाली इसलिए है कि आमफहम  यह है कि पूंजीवाद तो होता ही है कुछ लोगों खासकर पूंजीपतियों  के हितों का पोषण करने के लिए। लेकिन पार्थ की दलीले पढ़ने के बाद पूंजीवाद के बारे में बनी कई मिथ्या धारणाएं टूटती हैं। पार्थ कहते हैं कि भारत में एक बात आमतौरपर सुनने को मिलती है कि गरीब और गरीब हो गए तो अमीर और अमीर । 1991 में हुए आर्थिक सुधारों के बावजूद इस धारणा में कोई फर्क नही आया है। हालांकि ऐसा नहीं है कि आमतौर पर गरीबों की स्थिति बिगड़ी हो और अमीर गरीबों की कीमत पर अमीर हुए हों। हकीकत तो यह है कि आर्थिक सुधार लागू होने के बाद गरीबों के एक तबके की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। फिर भी ऐसा क्यों लग रहा है कि असमानता बढ़ी है। यहां वे एक महत्वपूर्ण और मौलिक मुद्दा उठाते हैं कि  इसकी वजह उनकी नजर में यह है कि आमदनी और संपदा की असमानता के कारण विभिन्न समूहों को आर्थिक स्वतंत्रताओ के वितरण में भी असमानता आई है। अमीरों और मध्यम वर्ग के कार्य के क्षेत्रों में उदारीकरण ज्यादा हुआ है जबकि गरीब जिन क्षेत्रों से अपनी जीविका कमाते है उनमें कम उदारीकरण हुआ है। नतीजतन जिन लोगों के पास पूंजी और शिक्षा है उन लोगों के लिए आर्थिक स्वतंत्रता बढी जबकि पूंजी और शिक्षा से रहित लोगों के लिए आर्थिक स्वतंत्रता में कोई खास सुधार नहीं हुआ।

 जानेमाने अर्थशस्त्री जगदीश भगवती ने इस पुस्तक में लिखे अपने लिखे लेख में दलील दी है मुक्त बाजार न केवल नैतिक नतीजों की तरफ ले जाता है वरन इसमें भाग लेनेवालों को बेहतर नैतिक चरित्र की ओर  ले जाता है।

इस तरह टाम पामर द्वारा संपादित यह पुस्तक पूंजीवाद के नैतिक पक्ष की बहुत गहराई से पड़ताल करते हुए इस मिथ को तोड़ती है कि पूंजीवाद और नैतिकता का कोई लेनादेना ही नहीं । वह तो केवल निहित स्वार्थों और मुनाफा कमाने का दर्शन है और बहुत सशक्त तरीके से यह प्रतिपादित  करती है कि स्वतंत्रता ,शांति,समृद्धि  और उद्योजकता पूंजीवादी नैतिकता के प्रमुख आधार स्तंभ हैं और राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रताओं पर आधारित व्यवस्था ही मानव समाज को समृद्धि की तरफ ले जा सकती हैं।

- सतीश पेडणेकर