आज़ादी.मी टीम's blog

भारत एक कृषि प्रधान देश है और भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है। देश में कृषि का अहम योगदान है। फिर भी हमारे देश में कृषि और किसानों की स्थिति अच्छी नहीं है। भले ही अब तक सरकारों ने कृषि क्षेत्र के विकास के लिए उपायों की झड़ी लगा दी हो, लेकिन वास्तविकता यही है कि कृषि क्षेत्र का विकास दर बढ़ने के बजाय 0.2 प्रतिशत घटा है। लगातार बढ़ती आबादी और औद्योगीकरण के विस्तार के चलते कृषि योग्य जमीन घटने से यह संकट दिनोंदिन बढ़ रहा है। आजादी के समय जहां देश की लगभग 70-75 प्रतिशत जनसंख्या आजीविका के लिए खेती पर निर्भर थी वह अब यह घटकर 52 प्रतिशत पर पहुंच गई है। सचमुच अपने देश के कृषि परिदृश्य और अन्य उत्पादन पर निगाह डाली जाए तो संतोष के साथ ढेर सारी चुनौतियां ही नजर आती है।

गरीबी कम करने के मॉडल के तौर पर व्यापक रूप से स्वीकृत किया गया लघुऋण उद्योग अचानक कड़ी आलोचना का शिकार बन गया है, खासतौर पर दक्षिण एशिया में।  भारत के दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश में एस के एस और अन्य के खिलाफ कथित तौर पर गलत कार्यप्रणाली और उच्च ब्याज़ दर लेने के कारण माहौल में गर्मी है। बांग्लादेश में नोबल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के जीवन पर्यन्त किए कार्यों को गरीबों के गले की फांस कहा जा रहा है। वजह है, ज्यादा ऋणग्रस्तता। हालांकि लघुऋण कार्यक्षेत्र को नियंत्रित करने की बहस प्रासंगिक है, लेकिन इसके लिए संपूर्ण कार्यक्षेत्र को कुसूरवार ठहराने से ना केवल इस उद्योग द्वारा देखरेख किए जाने वाले लाखों गरीब लोगों की जिंदगी पर असर पड़ेगा बल्कि ये प्रभावी ढंग से लघु ऋण से संबद्ध कारणों जैसे भारत में प्रगामी वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में भी विघ्न डालेगा।

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राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना ने बिहार के गांवों को एक नई चमक दी है। जहां एक ओर फिलहाल कुछ मिनट ही सही हरेक दिन तसल्ली के तौर पर ग्रामीणों को बिजली के दर्शन हो जाया करते हैं, वहीं दूसरी ओर तकरीबन सभी गांवों में बिजली की चमक ने एक नए किस्म के दलालों की आंखों में दमक भर दी है।

उदीयमान बीबार में औरंगाबाद जिले में एक गांव है-चनकप। इस गांव में करीब 300 सौ घर हैं। अधिकांश घर खपरैल हैं। साथ ही, अधिकांश लोग भी गरीबी रेखा के नीचे हैं। आजादी के बाद पहली बार संभवतः गांव वालों को बिजली के दर्शन हुए हैं। वैसे, बिजली के तार सालभर पहले से ही गांव के गली-कूचों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

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बीते सात वर्षों से भी अधिक समय से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार अपने विशिष्ट ब्रांड (तथाकथित) 'समावेशी विकास’ का नारा बुलंद करती आई है। इस मूल विचार के साथ तो कहीं कोई खामी नहीं है क्योंकि इसके मुताबिक आर्थिक विकास के लाभ हर व्यक्ति तक पहुंचाने की मंशा जताई गई है। खासतौर पर इसे गरीब और वंचित वर्ग के लोगों तक पहुंचाने की बात कही गई है। लेकिन इसके लिए जिन नीतियों को अपनाया गया उनमें तमाम गड़बडिय़ां देखने को मिलीं। इसमें गरीबी निरोधक कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च में काफी इजाफा करने पर जोर दिया गया। इन कार्यक्रमों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) तथा खाद्य और शिक्षा संबंधी अनेक अन्य कार्यक्रम शामिल हैं। इस रवैये से सरकार के खर्च तथा केंद्रीय बजट में की गई सब्सिडी में इजाफा होता गया। चूंकि इस दौरान कर से हासिल होने वाले राजस्व में बहुत अधिक इजाफा नहीं हुआ तो जाहिर है इससे राजकोषीय घाटे की स्थिति निर्मित हुई। इसके परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति संबंधी दबाव बढ़ा और ब्याज दरों में भी इजाफा हुआ।

प्रेस को नियंत्रित करने के लिए प्रेस कर्मचारियें का वेतन निर्धारित करने से बेहतर तरीका और क्या हो सकता है. कोई पत्रकार सरकार के खिलाफ निभीर्क होकर लिख ही कैसे सकता है, जबकि वह जानता हो कि उसका वेतन सरकार ही निर्धारित कर रही है। एक के बाद एक भारतीय सरकारों ने प्रेस को नियंत्रित करने का आसान तरीका यह पा लिया है कि अखबारों के लिए वैधानिक वेज बोर्ड बना दिया जाए, जिसके तहत अयथार्थ रूप से ऊंचे वेतन निर्धारित कर दिए जाएं जिन्हें देना कानून के तहत जरूरी हो।

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नीतियां ईमानदार नहीं लगतीं. उनकी सरकार ने सर्वत्र बड़ी-बड़ी कंपनियों को छूट दे रखी है. ये कंपनियां आम आदमी को मनमोहन सिंह की छतरी तले कुचल रही हैं और मनमोहन सिंह की कान पर जूं भी नहीं रेंग रही है. देश का नागरिक आज पशोपेश में है. डॉ सिंह की व्यक्तिगत ईमानदारी निर्विवादित है. परंतु उनके नेतृत्व में चल रही यूपीए सरकार का भ्रष्टाचार का शीर्ष पर होना भी उतना ही निर्विवादित है. इस अंतर्विरोध को कैसे समझा जाये? विषय ईमानदारी को पारिभाषित करने का है. सामान्य तौर पर ईमानदारी को व्य्क्तिगत सच्चाई के तौर पर समझा जाता है. जैसे कोई व्यिक्ति कहे कि मैं तुम्हें 10 रुपये दूंगा और वह 10 रुपये दे दे तो उसे ईमानदार कहा जाता है. परंतु चोर यदि कहे कि मैं चोरी करने जा रहा हूं तो उसे ईमानदार नहीं कहा जाता है. दरअसल, ईमानदारी के दो पहलू होते हैं- व्यिक्तिगत एवं सामाजिक. ईमानदार उसी को कहा जाना चाहिए जो कि अपने विचारों के प्रति सच्चा होने के साथ-साथ समाज के प्रति भी सच्चा हो.

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इस देश में आम आदमी की बात तो छोड़िये, सपने देखने का हक शायद टाटा जैसे बड़े लोगों को भी नहीं है। सत्ता में बैठे मठाधीशों और अफसरों ने तय कर लिया है कि इंडिया में कोई भी सपना केवल वही देखेंगे और उसे पूरा करने का हक भी सिर्फ उन्हीं को है। सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में 5 रुपए लीटर की बढ़ोत्तरी करके आम आदमी को फिर से साइकिल और दुपहिया वाहन पर ही चलने की ही हैसियत याद दिलाई है।

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पिछले तीन-चार वर्षों में अमेरिका और यूरोप को भारत से होने वाले निर्यात की रफ्तार धीमी हुई है. ऐसे में भारत द्वारा नए निर्यात बाजार खोजे जा रहे हैं. इसी परिप्रेक्ष्य में मई 2011 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अफ्रीकी देशों की यात्रा की. उन्होंने अदीस अबाबा में आयोजित अफ्रीका-भारत फोरम के शिखर सम्मेलन में 15 अफ्रीकी देशों के लिए पांच अरब डॉलर के कर्ज की घोषणा की और अफ्रीकी देशों से कारोबारी संबंध बढ़ाने की संभावनाएं तलाशने की दिशा में कदम आगे बढ़ाए.

हमें यह देखना होगा कि हम किस किस्म की युवा पीढ़ी का निर्माण कर रहे हैं? वह जो पहले कदम से ही बेईमानी सीख रही है? जब देश की समूची बुनियाद ही झूठ और बेईमानी पर आधारित हो तो हमारा चिंतित होना अनिवार्य है। 

'मैडम हम सब नकलची हैं।'

'क्यों?' मैंने पूछा

एक भारतीय लेखक को कैंसर पर आई उनकी पुस्तक 'इम्परर ऑफ आल मेलडीज' के लिए पुलित्जर पुरस्कार मिलने पर हम गर्व कर रहे हों लेकिन इसके साथ ही हमको उन तमाम तरह के कैंसर के बारे में तत्काल सोचना होगा जो हमारी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में घर कर चुके हैं।

अभी भले ही ये कैंसर प्राथमिक अवस्था में हों लेकिन अगर इन पर ध्यान नहीं दिया गया और इनका उपचार नहीं किया गया तो ये कैंसर बहुत जल्द ही घातक रूप ले लेंगे और पहले ही देश की 1.2 अरब आबादी को स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के मामले में संघर्ष कर रहे स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को और अधिक निशक्त कर देंगे। इन कैंसरों में सबसे पहला और संभवत: सबसे चिंताजनक है अभी संगठित होने की शुरुआत कर रहे देश के स्वास्थ्य सेवा आपूर्ति क्षेत्र में उभरती बुराइयों का कैंसर।

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