आज़ादी.मी टीम's blog

शहरी महिलाओं ने इधर एक नया आसमान छू लिया है। इस काम में उनकी सबसे ज्यादा मदद की है आर्थिक आजादी ने। एक मार्केट रिसर्च फर्म आईएमआरबी के मुताबिक शहरी महिलाओं की आमदनी में पिछले दशक के दौरान आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। यह अब बढ़कर करीबन दोगुनी हो गई है। औसतन प्रति भारतीय की आय से यह कहीं ज्यादा है। इसी अवधि में शहरी आय में करीब 100 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है जबकि शहरी महिलाओं की आय में 110 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

Category: 

आगामी वर्ष 2014 में होने वाले आम चुनावों में लगभग 10 करोड़ नए मतदाता होंगे। भारत के मतदाताओं की यह संख्‍या मैक्सिको की पूरी आबादी के लगभग है।भारतीय जनसंख्‍या में शामिल होने वाले अधिकांश नए मतदाताओं की पैदाइश बाबरी मस्जिद दंगों, प्रथम मंडल आरक्षण ड्रामा और वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों जैसी घटनाओं के बाद की है। मील का पत्‍‍थर साबित हुई इन तीन प्रमुख घटनाओं ने पिछले दो दशकों में देश की राजनीति को परिभाषित किया है।

Category: 

यूपीए-1 की विशेषता उसका सोशल एजेंडा था। यह सकारात्मक संकेत है कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरते जाने और भटकाव का शिकार दिखने के बाद अपनी दूसरी पारी में मनमोहन सिंह सरकार फिर उस एजेंडे की तरफ लौट रही है।

लंबे टालमटोल के बाद खाद्य सुरक्षा विधेयक अब कानून बनने के रास्ते पर है। खास बात यह है कि अधिकारप्राप्त मंत्री समूह ने जिस विधेयक को मंजूरी दी है, वह कमोवेश राष्ट्रीय सलाहकार समिति (एनएसी) द्वारा तैयार किए गए प्रारूप पर आधारित है।

क्या खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार कागजी वायदों के सिवाय कुछ ठोस उपायों के बारे में सोच सकती है? हमारा मानना है कि अमूल की तर्ज पर किसानों को कोऑपरेटिव और कंपनियों के रूप संगठित किया जाना चाहिए और इन एजेंसियों के जरिए व्यवस्थित रीटेल बनाया जाना चाहिए।

प्राय: मुद्रास्फीति से निपटने के लिए सरकार फाइलें खोलती है और कुछ कागजी कार्रवाई करती है। इसके बाद कर्ज की उपलब्धता में कमी की जाती है, निर्यात पर रोक लगाई जाती है, आयात के नियमों में ढील दी जाती है और मल्टी-ब्रान्ड रीटेल के दरवाजे विदेशी निवेश के लिए खोलने की जरूरत को लेकर बहस शुरू हो जाती है। इस तरह के कदम उठाना व्यर्थ नहीं है, लेकिन ये ज्यादा कारगर साबित नहीं हुए हैं।

छिंदवाड़ा के पास अडानी पेंच पावर प्लांट का पुरजोर विरोध हो रहा है। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, इन सभी प्रदेशों से इन दिनों किसानों/ग्रामीणों की जमीनों के अधिग्रहण की खबरें सबसे ज्यादा आ रही हैं। एक और समान बात यह है कि ज्यादातर राज्यों में बिजली या लोहे के कारखानों के लिए जमीन पर कब्जे किए जा रहे हैं और किसान/ग्रामीण विरोध कर रहे हैं लेकिन मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का मामला समान हो कर भी कुछ अलग है और प्रस्तावित नए भूमि अधिग्रहण कानून को और जल्द लागू कराने के लिए दमदार दलील पेश कर रहा है।

लंबी अवधि में भारत की विकास दर तेज रहने के पक्ष में कई तर्क दिए जाते हैं। मसलन भारत की आधी आबादी 30 साल से कम उम्र की है और इस उम्र में ये लोग वित्तीय मामलों में अधिक जोखिम उठाने के लिए तैयार होते हैं। जबकि एक 45 वर्ष का व्यक्ति वित्तीय मामलों में जोखिम नहीं ले सकता क्योंकि उसे अपनी सेवानिवृत्ति के बाद की जिंदगी के बारे में भी सोचना होता है।

Category: 

नागरिक समाज बनाम नागरिक समाज के बीच विवाद के शोर के बीच एक तरफ ऐसे लोग हैं, जो लोकपाल कार्यकर्ताओं को गैर-लोकतांत्रिक समझते हैं, जबकि दूसरी तरफ जन प्रतिनिधी हैं, जिन्होंने बहुत तेज़ी से अपनी तरफ लोगों का ध्यानाकर्षण किया है। इस सबके बीच मुझे जो बात सबसे ज्यादा खटकती है, वो ये है कि इस विवाद के इतर भ्रष्टाचार के मूल कारणों और उससे निबटने के तरीके पर एक व्यापक चर्चा का अभाव है।

मैं ना ही एक तजुर्बेकार प्रशासनिक अधिकारी हूं, जिसने जिला स्तर और सचिव स्तर पर कई साल बिताएं हों या फिर बुढ़ापे की ओर अग्रसर एक क्लर्क जिसने 30 साल फोन उठाते हुए, चिठ्ठियां टाइप करते हुए और तुजुर्बेकार नौकरशाहों से श्रुतलेख (डिक्टेशन) लेते हुए बिताएं हों। मैंने एक साल सरकार के साथ काम करके यह जान लिया है कि भारत की समस्या उसकी जटिल प्रणाली है। जिसका इज़ाद भारत ने खुद किया है।

Category: 

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने समलैंगिकता को एक 'रोग' और 'अप्राकृतिक' बता  कर काफी हंगामा खड़ा कर दिया जिस वजह से लोगों में, ख़ास तौर पर समलैंगिक समुदायों में रोष है.

आजाद ने कहा है , ' अगर कोई पुरुष दूसरे पुरुष के साथ यौन संबंध बनाता है , तो यह एक बीमारी है’ . उन्होंने कहा , विकसित देशों की तरह गे संबंध दुर्भाग्य से भारत में भी आ चुके हैं। यह बीमारी यहां भी बहुत तेजी से फैल रही है। यह हमारे लिए अच्छा संकेत नहीं है। हम ऐसे संबंधों की पहचान भी नहीं कर सकते, क्योंकि ये बहुत कम सामने आते हैं।

Category: 

हमारे राष्ट्रीय संदर्भ में कुछ चीजें, जिनमें कुछ चुनिंदा लोगों के कथन और कुछ आयोग इत्यादि की सिफारिशें जैसे पत्थर की लकीर की शक्ल अख्तियार कर लेती हैं। समझदार हो या नासमझ, अनजान हों या जानकार, उन मुद्दों पर मान लिया जाता है कि अंतिम बात जैसे कह दी गई है और उसके आगे-पीछे देखने, उसका विश्लेषण करने और मीन-मेख निकालना सिर्फ समझ के अभाव का ही नहीं, संकीर्ण विचारधारा या 'पॉलिटिकल इनकरेक्टनेस' का भी परिचायक बन जाता है।

Category: 

हेनरी अनातोले ग्रूनवाल्ड के अनुसार, पत्रकारिता कभी चुप नहीं रह सकती। यह इसकी सबसे बड़ी खूबी और सबसे बड़ी खामी है। जब आश्चर्यजनक कारनामों को अंजाम दिया जा रहा हो, विजय का उद्घोष और आतंक के लक्षण हवा में ही हो, इसे जरूर और तुरंत अपनी आवाज उठानी चाहिए, जबकि आश्चर्य की गूंज हवा में ही हो।

Category: 

Pages