आज़ादी.मी टीम's blog

शांतिपूर्वक तरीके से चल रहे आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और रैलियों को कुचल देने की परंपराएं इतिहास के कई पन्नों मंआ दर्ज हैं। दरअसल किसी भी लोकतांत्रिक सरकार और हुकूमत के पास विद्रोह को बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं होती। यहीं वजह है कि अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को तमाम सरकारें दबा देती हैं। भ्रष्टाचार और काले धन पर शांतिपूर्वक चल रहे  बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के सत्याग्रह के साथ भी ऐसा ही बर्ताव किया गया।

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लोकपाल बिल मसौदा समिति की सम्पन्न हुई पांचवी बैठक में इस मुद्दे पर विवाद पैदा हो गया है कि प्रधानमंत्री व उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल बिल के दायरे में लाया जाए अथवा नहीं। सरकार ने प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और सांसदों के संसद में किए गए कार्यो को लोकपाल के दायरे में लाने का विरोध किया है। जनवरी में तैयार सरकारी विधेयक के दायरे में प्रधानमंत्री भी शामिल थे, लेकिन अब सरकार को लगता है कि अगर लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाया गया तो प्रधानमंत्री का पद की गरिमा पर प्रभाव पड़ेगा.

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भारत की ऊर्जा समस्या बड़ा आकार लेने वाली है। कोयला, प्राकृतिक गैस और तेल के बड़े उत्पादकों ने हाल ही में कहा कि अगले कुछ सालों में उनके उत्पादन में बहुत कम वृद्धि होगी। जब देश में ईंधन की मांग बढ़ती जा रही है, तब देश के लिए यह बुरी ख़बर है।

इसका मतलब यह हुआ कि और अधिक ईंधन का आयात किया जाएगा और ऊर्जा कंपनियों के आयात खर्च और अधिक बढ़ते जाएंगे। इसका मतलब यह भी हुआ कि भारत का ऊर्जा क्षेत्र तेज़ी से असुरक्षित होता जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया की बाढ़ और मध्य-पूर्व के देशों में फैल रही अशांति जैसी घटनाओं से विश्व आपूर्ति में आयी बाधाओं और अस्थिर कीमतों के कारण यह कमज़ोरी आ रही है।

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देश भर में अनेक मामलों में खराब नीतियों और बदलाव की धीमी गति को देखते हुए सुधार की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है। इस संबंध में ऐसे सुधार आवश्यक हैं जो व्यापक पैमाने पर और जरूरी रफ्तार से अपना असर छोड़ सकें। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि बांस दरअसल घास है न कि इमारती लकड़ी। उनका यह पत्र निश्चित रूप से सार्थक दिशा में उठाया गया एक कदम है।

कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन अंततः मार डाला गया. आतंक की एक इबारत का समापन हुआ लेकिन तमाम संदेह और कयास अभी भी विद्यमान हैं. दुनियां थोड़ी चकित जरूर है लेकिन कहीं एक राहत की आस भी दिख रही है. लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि यदि अमेरिका पूरी दुनियां में कहीं भी छुपे हुए अपने दुश्मनों को ढूंढ़ कर मार सकता है और अपनी धमक कायम कर सकता है तो भारत अपने निर्दोष नागरिकों की हत्याएं चुपचाप क्यों देखता फिर रहा है. पाकिस्तान ने ना जाने कितने भारतीयों को अपनी कायराना हरकतों से मौत की नींद सुला दिया और भारत ने बस केवल वार्ता की बात तक बात सीमित रखी. 1947 से लेकर आज तक पाक के मंसूबों में कोई बदलाव नहीं आया और वह लगातार अपनी निंदित हरकतों को अंजाम देता रहा.

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हाल ही मे जब राज्यों की विधानसभाओं के चुनावी नतीजे सामने आए, तो पश्चिम बंगाल में साम्यवादियों और तमिलनाडु में डीएमके की नाटकीय ढंग से हुई हार को ज़्यादा तवज्जो दी गई। जिन दो राजनेताओं की वजह से जीत मुमकिन हो पाई, उनसे जुड़ी दिलचस्प कहानियों में लोगों ने खूब रुचि ली। केरल का ज़िक्र हुआ ज़रूर, लेकिन जीत के कम अंतर की वजह से, जो सत्ता पर बैठे मुख्यमंत्री की वजह से संभव हो पाई थी। वह मुख्यमंत्री जिन्हें कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक गठबंधन से ज़्यादा अपनी सरकार और दल का कोपभाजन ज़्यादा बनना पड़ा।

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यूपीए सरकार के सात साल और यूपीए-2 के दो साल पूरे हो गए। 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद बनी यह सरकार यूपीए प्रथम की तुलना में ज्यादा स्थिर मानी जा रही थी। एक तो कांग्रेस का बहुमत बेहतर था। दूसरे इसमें वामपंथी मित्र नहीं थे, जो सरकार के लिए किसी भी विपक्ष से ज्यादा बड़े विरोधी साबित हो रहे थे। यूपीए के लिए इससे भी ज्यादा बड़ा संतोष इस बात पर था कि एनडीए की न सिर्फ ताकत घटी, उसमें शामिल दलों की संख्या भी घटी। मुख्य विपक्षी दल भाजपा का नेतृत्व बदला। उसके भीतर की कलह सामने आई। पर यूपीए के पिछले दो साल की उपलब्धियाँ देखें तो खुश होने की वजह नज़र नहीं आती।

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जब बात किसानों से भूमि अधिग्रहण की आती है तो राजनीतिक दलों और उद्योगों के बीच होड़ शुरू हो जाती है। जब किसान की भूमि अधिग्रहीत की जाती है तो वह जीत की स्थिति में कभी नहीं होता है, चाहे वह कांग्रेस शासित राज्य हो या भाजपा शासित। ग्रेटर-नोएडा में भूमि अधिग्रहण का किसानों द्वारा किए जा रहे विरोध का समर्थन करने वाली भाजपा भी इससे कुछ अलग नहीं है।

भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख राकेश टिकैत का कहना है कि राजस्थान की कांग्रेस सरकार द्वारा जालौर में किसानों की भूमि अधिग्रहीत करने के एवज में उन्हें मात्र 6.8 पैसा प्रति वर्ग मीटर का मुआवजा दिया जा रहा है।

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काफी लंबे समय से महंगाई की मार से कराह रहा आमजन अब और किसी भी तरह के बोझ को ढोने के लायक नहीं बचा है। यही वजह है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव-नतीजों के बाद जैसे ही कंपनियों ने पेट्रोल के दाम बढ़ाए आवाम विरोध स्वरूप सड़कों पर उतर आई। नाराज लोगों ने जगह-जगह केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के पुतले फूंके। इसे देखते हुए केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी कह रहे हैं कि पेट्रोल की कीमतों का निर्धारण कंपनियां करती हैं, सरकार नहीं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सरकार के खिलाफ एक्शन लेने की बजाय तेल कंपनियों को ऐसा कोई रास्ता सुझाया जाए जिससे दाम कम बढ़ें और घाटा भी कम हो।

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अपनी सरज़मीं पर बेहद कड़ी सुरक्षा के बीच अमेरिकी कमांडोज़ के हाथों दुनिया के सबसे ख़तरनाक आतंकी ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद पाकिस्तान का असली चेहरा दुनिया के सामने आ गया है। एक तरफ़ पाकिस्तान को आंतकी देश घोषित करने की मांग उठ रही है, तो दूसरी तरफ़ तालिबान ने बदले की कार्रवाई की धमकी दी है। अमेरिका ने पाकिस्तान में अपना दूतावास बंद करने का ऐलान कर दिया है और ख़बर है कि बराक़ ओबामा अपना पाकिस्तान दौरा भी रद्द कर सकते हैं।

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