क्यों उड़ी प्रणब मुखर्जी की नींद?

वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी को इन दिनों नींद नहीं आ रही है। वजह है, देश में खाद्य सुरक्षा बिल लागू करने की राह में खर्च होने वाला धन। उन्हें चिंता है कि इससे देश का बजट बढ़ जाएगा और कम से कम १.३४ लाख करोड़ रूपए से २.३४ करोड़ रूपए तक के अतिरिक्त खर्च का बोझ उठाना पड़ेगा। यह बात और है कि खुद कृषि मंत्रालय के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग का मानना है कि इस प्रक्रिया में वर्तमान बजट में मात्र २७ हजार करोड़ रूपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। अन्य तार्किक अनुमानों की भी माने तो इस प्रक्रिया में ९५ हजार करोड़ से लेकर १.१० लाख करोड़ रूपए का ही खर्च आएगा जो कि कुल जीडीपी का लगभग १.४ प्रतिशत बैठता है। अब सवाल यह उठता है कि क्या आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना संजोए बैठी सरकार अपनी जनता को दो जून की रोटी उपलब्ध कराने के लिए जीडीपी की १.४ प्रतिशत धनराशि खर्च करने की भी क्षमता नहीं रखती। सरकार के इस रवैये से देश की जनता को दो जून की रोटी उपलब्ध कराने की गारंटी प्रदान करने के तौर पर प्रचारित किये जा रहे खाद्य सुरक्षा बिल के वर्तमान परिस्थितियों में महज चुनावी हथकंडा बनकर रह जाने की उम्मीद बलवती होती जा रही है।

वैसे, सवाल यह भी उठता है कि क्या वित्तमंत्री की नींद कभी इस तथ्य से भी उड़ती है कि देश में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कोई ३० करोड़ से अधिक भारतीय ऐसे हैं जिन्हें एक जून भी भरपेट भोजन नहीं मिलता है? क्या उन्हें भी प्रधानमंत्री की तरह इस बात पर राष्ट्रीय शर्म महसूस होती है कि देश में लगभग ४२ प्रतिशत बच्चे भूखे पेट सोने को मजबूर होते हैं? क्या उन्हें इस बात से बेचैनी होती है कि देश की ७८ फीसदी जनता प्रतिदिन २० रूपए से कम की आय पर गुजर करने को मजबूर है? क्या प्रणब दा को यह बात परेशान नहीं करती कि आसमान छूती महंगाई के बीच आम आदमी कैसे जी रहा है? क्या अपनी समस्याओं को दूर करने की उम्मीद से उन्हें संसद में भेजने वाली जनता के लिए जीडीपी का १.४ फीसदी भी खर्च नहीं कर सकती सरकार?

दरअसल, उनकी नींद इस बिल के लागू होने की राह में आने वाले अनुमानित १.३४ लाख करोड़ से २.३४ लाख करोड़ रुपए के बजट के इंतजाम में माथापच्ची करने के कारण उड़ी हुई है। उधर, कृषिमंत्री शरद पवार को मौजूदा डिलीवरी सिस्टम पर ही भरोसा नहीं है। वह इस बात को लेकर भी काफी चिंतित हैं कि खाद्य सुरक्षा बिल की खातिर अधिक से अधिक अनाज खरीदना पड़ेगा।

दरअसल, वर्तमान समय में सालाना सरकारी खरीद खाद्य सुरक्षा बिल की जरूरतों के लिए पर्याप्त है, लेकिन समस्या यह है कि देश में सूखा, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं को देखते हुए सरकार के बफर स्टॉक के लिए भी २.५  करोड़ टन अनाज चाहिए। दूसरी समस्या यह है कि केंद्रीय पूल में सबसे ज्यादा योगदान करने वाले राज्यों में खरीद एजेंसियों द्वारा अब अनाज खरीद की मात्रा बढ़ाने की गुंजाइश कम है। जहां तक उत्पादन का सवाल है तो इसमें क्षेत्र विस्तार की संभावना नहीं है। ऐसे में पैदावार में बढ़ोतरी ही एकमात्र उपाय है। लेकिन क्या यह उतना आसान है जितना प्रतीत होता है? इसका जवाब है हां। पैदावार में न केवल बढ़ोतरी बल्कि बंपर बढ़ोतरी की संभावनाएं हैं। कैसे? यदि सरकार को समझ न आ रहा हो तो बिहार के नालंदा जिले के एक किसान सुमंत कुमार से वही सीख ले सकती है। सुमंत ने न केवल प्राकृतिक तरीकों से अपने खेत में पैदावार बढ़ाने में सफलता हासिल की बल्कि चीनी वैज्ञानिकों द्वारा प्रति हेक्टेयर अधिकतम अनाज पैदा कर बनाए गए विश्व रिकार्ड को भी तोड़ दिया। उन्होंने एक हेक्टेयर में २२४ क्विंटल धान पैदा कर इस क्षेत्र में नई संभावनाओं के दरवाजे खोल दिए। वैसे देश में खाद्यान्नों के पैदावार में बढ़ोतरी की भरपूर संभावनाएं भी हैं क्योंकि देश की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता अभी भी विश्व औसत से काफी पीछे है। फिर देश के वर्षाधीन क्षेत्र विशेषकर पूर्वी भारत में पैदावार अभी भी काफी कम है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सरकार अनाज उत्पादन और खरीद की धुरी को विकेंद्रित करे।

गौरतलब है कि मौजूदा समय में सरकार की खरीद नीति प्रमुख फसलों के अग्रणी उत्पादक राज्यों तक ही सिमटी हुई है। जिन क्षेत्रों में भारतीय खाद्य निगम खाद्यान्न की सीधी खरीद नहीं करता, वहां के किसान अपनी उपज की बिक्री के लिए साहूकारों-महाजनों पर निर्भर हैं। पैदावार बढ़ाने के लिए सरकार पूर्वी भारत में दूसरी हरित क्रांति लाने के लिए प्रयासरत है। लेकिन यह क्रांति तभी कारगर होगी जब पहली हरित क्रांति के कटु अनुभवों से सीख लेते हुए ऐसी तकनीक अपनाई जाए जो न केवल पर्यावरण अनुकूल हो, बल्कि देश के बहुसंख्यक किसानों की पहुंच में भी हो। इस दिशा में सघन धान तकनीक (सिस्टम ऑफ राइस इंटेसिफिकेशन अथवा श्री पद्धति) ने उम्मीद की किरण दिखाई है, जिसके बल पर बिहार के नालंदा जिले ने धान उत्पादन में चीन का रिकॉर्ड तोड़ दिया। सघन धान तकनीक का आविष्कार 1983 में मेडागास्कर के हेनरी डी लौलानी ने किया था,  इसलिए इसे मेडागास्कर पद्धति भी कहा जाता है। पारंपरिक धान की खेती में फसल को पानी के माध्यम से पोषण दिया जाता है। इस पद्धति में खेतों में पानी भरा होने के चलते हवा और धूप की पहुंच कम होती है, जिससे रासायनिक खाद के जरिए पौधों को ज्यादा पोषण देने की कोशिश की जाती है। दूसरी ओर श्री पद्धति के अंतर्गत पौधों को हवा, धूप और मिट्टी के माध्यम से ज्यादा पोषण पहुंचाने की कोशिश की जाती है। इसमें कंपोस्ट खाद का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। इस पद्धति के अंतर्गत बेहतर पोषण के कारण पौधे काफी स्वस्थ होते हैं और प्रति पौधे धान का उत्पादन काफी ज्यादा होता है। पारंपरिक खेती के अंतर्गत एक किलो धान उगाने के लिए जहां 3,000 से 5,000 लीटर पानी की जरूरत होती है वहीं श्री पद्धति में इसका करीब आधा पानी ही लगता है। इस प्रकार कम भूमि, श्रम, पूंजी और पानी लगने के बावजूद पैदावार में तीन गुना तक बढ़ोतरी हो जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें बीजों की प्रचलित किस्मों का ही उपयोग कर पैदावार बढ़ाई जा सकती है। धीरे-धीरे पूरे देश में लोकप्रिय हो रही इस तकनीक को अपनाकर बिहार के नालंदा जिले के दरवेशपुरा गांव के किसान सुमंत कुमार ने एक हेक्टेयर में 224 क्विंटल धान पैदा कर विश्व रिकॉर्ड बनाया। सुंमत कुमार के साथ चार अन्य किसानों ने प्रति हेक्टेयर 192 से 202 क्विंटल धान पैदा किया।

- अविनाश चंद्र