आज़ादी.मी टीम's blog

उड़ीसा में नक्सलियों ने जिस तरह से मलकानगिरी जिले के जिलाधिकारी आर वी कृष्णा का अपहरण किया उस से तो यही लगता है कि आने वाले समय में सरकारी स्तर पर की जाने वाली इस लापरवाही से नक्सली कुछ लाभ उठा सकते हैं. माओवादियों के दबाव में आते हुए राज्य सरकार ने मलकानगिरी जिले समेत पूरे राज्य में माओवादियों के खिलाफ़ अपने अभियान को रोकने का आदेश जारी कर दिया. इस पूरे मसले को देखते हुए यही लगता है कि कहीं न कहीं से सरकारी अधिकारियों द्वारा सुरक्षा के निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है और साथ ही यह भी हो सकता है कि किसी दूर दराज़ के क्षेत्र में कृष्णा स्थिति का जायजा लेने के लिए जा रहे हो और वापसी में किसी निर्जन स्थान पर उनकी सुरक्षा से अधिक लोगों ने आकर उनका अपहरण कर लिया हो ?

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मौजूद समय में हम आसानी से कह सकते हैं कि भारत और चीन विश्व आर्थिक जगत की महाशक्तियां बन गयी हैं. व्यापार जगत में दुनिया को पछाड़ना इतना आसान नहीं था, खासकर उन ऐसे दो देशों के लिए जो कई साल तक गुलामी की बेड़ियों से जकड़े हुए थे. परन्तु दोनों देशों ने अपने अतीत से सीख लेकर अपना भविष्य सुदृढ़ बनाया.

एक तरफ करोड़ों रु. खर्च कर सरकार विभिन्न रोजगार योजनाएँ चला रही है। जबकि दूसरी ओर ऐसे कई कानून हैं, जो आम आदमी को ईमानदारी से कमाने से रोकती हैं। रिक्शा चलाने वालों से संबंधित कानून इसका जीता जागता उदाहरण है।

दिल्ली में रिक्शा चलाना सरल नहीं है। दिल्ली नगर निगम साइकिल रिक्शा बायलॉज के प्रावधानों तथा सड़क जाम के मद्देनजर रिक्शा चलाने वालों पर तमाम बंदिशें लादी गयीं हैं। जैसे रिक्शा चलाने के लिए लाइसेंस अनिवार्य है। रिक्शा का मालिक ही रिक्शा चालक हो सकता है। एक व्यक्ति एक से अधिक रिक्शा नहीं रख सकता। अर्थात् किराये का रिक्शा चलाना अवैध है।

सरकार को सार्वजनिक कार्यों की व्यवस्था करनी चाहिए अथवा वित्तीय सहायता देनी चाहिए, पर वास्तविक प्रबंधन निजी क्षेत्र के लिए ही छोड़ दिया जाना चाहिए। इस विचारधारा के तहत सरकार और निजी क्षेत्र के उद्यमी मिलजुल कर व्यवस्था की गाड़ी को आगे बढ़ाते हैं। सरकार जहाँ दिशा-निर्देशक अथवा मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है, वहीं वास्तविक धरातल पर कार्यों को अंजाम देने का कार्य निजी क्षेत्र के उद्यमी करते हैं। इस व्यवस्था में कार्यों की बारीकियों में उलझने की जगह सरकार का ध्यान इस बात पर केंद्रित रहता है कि उसे हासिल क्या करना है। इस तरह वास्तविक प्रबंधन में लगे बिना ही सरकार नागरिकों को निजी क्षेत्र के उद्यमियों द्वारा हर तरह की सेवा दिला सकती है। अगर सरकार छात्रों को पाठयपुस्तक नि:शुल्क देना चाहती है, तो उसे प्रकाशन कार्य में स्वयं लगने की जरूरत नहीं। वह निजी प्रकाशकों से पुस्तक खरीद कर छात्रों को दे सकती है या बेहतर होगा कि छात्रों को पैसे ही दे दिये जाएँ, ताकि वे अपनी जरूरत की किताबें स्वयं खरीद लें।

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वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस बार के बजट में गरीबो, किसानों, उद्यमियों के साथ आम उपभोक्ताओं को खुश करने के लिए कई नए कदम उठाये हैं.

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भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की भर्ती के लिए साक्षात्कार से वापस आ रहे लाखों युवक रेल की छत पर यात्रा को मजबूर हुए. इनमें से 19 की करेंट से मौत हो गयी. भर्ती के लिए दो लाख लोगों ने अर्जी दी थी. यह घटना दर्शाती है कि देश में बेरोजगारी कितनी व्यापक हो चुकी है. मिस्र् एवं ट्यूनीशिया में हाल में भड़के जनांदोलनों के पीछे भी बेरोजगारी ही है. यानि यह समस्या वैश्विक है.

ट्यूनीशिया और मिस्त्र की घटनाओं के बाद भारत में भी लोग पूछने लगे है कि इस देश में ऐसी क्रांति क्यों नहीं आ सकती? भारत के भी हालात तो ऐसे ही है, जिनमें एक बड़ी उथल-पुथल की जरूरत है। बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार, दमन तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान के समर्पण की जिन पीड़ाओं ने वहां की जनता को उद्वेलित किया, उनसे भारत के लोग भी कम त्रस्त नहीं है। पिछले दिनों भीषण महंगाई, भयंकर बेकारी, किसानों की निरंतर आत्महत्याओं और घोटालों के एक से एक बढ़ चढ़ कर उजागर होते कारनामों ने पूरे देश के जनमानस को बुरी तरह बेचैन किया। किंतु क्या करें - ऐसी एक बेबसी व दिशाहीनता लोगों के मन में छाई है।

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बहुत साल बाद कोलकाता जाने का मौक़ा लगा. तीन दिन की इस कोलकाता यात्रा ने कई भ्रम साफ़ कर दिया. ज्यादा लोगों से न मिलने का फायदा भी होता है. बातें बहुत साफ़ नज़र आने लगती हैं. जनता के राज के ३३ साल बहुत अच्छे लग रहे थे. लेकिन जब वहां कुछ अपने पुराने दोस्तों से मुलाक़ात हुई तो सन्न रह गया. जनवादी जनादेश के बाद सत्ता में आयी कम्युनिस्ट पार्टियों की राजनीति की चिन्दियाँ हवा में नज़र आने लगीं. नंदीग्राम में जब तूफ़ान शुरू हुआ तो वहां एक भी आदमी तृणमूल कांग्रेस का सदस्य नहीं था. जो लोग वहां सरकार के खिलाफ उठ खड़े हुए थे वे सभी सी पी एम के मेम्बर थे और वे वहां के सी पी एम के मुकामी नेताओं के खिलाफ उठ खड़े हुए थे. कोलकता की राइटर्स बिल्डिंग में बैठे बाबू लोगों को जनता का उठ खड़ा होना नागवार गुज़रा और अपनी पार्टी के मुकामी ठगों को बचाने के लिए सरकारी पुलिस आदि का इस्तेमाल होने लगा. सच्ची बात यह है कि वहां सी पी एम के दबदबे के वक़्त में तो वाम मोर्चे के अलावा और किसी पार्टी का कोई बंदा घुस ही नहीं सकता था. 

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